उत्तर प्रदेश का तीर्थस्थल है 88 हजार ऋषियों की तपस्थली, यहां तप करने से जाएंगे ब्रह्मलोक

हमारे देश में धर्म से जुड़ी कई रहस्य व परंपराएं है। जिसपर हम चाहे न चाहे विश्वास करते हैं। खासकर धर्म से जुड़े बातों पर तो हम सब लोग आंखमूंद कर विश्वास करते है। हिंदू धर्म के जितने भी प्राचीन धार्मिक स्थल है वहां कोई ना कोई रहस्य जरूर है। ऐसे ही एक धार्मिक स्थल की बात कर रहे हैं

जयपुर: हमारे देश में धर्म से जुड़ी कई रहस्य व परंपराएं है। जिसपर हम चाहे न चाहे विश्वास करते हैं। खासकर धर्म से जुड़े बातों पर तो हम सब लोग आंखमूंद कर विश्वास करते है। हिंदू धर्म के जितने भी प्राचीन धार्मिक स्थल है वहां कोई ना कोई रहस्य जरूर है। ऐसे ही एक धार्मिक स्थल की बात कर रहे हैं जो नैमिषारण्य का देवदेश्वर धाम है। यह उत्तर प्रदेश में है। देवदेश्वर धाम सीतापुर-हरदोई रोड पर आदिगंगा गोमती किनारे स्थित है। इस धर्म स्थान पर कई अद्भुद रहस्य है।नैमिषारण्य (नीमसार) का भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु, देवी सती और भगवान शिव से जुड़ी कथा में इसका जिक्र है। मान्यता हैं यहां 33 हिंदू देवी देवताओं के मन्दिर हैं। तीर्थस्थल केंद्रों में सबसे अधिक पवित्र माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि यदि कोई इस जमीन पर 12 साल के लिए तपस्या करता है तो ब्रह्मलोक में जाता है।

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कहते हैं इस धार्मिक स्थल का जिक्र सतयुग व द्वापर युग से पहले से मिलता है। इस मंदिर का शिवलिंग द्वापर युग का है। मंदिर में रखी सीता की मथानी को छूने से मनोकामना पूरी होने की मान्यता भी है। देवदेवेश्वर का जिक्र वायुपुराण सहित अन्य धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है। विद्वानों का मानना है कि वनवास के दौरान मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम व माता सीता ने इस मंदिर में पूजा की थी। ऐसी मान्यता है कि मंदिर की स्थापना स्वयं वायु देवता ने की। भोलेनाथ का जलाभिषेक करने के बाद सीता की मथानी छूकर मनोकामना करते हैं। पहले यह मथानी मंदिर परिसर में पड़ी थी। उस समय श्रद्धालु मथानी को उठाकर मन्नतें मांगते थे। उठाने और रखने में मथानी टूटने लगी थी। ऐसे में मंदिर के पुजारी ने मथानी को जाम करवा दिया।

 

मान्यता
यहां पर चक्र तीर्थ, व्यास गद्दी, ललिता देवी मंदिर,पंचवटी हवनकुंड जैसे कई  स्थल है जो भगवान के साक्षी है। इस  धर्म स्थल के बारे में  शिव पुराण , देवी पुराण व वायुपुराण में जिक्र है। इसके बारे में कहा जाता है कि एक बार ब्रह्माजी ने धरती के विस्तार का सोचा। इसकी जिम्मेदारी शतरुपा व मनु को दिया। इसी भूमि पर दधिची ऋषि ने 23 हजार वर्षों तक तप कर इंद्र को अपनी अस्थी दान की थी । यह स्थल 88 हजार ऋषियों की तपस्थली है। एक बार हजारों ऋषिगण राक्षसों के भय से दूर रहने के लिए ब्रह्माजी से उपाय पूछा तो ब्रह्माजी ने एक चक्र बनाया और ऋषियों का उसका अनुसरण करने को कहा। और कहा कि जहां इसकी नेमी (मध्य) भाग गिरेगा, जगह सबसे पवित्र व तपोभूमी होगी। शास्त्रों में कहा गया है कि अहिरावण को परास्त कर पाताललोक से हनुमानजी यहीं पर प्रकट हुए थे।यहां के सरोवर में जल पाताल लोक से आता है जो कभी नहीं सुखता है।

 

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कहते हैं  मुगल शासक औरंगजेब ने  देवदेवेश्वर धाम पर भी हमला किया था। उसने तलवार से दिव्य शिवलिंग को क्षतिग्रस्त करने का कई बार प्रयास किया। उस समय शिवलिंग से मधुमक्खियां व बर्रे निकलने लगे थे। इसके चलते मुगल शासक और उसकी सेना को भागना पड़ा था। सावन में देवदेवेश्वर धाम में श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। रुद्राभिषेक, जलाभिषेक, महामृत्युंजय महामंत्र पाठ, शिवपुराण व रामचरित मानस के पाठ के लिए हजारों श्रद्धालु आते हैं।