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तुम क्या पियोगे चूमकर रख दो लबों से जाम, तस्लीम यह शराब है कितनों को पी गई

Rishi

RishiBy Rishi

Published on 4 Aug 2017 9:40 AM GMT

तुम क्या पियोगे चूमकर रख दो लबों से जाम, तस्लीम यह शराब है कितनों को पी गई
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संदीप अस्थाना

‘तुम क्या पियोगे चूमकर रख दो लबों से जाम, तस्लीम यह शराब है कितनों को पी गयी।’

आजमगढ़ : शराब की बेवफाई को आजमगढ़ ने कई बार जिया है। यह जहर पीकर मरने वाले परिजनों के परिवारों की त्रासदी को भी आजमगढ़ ने बखूबी महसूस किया है। कितने बचपन मर गये, कितनों के बुढ़ापे की लाठी टूट गयी तो न जाने कितने घरों में चिराग जलाने वाले भी नहीं रहे। जिनके मांग का सिन्दूर धुल गया उनकी पथराई आंखों में अब कोई सतरंगी सपने नहीं तैरते। सिर से बाप का साया उठने के बाद बैग वाले हाथों में भीख का कटोरा आ गया या उनके नसीब में मजदूरी लिख दी गयी। शासन-सत्ता ने भी दो आंखों से काम किया।

हाल ही में रौनापार व जीयनपुर में जहरीली शराब पीकर मरने वाले करीब तीन दर्जन लोगों में से 21 की जहरीली शराब से मौत होना मानकर प्रदेश की सरकार ने उनके आश्रितों को सवा दो-सवा दो लाख की आर्थिक मदद दी मगर 2013 में मुबारकपुर इलाके में जो 46 लोग जहरीली शराब पीकर मरे थे, उनके आश्रितों को फूटी कौड़ी भी नसीब नहीं हुई।

आदमपुर में अब नहीं चलते पावरलूम

आदमपुर के पूर्व ग्राम प्रधान जंगबहादुर चौहान बताते हैं कि मजदूरी और खेती बारी ही गांव के लोगों की आजीविका का जरिया है। तीन हजार के आसपास आबादी वाले इस गांव में आधा दर्जन लोग सरकारी नौकरी में हैं। गांव में चौहान और मुसलमान आबादी है। २00६-0७ में आदमपुर को निर्मल ग्राम पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

घर-घर बनवाए गए शौचालय दिखते हैं। स्वच्छता का राष्ट्रीय पुरस्कार और शिक्षा में इतना पीछे, इस बाबत पूछने पर ग्रामीण बताते हैं कि कभी गांव में २00 लूम चलते थे। काम-धंधे की कोई कमी नहीं थी। हमेशा बुनाई चलती रहती थी। ऐसे में सब लोग कमाने में लग गये। पढ़ाई लिखाई नहीं किये। लेकिन फैशन बदलने के साथ यहां के उत्पाद नकार दिए गए। अब गांव में एक भी लूम नहीं है। अब कुछ लोगों ने पढऩा-लिखना शुरू किया है।

प्यारेपुर चकिया में सता रही परिवार की चिंता

मुबारकपुर इलाके के प्यारेपुर चकिया गांव में जहरीली शराब से दो लोगों की मौत हुई थी। इन दोनों में शिवबचन राजभर व राजकुमार राजभर शामिल थे। दोनों की उम्र लगभग 45 वर्ष थी। शिवबचन अपनी बेवा उॢमला के ऊपर पांच लड़कियों व एक लडक़े के परवरिश की जिम्मेदारी छोड़ गया। उसका दुख भी औरों की तरह ही गाढ़ा है। राजकुमार की बेवा कमली की कहानी भी इनसे कुछ अलग नहीं है। तीन लडक़ी व तीन लडक़े हैं।

