तपती धरती, सूखते कंठ और संवेदनाओं का अकाल…बुरहानपुर में पानी की एक-एक बूंद के लिए तड़पती जिंदगियां
मध्य प्रदेश के बुरहानपुर (धुलकोट) में भयंकर जल संकट। अपनी जान जोखिम में डालकर पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसते ग्रामीण और गंदा पानी पीने को मजबूर मासूम बच्चों की दर्दनाक जमीनी हकीकत।
तपती धूप, सूखकर फटी धरती और पहाड़ों के बीच पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष करती एक बेबस जिंदगी। जब हम और आप अपने घरों में बैठकर पानी की बर्बादी कर रहे होते हैं तब मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले स्थित धुलकोट के आदिवासी अंचलों में इंसान पानी नहीं बल्कि अपनी सांसें तलाश रहा होता है।
ये दर्दनाक तस्वीरें किसी अकालग्रस्त देश की नहीं हैं बल्कि उस भारत की हैं जहां हर घर जल पहुंचाने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। इन खोखले दावों के बीच धुलकोट के कई दूरस्थ गांवों में लोग आज भी बूंद-बूंद पानी के लिए अपनी जान दांव पर लगाने को मजबूर हैं। योजनाएं महज फाइलों में दफन होकर रह गई हैं और गांव के हैंडपंप, कुएं तथा तालाब पूरी तरह सूख चुके हैं।
सबसे ज्यादा हृदय विदारक दृश्य उन मासूम बच्चों का है जिन्हें इस उम्र में हाथों में किताबें और खिलौने थामने चाहिए थे। लेकिन वे खाली बर्तन लेकर कई किलोमीटर दूर पानी की तलाश में भटक रहे हैं। चिलचिलाती धूप और तपती दोपहरी में नंगे पैर पहाड़ियों के बीच उतरती ये मासूम बच्चियां हमारे विकास के दावों के मुंह पर एक करारा तमाचा हैं।
वे घंटों तक इंतजार करती हैं कि शायद किसी गड्ढे में धरती से पानी रिसकर जमा हो जाए ताकि वे उसे अपने छोटे बर्तनों में भर सकें। कई बार तो पानी इतना कम होता है कि एक छोटा सा बर्तन भरने में भी घंटों बीत जाते हैं और सुबह चार बजे से पानी की तलाश में निकलीं ये बेटियां और महिलाएं दोपहर ढलने तक ही घर लौट पाती हैं।
पानी हासिल करने की यह जद्दोजहद मौत के कुएं में उतरने से कम नहीं है। महिलाएं और बच्चियां अपनी जान जोखिम में डालकर खतरनाक गहरे खड्डों में उतरती हैं। कहीं पेड़ की जड़ों को सहारा बनाकर नीचे उतरना पड़ता है तो कहीं पथरीली ढलानों पर हर पल फिसलने का खौफ बना रहता है। जरा सा पैर फिसला और एक बड़ा हादसा हो सकता है।
लेकिन भूख और प्यास का दर्द मौत के डर से कहीं ज्यादा बड़ा हो चुका है। नम आंखों से एक बेबस मां का यह कहना कि अगर पानी नहीं लाएंगे तो बच्चे प्यासे सो जाएंगे उस गहरे दर्द को बयां करता है जिसे एसी कमरों में बैठे हुक्मरान शायद कभी नहीं समझ पाएंगे।
यह सिर्फ प्यास बुझाने की लड़ाई नहीं है बल्कि मौत और बीमारियों से समझौता करने की एक खौफनाक मजबूरी भी है। इन गड्डों में जमा पानी इतना गंदा और बदबूदार है कि उसे देखकर शायद कोई जानवर भी मुंह फेर ले लेकिन इंसानों की बेबसी देखिए कि उन्हें वही जहरीला पानी गले के नीचे उतारना पड़ रहा है।
इस गंदे पानी ने अब गांवों में बीमारियों का रूप ले लिया है। मासूम बच्चे पेट दर्द, उल्टी, बुखार और त्वचा रोगों से तड़प रहे हैं। गरीबी से जूझते इन परिवारों के पास न तो इलाज के पैसे हैं और न ही पीने के लिए साफ पानी। प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के दरवाजे अनगिनत बार खटखटाने के बावजूद आज तक इनकी पुकार किसी ने नहीं सुनी।
धुलकोट की ये तस्वीरें महज एक जल संकट की दास्तान नहीं हैं बल्कि ये इस बात का चीख-चीख कर सुबूत दे रही हैं कि हमारे समाज में संवेदनाओं के जलस्रोत किस कदर सूख चुके हैं। एक तरफ जगमगाते शहरों में पानी को व्यर्थ बहाया जा रहा है तो दूसरी तरफ हमारे ही देश के कुछ कोनों में लोग एक घूंट पानी के लिए मौत से लड़ रहे हैं।
यह वक्त सिर्फ तरस खाने का नहीं बल्कि खुद से यह पूछने का है कि क्या हम सच में एक विकसित और संवेदनशील समाज का हिस्सा हैं, जहां एक मासूम बच्ची का बचपन पानी के खाली बर्तनों और खतरनाक खड्डों के बीच कहीं घुटकर रह गया है।