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बिटकॉइन पहुंचा 43 लाख रुपये के पार, जानें यहां तक कैसे पहुंचा

बिटकॉइन एक डिजिटल मुद्रा है क्योंकि यह सिर्फ वर्चुअल रूप में ही उपलब्ध है। यानी इसका कोई नोट या कोई सिक्का नहीं है।

Neel Mani Lal

Neel Mani LalWitten By Neel Mani LalShreyaPublished By Shreya

Published on 7 April 2021 9:51 AM GMT

बिटकॉइन पहुंचा 43 लाख रुपये के पार, जानें यहां तक कैसे पहुंचा
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बिटकॉइन पहुंचा 43 लाख रुपये के पार, जानें यहां तक कैसे पहुंचा (फोटो- सोशल मीडिया)

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नई दिल्ली: आज की तारिख में एक बिटक्वाइन की कीमत 43 लाख रुपये से ज्यादा है। चंद वर्ष पहले इसे कोई जानता तक नहीं था और ये मिट्टी के मोल थी। जबसे टेस्ला के मालिक एलोन मस्क ने बित्क्वाइन और डॉगक्वाइन के बारे में खुल कर पैरवी की है तबसे इनकी लोकप्रियता बहुत तेजी से बढ़ी है।

क्या है बिटकॉइन?

बिटकॉइन एक डिजिटल मुद्रा है क्योंकि यह सिर्फ वर्चुअल रूप में ही उपलब्ध है। यानी इसका कोई नोट या कोई सिक्का नहीं है। यह एन्क्रिप्ट किए हुए एक ऐसे नेटवर्क के अंदर होती है जिसपर किसी बैंक या सरकार का कंट्रोल नहीं होता है। इससे बिटकॉइन या उसके जैसी किसी भी क्रिप्टोकरेंसी को पूरी दुनिया में एन्क्रिप्शन की मदद से इसका इस्तेमाल करने वालों की पहचान और गतिविधियों को गुप्त रखा जाता है।

बिटकॉइन दरअसल कंप्यूटर कोड की एक सीरीज है। यह जब भी एक यूजर से दूसरे के पास जाता है तो इस पर डिजिटल सिग्नेचर किए जाते हैं। लेन देन खुद को गोपनीय रख कर भी किया जा सकता है। इसी वजह से यह अच्छे और बुरे, दोनों लोगों के बीच काफी लोकप्रिय है।

(फोटो- सोशल मीडिया)

बिटकॉइन को डिजिटल वॉलेट में रखा जाता है जिसे या तो कॉइनबेस जैसे एक्सचेंज के जरिए ऑनलाइन हासिल किया जा सकता है या फिर ऑफलाइन हार्ड ड्राइव में एक खास सॉफ्टवेयर के जरिए। बिटकॉइन का समुदाय यह तो जानता है कि कितने बिटकॉइन हैं लेकिन वे कहां हैं इसके बारे में सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है। ये मुद्रा इतनी मशहूर है कि ब्लॉकचेन डॉट इंफो के मुताबिक औसतन हर दिन 3,00,000 लेनदेन होते हैं। हालांकि इसकी लोकप्रियता नगद या क्रेडिट कार्ड की तुलना में कम ही है। बहुत सारे लोग और कारोबार में इसे भुगतान के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

बिटकॉइन की सुरक्षा

तकनीक के जानकार कुछ लोग जिन्हें माइनर कहा जाता है वो इस सिस्टम में शामिल होते हैं। ब्लॉक चेन हर बिटकॉइन के लेनदेन का हिसाब रखता है। इस तरह से यह उन्हें दो बार बेचे जाने को रोकता है और माइनरों को उनकी कोशिशों के लिए तोहफों में बिटकॉइन दिए जाते हैं। जब तक माइनर ब्लॉकचेन को सुरक्षित रखेंगे इसकी नकल करके नकली मुद्रा बनने का डर नहीं रहेगा।