त्रासदी से अछूता नहीं रहा नरांव भी

मुबारकपुर इलाके के दर्जन भर से अधिक गांवों के लोगों में मौत बांटने वाला नरांव गांव खुद भी इस त्रासदी से अछूता नहीं रहा था। इस गांव में चार मौतें हुई थीं। पहली मौत अधिराज चौहान (55 वर्ष) की हुई थी। वह तीन लड़कियों व तीन लडक़ों का पिता था। मजदूरी करके परिवार का पेट पालता था। दूसरी मौत छत्तू की हुई थी। उसके चार लड़कियां व एक लडक़ा है। वह भी मजदूरी करके परिवार चला रहा था। रामबली चौहान की उम्र 18 साल ही थी। विवाह नहीं हुआ था। बाबूलाल का बेटा फौजदार 22 साल का था। हादसे के एक साल पहले ही उसकी शादी हुई थी। बाबूलाल गांव में ही चाय की दुकान चलाते थे और फौजदार फर्नीचर का काम सीख रहा था। सब खत्म हो गया।

फौजदार की मौत ने बाबूलाल की कमर ही तोड़ दी। शराब माफिया का गांव होने के कारण मौत के बाद भी उनके परिजनों को शराब माफिया की ज्यादती का शिकार होना पड़ा। मौत की घटना को दबाने-छुपाने के लिए माफिया ने आनन-फानन में शव फुंकवा दिए। पोस्टमार्टम भी नहीं होने दिया। इसके अलावा इस गांव में एक मौत जनार्दन की भी हुई थी। वह इस गांव का दामाद और मृत रामबली का जीजा था। जनार्दन चालीसवां गांव का रहने वाला था। रामबली की बूढ़ी मां की आंखों के आंसू अभी तक नहीं सूखे हैं। उसने एक ही झटके में अपना बेटा व दामाद दोनों खो दिया था।

ओझौली में महेंद्र का दर्द देखा नहीं जाता

ओझौली का त्रिभुवन चार लड़कियों व दो लडक़ों का पिता था। पूरा परिवार करघे पर काम करता था। उसने रोज की तरह घर पर लाकर शराब पी थी। त्रिभुवन की बेवा विद्यावती बताती है कि पीकर कहने लगे कि आज की शराब का स्वाद बहुत कड़वा है। कल उसे डांटना पड़ेगा कि अब ऐसी शराब मत देना। कहने लगी कि खुद ही चले गये सबकुछ छोडक़र। अब किसी से क्या शिकायत करेंगे। इसी गांव का महेन्द्र अपने घर के बरामदे में चारपाई पर लेटा था। शराब ने उसकी आंखों से रोशनी छीन ली है। महेन्द्र की तीन लड़कियां व दो लडक़े हैं। आंखें थीं तो ठेला चलाकर सबका पेट पालता था। कुछ देर शांत रहने के बाद कहता है कि कहने को तो सात सगे भाई हैं, मगर कोई मदद नहीं करता।

घटना के बाद विधायक पहुंचे थे, उनके परिजनों को पांच-पांच हजार की मदद दी मगर इस जिंदा लाश को वे भी नहीं पूछे। 32 साल के मोहन को भी यह जहरीली शराब लील गयी। उसके परिवार में पत्नी के अलावा एक बेटा व दो बेटियां हैं। वह मजदूरी करके परिवार का पेट पालता था। इसी गांव का रामदयाल राजभर शराब बेचता था। वह और उसके इकलौते बेटे प्रकाश दोनों को दारू लील गयी। प्रकाश की तीनों बहनों की शादी हो चुकी है। अब घर पर दोनों विधवा सास-बहू ही एक दूसरे का आंसू पोंछने के लिए रह गयी हैं। इसके अलावा गरीबी के साथ-साथ घर में प्रकाश के दो छोटे बेटे व एक बेटी भी है। गरीबी के कारण सास-बहू मजदूरी व गोबर पाथने का काम करती हैं।

