बना सबसे बड़ा खतराः लगातार रूप बदल रहा कोरोना हो जाएं सावधान

वैज्ञानिक म्यूटेशन की प्रक्रिया को सिरे से खारिज भी नहीं कर रहे हैं। उनका कहना है कि इसी से पता चलेगा कि कोरोना वायरस का ख़तरा बढ़ रहा है या घट रहा है। प्रतिरोधी क्षमता विकसित होगी या नहीं। वैक्सीन और दवाओं को तैयार करने में जुटे वैज्ञानिकों के लिए इस पर हो रही शोध सकारात्मक नतीजे लाने में मददगार हो सकती है।

रामकृष्ण वाजपेयी

कोरोना वायरस जब से वजूद में आया है या ये कहें हमारी आपकी जानकारी में आया है तब से लेकर आज तक इस वायरस की चाल ढाल व्यवहार में कुछ न कुछ बदलाव रहे हैं और बदलाव की ये प्रक्रिया कब रुकेगी इस बारे में अभी कुछ भी साफतौर पर नहीं कहा जा सकता है। इसे इस तरह से भी समझा जा सकता है कि जब आप चल रहे टीवी को अचानक म्यूट कर देते हैं तो क्या टीवी बंद हो जाता है। टीवी चलता रहता है। कार्यक्रम आगे बढ़ता जाता है।

इसी तरह से पूरी दुनिया में कोरोना वायरस की प्रकृति में आ रहे बदलाव को लेकर उसके शात हो जाने को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं कि क्या वायरस कमजोर हो रहा है। या और ज्यादा आक्रामक रूप में सामने आने जा रहा है कुछ भी कहना जल्दबाजी है।

महामारी का अध्ययन करने वाले कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि अभी कोरोना वायरस के खत्म होने का समय आया ही नहीं है। इसमें अभी वक्त है। ये वक्त डेढ़ से दो साल का भी हो सकता है। कुल मिलाकर ये सब संभावनाएं हैं। सब अपने अपने ढंग से देख रहे हैं और नतीजे लिख रहे हैं।

अब तक दो सौ रूप बदल चुका है कोरोना

लेकिन जिस तरह अन्य वायरस बदलते हैं कोरोना वायरस भी म्यूटेट हो रहा है या बदल रहा है। ये वायरस का नेचर होता है। और इन बदलावों से वायरस की आक्रामकता में कोई बदलाव जल्दी आना संभव नहीं है।

यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ लंदन के लिए शोध करने वाले डॉक्टर लूसी वान डॉर्प का कहना है कि कोरोना वायरस में लगभग 200 तरह के म्यूटेशन हुए हैं और यह प्रक्रिया अभी जारी है। लेकिन उनका यह भी कहना है कि जीनोम से सीमित जानकारी ही मिलती है।

यूनिवर्सिटी ऑफ़ नॉटिंघम के प्रोफ़ेसर जोनथन बॉल भी कहते हैं कि अभी हमारे पास इसे लेकर कोई बायोलॉजी नहीं है, म्यूटेशन यानी बदलावों पर ध्यान देना दिलचस्प है, मगर इससे ज़्यादा की अभी कोई उम्मीद नहीं है।

कुछ वैज्ञानिक वायरस के ऊपर मौजूद स्पाइक में होने वाले म्यूटेशन का अध्ययन कर रहे हैं जिसके सहारे वायरस हमारे शरीर की कोशिकाओं के भीतर प्रवेश करता हैं। लेकिन बदलाव की इस लगातार जारी रहने वाली प्रक्रिया से यह भी हो सकता है कि वायरस और अधिक ताकतवर यानी संक्रामक हो जाए। या धीमा भी पड़ सकता है।

वैज्ञानिक म्यूटेशन की प्रक्रिया को सिरे से खारिज भी नहीं कर रहे हैं। उनका कहना है कि इसी से पता चलेगा कि कोरोना वायरस का ख़तरा बढ़ रहा है या घट रहा है। प्रतिरोधी क्षमता विकसित होगी या नहीं। वैक्सीन और दवाओं को तैयार करने में जुटे वैज्ञानिकों के लिए इस पर हो रही शोध सकारात्मक नतीजे लाने में मददगार हो सकती है।