Dacoit Nirbhay Singh Gurjar Story: निर्भय सिंह गुर्जर एक कुख्यात डकैत, जो बीवी के धोखे से मारा गया

Famous Dacoit Nirbhay Singh Gurjar History: डाकू निर्भय सिंह गुर्जर का नाम 1990 के दशक में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के चंबल क्षेत्र में खौफ का प्रतीक बन चुका था।;

Update:2025-02-27 12:30 IST

Famous Dacoit Nirbhay Singh Gurjar History (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

UP Popular Dacoit Nirbhay Singh Gujjar: यह कहानी उस कुख्यात डकैत की है, जिसके नाम से चंबल ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान तक थर्राते थे। निर्भय सिंह गुर्जर (Dakait Nirbhay Singh Gujjar) के गिरोह में लगभग पांच दर्जन कुख्यात अपराधी थे, जो उसके एक इशारे पर किसी का भी अपहरण कर लेते या गोलियों से भून देते थे। छोटी-मोटी चोरियों से शुरू हुआ उसका अपराध का सफर बड़ी डकैतियों और फिर अपहरण के स्थायी धंधे तक पहुंचा। 7 नवंबर 2005 को मुठभेड़ में उसके मारे जाने की खबर ने चंबल के बीहड़ों में एक युग का अंत कर दिया।

डाकू निर्भय सिंह गुर्जर का नाम 1990 के दशक में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के चंबल क्षेत्र में खौफ का प्रतीक बन चुका था। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के एक छोटे से गांव में हुआ था। निर्भय का शुरुआती जीवन गरीबी और संघर्ष में बीता। बचपन में ही परिवारिक विवादों और सामाजिक असमानताओं के चलते उनके मन में विद्रोह की भावना जागी, जिसने उन्हें अपराध की दुनिया में धकेल दिया।

अपराध की शुरुआत: मामा के साथ खड़ा हुआ नीरभय

(फोटो साभार- सोशल मीडिया)

निर्भय सिंह गुर्जर का जन्म उत्तर प्रदेश के औरैया जिले के पचदौरा गांव में 1961 में हुआ था। उसके परिवार में माता-पिता, पांच बहनें और एक भाई था। गरीबी का आलम यह था कि परिवार के पास जमीन नाम मात्र की थी, और सिंचाई के साधनों के अभाव में वह भी किसी काम की नहीं थी।

परिवार की दुर्दशा देख निर्भय के मामा उन्हें अपने गांव गंगदासपुर ले गए, लेकिन वहां के ग्रामीणों ने उनका विरोध करना शुरू कर दिया। मामा की जमीन पर उनकी नजर थी। यहीं से निर्भय के भीतर बगावती तेवर पनपने लगे। उसने मामा का साथ दिया और छोटे-मोटे अपराध करने लगा। उरई जिले में एक डकैती के दौरान निर्भय पकड़ा गया और जेल भेजा गया। जेल में अपराधियों के साथ रहकर वह और भी खतरनाक बन गया।

निर्भय सिंह गुर्जर ने अपने अपराधी करियर की शुरुआत छोटी-मोटी चोरियों और लूटपाट से की थी। लेकिन जल्द ही वे चंबल के बीहड़ों में सक्रिय कुख्यात डाकू गिरोहों के संपर्क में आए। उनका नेतृत्व कौशल, साहस और रणनीतिक सोच ने उन्हें डाकुओं के बीच एक खास पहचान दिलाई। कुछ ही समय में निर्भय ने अपना खुद का गिरोह बना लिया, जो हत्या, लूट, अपहरण और फिरौती जैसी आपराधिक गतिविधियों में लिप्त हो गया।

गुर्जर सरदार का आतंक

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निर्भय को "गुर्जर सरदार" के नाम से भी जाना जाता था। उनके आतंक का आलम यह था कि ग्रामीण इलाकों में लोग शाम होते ही अपने घरों में बंद हो जाते थे। व्यापारियों, जमींदारों और अमीर परिवारों में उनका खौफ था, और वे अक्सर फिरौती के लिए लोगों का अपहरण करते थे। निर्भय की छवि एक ऐसे डाकू की थी जो गरीबों का मददगार और अमीरों के लिए खतरा था, हालांकि यह छवि अधिकतर उनकी अपनी रणनीति का हिस्सा थी।

लालाराम गैंग से चंबल के सरदार तक का सफर

जेल से छूटने के बाद नीरभय ने अपने घर लौटने के बजाय चंबल के कुख्यात डकैत लालाराम की शरण ली। निर्भय ने जल्दी ही लालाराम का भरोसा जीत लिया। इस गैंग में सीमा परिहार भी प्रमुख सदस्य थी। जब लालाराम पुलिस मुठभेड़ में मारा गया, तो गैंग पर कब्जे के लिए सीमा और निर्भय आमने-सामने आ गए। आखिरकार सीमा ने निर्भय को गैंग से बाहर कर दिया।