कई अन्य गांवों में भी शराब ने ली जानें

कौडिया गांव के मनोज,गड़ेरूआ गांव के जालन्धर व मोतीलाल,अमिलो भगतपुरा के राजेन्द्र राम की इहलीला भी शराब की भेंट चढ़ गयी। अमिलो भरउटी के मंगल पटवा ठेला चलाते थे। वह अकसर ही गांव के बाहर बने शिवमंदिर पर सो जाते थे। उस दिन भी ऐसा ही हुआ था। मंदिर पर सोने वाले दूसरे लोगों ने उसके परिवार वालों को बताया था कि उसे भयानक पीड़ा हुई थी। उसके प्राण तड़प-तड़पकर निकले थे। चकिया गांव के दुक्खी को भी शराब लील गयी। दो लड़कियां व दो लडक़े हैं। दोनों लडक़े अब मुम्बई में मजदूरी करने लगे हैं।

आजादनगर के मोहम्मद मुबीन व देवली के मोहम्मद रजा उर्फ ताऊ भी यहीं जहरीली शराब पीकर मर गये। दोनों की पांच-पांच संतानें हैं और दोनों ही मजदूरी करके परिवार का पेट पालते थे। रजा की मौत के समय उसकी पत्नी गर्भवती थी। बाद में बेटा हुआ। देवली गांव के मजदूर मोहम्मद मारूफ की जिन्दगी भी शराब निगल गयी। इसके अलावा लोहरा सहित मुबारकपुर इलाके के कई अन्य गांवों में भी शराब ने लोगों की जान ली। इन गरीब परिवारों को सरकार से आर्थिक मदद के नाम पर कुछ भी नहीं मिला है।

अतरडीहा गांव में एक ही परिवार से उठी थी चार की अर्थी

मुबारकपुर के अतरडीहा गांव में एक ही परिवार से चार अर्थी उठी थी। जीरा, मुरारी, उमेश और फौजदार को जहरीली शराब निगल गयी थी। उमेश अविवाहित था। मुरारी के चार बच्चे हैं। वह मजदूरी करके सबका पेट पालता था। फौजदार के तीन लड़कियां व चार लडक़े हैं। वह वाराणसी में साड़ी बुनाई का काम करता था। दशहरा मनाने गांव आया हुआ था। तीन लड़कियों व दो लडक़ों का पिता जीरा बगल के गांव में ईंट पाथने का काम करता था। गांव वाले बताते हैं कि इन सभी के पोस्टमार्टम के लिए भी सडक़ जाम करना पड़ा था। इसके अलावा इस गांव में जहरीली शराब से तीन और लोगों की भी मौत हुई थी। इनमें राजकुमार,राजेन्द्र व रामजनम शामिल थे।

पति के मरने के कारण 20 साल के राजकुमार की पत्नी परमी समय से पहले ही बूढ़ी लगने लगी है। सबसे बुरा हाल रामजनम के परिवार का है। सात बच्चे हैं। पत्नी गीता कहती है कि खेती-बारी कुछ भी नहीं है। सिर्फ एक टाइम भोजन बनता है। बच्चे ननिहाल में रहते हैं।

आदमपुर में बोझ बन गयी कई लोगों की जिंदगी

आदमपुर प्राइमरी पाठशाला से आगे गांव में घुसते ही मोती चौहान पुत्र लक्खन चौहान का घर है। मोती चौहान की बेवा सुराती देवी घर के बाहर बैठी पथराई आखों से आने-जाने वालों को निहार रही थी। मोती चौहान के तीन लडक़े हैं। तीनों मजदूरी करते हैं, जमीन के नाम पर कुल पांच बिस्वा की काश्तकारी है। आॢथक सहयोग के बाबत पूछने पर उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। बोली कुछ भी नहीं। इसी गांव के दक्षिणी हिस्से में घुरभारी उर्फ घूरे चौहान का घर है। वही घूरे चौहान जिसे पुलिस ने अवैध शराब का कारोबारी बताया था। इस घर से कुल तीन लाशें उठी थी।

