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हमारे देश में अभी पितृ पक्ष चल रहा है। इस दौरान पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए स्नान, दान, तर्पण समेत अन्य धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। श्राद्ध सिर्फ हमारे यहां ही नहीं होता, दुनिया के और भी देशों में होती है, बस तरीका अलग और अनोखा होता है।

जब हमारे अपने हमारा साथ छोड़कर चले जाते है तो हमें उनकी कमी हमेशा खलती है। कोई चाहकर भी इस कमी को पूरा नहीं कर पाता है। 15 दिनों के पितृपक्ष में हम खुद को अपने पूर्वजों के निकट पाते है वो दूर रहकर भी आत्मा से हमसे जुड़ जाते है।

जयपुर : माह – आश्विन, तिथि – तृतीया , पक्ष – कृष्ण , वार – मंगलवार, नक्षत्र – अश्विनी – पूर्ण रात्रि तक सूर्योदय – 06:06, सूर्यास्त – 18:24, चौघड़िया चर – 09:13 से 10:44,लाभ – 10:44 से 12:15, अमृत – 12:15 से 13:47, शुभ – 15:18 से 16:49

बच्चे जिद्दी और गुस्सैल स्वभाव के आजकल होते जा रहे हैं। जिसके कारण माता-पिता को काफी मानसिक और आर्थिक परेशानियों का सामना भी करना पड़ता है। शास्त्रों के ज्ञाता मानते हैं कि इस समस्या का समाधान संकट मोचक भगवान हनुमान की आराधना से संभव हो सकता है।

जयपुर:हिन्दू धर्म में विश्वकर्मा को सृजन का देवता माना जाता है। ऋग्वेद के अनुसार भगवान विश्वकर्मा को ही देव शिल्पी के नाम से जानते हैं। कहा जाता है कि सभी पौराणिक संरचनाएं भगवान विश्वकर्मा के द्वारा ही की गई थी।पौराणिक युग के सभी अस्त्र-शस्त्र भगवान विश्वकर्मा ने ही बनाए थे।

श्रृंगार में  महिलाओं को पहली पसंद ज्वेलरी होती है। सोने व चांदी की ज्वेलरी अधिकतर महिलाओं के पास देखने को मिल जाएगी। शादी के बाद सोलह श्रृंगार सोने की ज्वेलरी पहनना हर औरत की पहली पंसद होती है।

जयपुर: माह आश्विन, तिथि – द्वितीया, पक्ष – कृष्ण, वार – सोमवार,नक्षत्र – रेवती, सूर्योदय – 06:06,सूर्यास्त – 18:25, चौघड़िया अमृत – 06:10 से 07:41,शुभ – 09:13 से 10:44,चर – 13:47 से 15:19,लाभ – 15:19 से 16:50,अमृत – 16:50 से 18:22

आश्विन माह के कृष्ण पक्ष अष्टमी को माताएं जिउतिया व्रत स्वस्थ संतान और उसकी लंबी आयु  के लिए व्रत रखती है ये व्रत हर पुत्रव्रती महिला रखती है। इस बार 21 और 22 सितंबर को जिउतिया का व्रत रखेंगी। इस व्रत में निर्जला व निराहार रहना पड़ता है।

प्राय: कुछ लोग यह शंका करते हैं कि श्राद्ध में समर्पित की गईं वस्तुएं पितरों को कैसे मिलती है? कर्मों की भिन्नता के कारण मरने के बाद गतियां भी भिन्न-भिन्न होती हैं। कोई देवता, कोई पितर, कोई प्रेत, कोई हाथी, कोई चींटी, कोई वृक्ष और कोई तृण बन जाता है।

श्राद्ध के समय पितर लोक से पूर्वज आते हैं। उनका आशीर्वाद बना रहे इसके लिए पूर्वजों का श्राद्ध  किया जाता है। इन दिनों में पूर्वजों की आत्मा धरती पर आती हैं और भोग लगाने से उन्हें संतुष्टि होती हैं। इससे प्रसन्न होकर पित्तर अपना आशीर्वाद देते हैं। इ