कहा जाता है कि लालाराम ने सीमा और निर्भय की शादी करवाई थी, लेकिन निर्भय का अय्याशी वाला स्वभाव सीमा को बिल्कुल पसंद नहीं था। गैंग से बाहर होने के बाद निर्भय ने खुद का गिरोह खड़ा करने का फैसला किया और देखते ही देखते उसका गिरोह स्थापित हो गया।

निर्भय सिंह गुर्जर का प्रमुख अपराध अपहरण था। इटावा, औरैया, फिरोजाबाद, भिंड, मुरैना और आसपास के जिलों में उसका नेटवर्क ऐसा बना कि छोटे-मोटे अपराधी अपहरण करके उसके गिरोह तक 'पकड़' (अपहरण किए गए व्यक्ति) पहुंचा देते थे। निर्भय ने अपहरण की इस व्यवस्था से बड़ी वसूली की। अब उसके पास पैसा, हथियार और अय्याशी के साधन सब मौजूद थे।

गैंग में तीन लड़कियां भी थीं, जिन्हें अपहरण करके लाया गया था। पुलिस ने उस पर पांच लाख रुपये का इनाम घोषित किया था और वह दो सौ से अधिक मुकदमों में वांछित था।

धोखे और विश्वासघात की कहानी

निर्भय ने श्याम नाम के एक युवा को अपना दत्तक पुत्र बना लिया था। धीरे-धीरे श्याम गिरोह में प्रभावी हो गया। निर्भय ने श्याम की शादी सरला से करवाई, जो पहले से ही गैंग में अपहृत कर लाई गई थी। खुद निर्भय ने भी कम उम्र की नीलम से शादी कर ली थी।

हालांकि, एक दिन श्याम ने निर्भय को अपनी पत्नी सरला के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया। श्याम के भीतर बगावत की आग जलने लगी। निर्भय ने मामले को दबाने की कोशिश की, लेकिन श्याम चुप नहीं रहा। उसने निर्भय की पत्नी नीलम को अपने प्रेम जाल में फंसा लिया।

निर्भय का अंत: बगावत और मुठभेड़

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श्याम और नीलम एक दिन चुपचाप चंबल से भाग निकले और पुलिस से मिल गए। श्याम ने निर्भय के ठिकाने की जानकारी पुलिस को दी। निर्भय सिंह गुर्जर को पकड़ना पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती थी। उसकी तलाश में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश पुलिस ने कई बार ऑपरेशन चलाए, लेकिन हर बार वह जंगलों और बीहड़ों की गहरी घाटियों में छुपकर बच निकलता था। उसके गिरोह के पास अत्याधुनिक हथियार और इलाके की बेहतरीन जानकारी थी, जो उन्हें पुलिस से एक कदम आगे रखती थी।

1997 में, निर्भय सिंह गुर्जर को पकड़ने के लिए मध्य प्रदेश पुलिस ने एक गुप्त सूचना के आधार पर विशेष अभियान चलाया। यह अभियान भिंड और मुरैना जिलों के बीहड़ों में संचालित किया गया था। 7 नवंबर 2005 को पुलिस ने उनके ठिकाने को घेर लिया और दोनों पक्षों में कई घंटों तक भीषण मुठभेड़ चली। निर्भय ने सरेंडर करने से इनकार कर दिया और आखिरी गोली तक लड़ते रहा। अंततः पुलिस की गोलियों से निर्भय मारा गया। इस मुठभेड़ में उसके कई सहयोगी भी ढेर हुए, जबकि कुछ ने आत्मसमर्पण कर दिया।

उसकी मौत के साथ ही चंबल के बीहड़ों में उसका आतंक खत्म हो गया। नीरभय की कहानी आज भी चंबल के गांवों में गूंजती है, जहां उसके खौफ, अपराध और अंत की दास्तानें पीढ़ियों तक सुनाई जाती हैं।

निर्भय सिंह गुर्जर की मौत ने चंबल क्षेत्र में लंबे समय से जारी डाकू संस्कृति पर एक बड़ा प्रहार किया। उनके मारे जाने के बाद कई छोटे गिरोह सक्रिय रहे, लेकिन निर्भय जैसा खौफ फिर कोई पैदा नहीं कर सका। उसकी कहानी पर कई किताबें और डॉक्यूमेंट्री भी बनीं, जो अपराध और न्याय व्यवस्था के टकराव को दर्शाती हैं।

निर्भय की मौत ने यह साबित किया कि अपराध का जीवन लंबा नहीं होता और कानून के हाथ अंततः सबसे खतरनाक अपराधी तक पहुंच ही जाते हैं। उसकी कहानी एक चेतावनी है कि अपराध चाहे किसी भी उद्देश्य से किया जाए, उसका अंत हमेशा विध्वंस और मौत में ही होता है।

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