घूरे पाउच बेचता था यह बात सही है, लेकिन वह शराब का कारोबारी नहीं था। असल बात यह कि घूरे को खुद पीने की लत थी। घूरे की पत्नी रोते हुए बताती है कि इस गांव में जहरीली शराब से पहली मौत गोपाल की हुई। कहने लगी कि पीयत त रोज रहलैं, बहुत मने करत रहली, कबो-कबो झगड़ा कर लेत रहनी, छोट-छोट पाउच ले आवत रहन, दस रुपया का। बताया कि पड़ोस के गांव नरांव से बिकने के लिए आती थी यह शराब।

गोपाल की पत्नी उमरायी की उम्र 36-37 वर्ष के आसपास है। पांच बच्चियां सुषमा, प्रतिमा, रेशमा, सीमा, करिश्मा और तीन बेटे हिमांशु, अमन व छोटू । छोटू पेट में था जब गोपाल को शराब निगल गयी। उमरायी की आंखों में अभी भी सारे दृश्य तरोताजा हैं। जरा सा कुरेदने पर रोते-रोते बताती है कि पीकर आए तो हमने सोचा रोज की तरह ही पीकर आए होंगे। कुछ ही घंटों बाद अचानक आंख से न दिखने की शिकायत की। अस्पताल लेकर गये, लेकिन कुछ भी हाथ न लगा। कुछ ही देर बाद छटपटाते-छटपटाते सो गये, फिर कभी नहीं उठे। वह बढ़ईगिरी करते थे। आदमपुर में कुल आठ लोग शराब के शिकार हुए थे।

इनमें से केवल तीन का ही पोस्टमार्टम हुआ था। गांव के लोग बताते हैं कि प्रशासन ने घटना को दबाने की पूरी कोशिश की। लाशों को जल्दी दफनाने-फूंकने के लिए दबाव बनाया।

यह शराब आती कहाँ से थी, के जबाव में अधिकांश ने नरांव का नाम लिया। घूरे की बेवा ने बताया कि ‘केरमा क मुलायमा के इहां से भेजि जात रहल इ जहर।’ घूरे के बड़े लडक़े का नाम शास्त्री था। घूरे के पांच लड़कियां, दो लडक़े। छोटा बेटा संजय 35 वर्ष का था। संजय की तीन लडक़ी और एक लडक़ा है। घूरे, शास्त्री और संजय तीनों मर गये थे। पहले बूढ़े पिता के प्राण निकले फिर नौजवान पुत्रों के। गांव वाले मानते हैं कि दोनों की गलती थी। पीने वालों की भी और पिलाने वाले की भी। गांव में ही बिकने के कारण उधारी लेकर भी लोग पी लेते थे।

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आशीष शर्मा ऋषि वेब और न्यूज चैनल के मंझे हुए पत्रकार हैं। आशीष को 13 साल का अनुभव है। ऋषि ने टोटल टीवी से अपनी पत्रकारीय पारी की शुरुआत की। इसके बाद वे साधना टीवी, टीवी 100 जैसे टीवी संस्थानों में रहे। इसके बाद वे न्यूज़ पोर्टल पर्दाफाश, द न्यूज़ में स्टेट हेड के पद पर कार्यरत थे। निर्मल बाबा, राधे मां और गोपाल कांडा पर की गई इनकी स्टोरीज ने काफी चर्चा बटोरी। यूपी में बसपा सरकार के दौरान हुए पैकफेड, ओटी घोटाला को ब्रेक कर चुके हैं। अफ़्रीकी खूनी हीरों से जुडी बड़ी खबर भी आम आदमी के सामने लाए हैं। यूपी की जेलों में चलने वाले माफिया गिरोहों पर की गयी उनकी ख़बर को काफी सराहा गया। कापी एडिटिंग और रिपोर्टिंग में दक्ष ऋषि अपनी विशेष शैली के लिए जाने जाते हैं।

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