यहां तक कैसे पहुंचा बिटकॉइन

बिटकॉइन को 2009 में एक शख्स या फिर एक समूह ने शुरू किया जो सातोषी नाकामोतो के नाम से काम कर रहे थे। उस वक्त बिटकॉन को थोड़े से उत्साही लोग ही इस्तेमाल कर रहे थे। जब ज्यादा लोगों का ध्यान उस तरफ गया तो नाकामोतो को नक्शे से बाहर कर दिया गया। हालांकि इससे मुद्रा को बहुत फर्क नहीं पड़ा यह सिर्फ अपनी आंतरिक दलीलों पर ही चलता रहा।

2016 में एक ऑस्ट्रेलिया उद्यमी ने खुद को बिटकॉइन के संस्थापक के रूप में पेश किया। हालांकि कुछ दिनों बाद ही उसने कहा कि उसके पास सबूतों को जाहिर करने की "हिम्मत नहीं है।" इसके बाद से इस मुद्रा की जिम्मेदारी किसी ने नहीं ली है।

पर्यावरण को नुकसान

कोई भी क्रिप्टोकरेंसी बनाने की प्रक्रिया बेहद खर्चीली और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली होती है। किसी भी क्रिप्टोकरेंसी के निर्माण में एक-दो नहीं बल्कि हजारों कंप्यूटर एक साथ इस्तेमाल किए जाते हैं। और ये कोई मामूली कंप्यूटर नहीं होते बल्कि हेवी कन्फिगरेशन वाले होते हैं। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के मुताबिक, बिटकॉइन माइनिंग इतनी बिजली खपाता है जितनी स्विट्ज़रलैंड एक साल में बिजली पैदा करता है।

(फोटो- सोशल मीडिया)

क्लाइमेट चेंज और पर्यावरण को लेकर मुखर लोग बिटकॉइन के पूरी थ्योरी को ही नकारते हैं। उन्हें इसका इस्तेमाल समझ नहीं आता क्योंकि दुनियाभर में अमीरी-गरीबी की खाई इतनी गहरी है और समाज का एक हिस्सा ऐसा भी है जहां तक अभी तक बिजली जैसी बुनियादी जरूरत नहीं पहुंच पाई है। पर्यावरणविदों का मानना है कि डिजिटल करेंसी को लेकर ऐसा पागलपन और एक खास तबके का बिजली का यूं लापरवाही से इस्तेमाल करना, अन्याय है। इसमें कोई हैरानी नहीं होगी अगर अगले क्लाइमेट समिट में बिटकॉइन के विरोध में नारे लगें।

पर्यावरणविदों के इन अभियान पर टेस्ला के मालिक इलान मस्क ने पानी फेर दिया है। इलेक्ट्रिक कार बनाने वाले कंपनी टेस्ला हमेशा से ग्रीन एनर्जी की समर्थक रही है। क्रिप्टो एक्सपर्ट प्रो. डेविड येरमैक का कहना है कि आज किसी भी करोड़पति का लगाव टेस्ला कार और बिटकॉइन दोनों के लिए है और वह दोनों को रखना चाहता है। उनका मानना है कि जल्द ही बिटकॉइन को लेकर आम लोगों की धारणा और बदलेगी। बिटकॉइन माइनिंग के लिए हाइड्रो इलेक्ट्रिक या जियो थर्मल पावर का इस्तेमाल बढ़ रहा है, जो सराहनीय है।

इसमें कोई शक नहीं है कि बिटकॉइन जिसे भविष्य की करेंसी कहा जाता है, अब अपने ऊंचाई की ओर बढ़ चला है। इसकी कीमत में तेजी से उछाल और ढलान ही इसकी खासियत है। आने वाले दिनों में टेक कंपनियों के दखल से इसे मुख्यधारा में आने का मौका मिलेगा और यह पारंपरिक बाजार के नक्शे को बदल सकता है।

भारत में अभी क्रिप्टोकरेंसी को लेकर कोई नियमन नहीं है लेकिन इसका लेनदेन जारी है। क्रिप्टो करेंसी के कई ऑनलाइन एक्सचेंज काम कर रहे हैं। वैसे, क्रिप्टोकरेंसी चाहे जितनी लुभावनी लगी लेकिन इसमें निवेश सोच समझ कर करना चाहिए।

Shreya

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