वाराणसी में प्रबोधिनी एकादशी पर श्रद्धालुओं ने लगाई आस्था की डुबकी

Published by suman Published: November 11, 2016 | 3:48 pm

वाराणसी: कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को प्रबोधिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि आषाढ़ शुक्ल पक्ष एकादशी को भगवान विष्णु ने शंखासुर नामक राक्षस का वध किया था। राक्षस संग भयंकर युद्ध के बाद भगवान थक के निद्रा में चले गये और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जगे थे। इसलिए आषाढ़ से लेकर कार्तिक तक चार माह को चातुर्मास भी कहते हैं।

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भगवान विष्णु के शयन करने के साथ ही सारे शुभकार्य बंद हो गये थे। मगर प्रबोधिनी एकादशी पर उनके जागने के साथ ही मांगलिक कार्य शुरू हो जाएंगे।  पावन पर्व पर वाराणसी के घाटों पर आस्था और श्रद्धा का अभूतपूर्व नज़ारा नज़र आया आधी रात से ही श्रद्धालु काशी के पावन घाटों पर गंगा स्नान के लिए पहुंच गए। पर्वों की नगरी वाराणसी में हर त्योहार का एक विशिष्ट महत्व हैं।

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काशी का दशाश्वमेध घाट सबसे पावन माना जाता है पौराणिक  मान्यताओं के मुताबिक़ यहां पर ब्रह्म देव ने दस अश्वमेध यग्य किया था और यहां सनान मात्र से दस अश्वमेध यग्य के बराबर पुन्य प्राप्त होता। इस दिन श्रद्धालु गंगा स्नान करके नया गुड तिल ,आवला गन्ना आदि का दान भी करते हैं ।वाराणसी में लगातार एक महीने के कार्तिक स्नान के बाद आज लोग तुलसी विवाह करते हैं ।वाराणसी में वैसे तो पुरे साल स्नान ध्यान का महत्व होता है लेकिन एकादशी के दिन इसका विशेष महत्व होता है ।