रवि किशन किसके मिशन, यह उम्मीदवार योगी की पसंद नहीं

Published by seema Published: April 19, 2019 | 12:53 pm
Modified: April 19, 2019 | 12:54 pm

रवि किशन किसके मिशन, यह उम्मीदवार योगी की पसंद नहीं

पूर्णिमा श्रीवास्तव
गोरखपुर। लंबी मंत्रणा, बहस, बैठक दर बैठक, अटकलों के बीच आखिरकार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की परम्परागत सीट गोरखपुर से भाजपा को प्रत्याशी मिल ही गया। नाम, रवि किशन। काम, अभिनय। सियासी अनुभव भाजपा के पक्ष में प्रचार और जौनपुर से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव हारने का। 15 अप्रैल को जैसे ही गोरखपुर से बतौर भाजपा प्रत्याशी भोजपुरी फिल्मों में अभिनेता रवि किशन के नाम की घोषणा हुई वैसे ही सोशल मीडिया गुलजार हो गया। जो टिकट की उम्मीद में थे उनके समर्थक तो फायर थे ही, आम लोगों की निराशा भी पोस्ट में साफ झलक रही थी। खैर, अब भाषा बदल रही है।
खांटी समर्थक यह लिखकर संतोष कर रहे हैं कि योगी आदित्यनाथ के विकास कार्यों को देखें, प्रत्याशी का चेहरा नहीं। जाहिर है योगी समर्थकों को गोरखपुर से भाजपा की हार के इफेक्ट का अंदेशा अच्छी तरह मालूम है। रवि किशन का नाम सामने आने के साथ ही दर्जनों सवाल उछलने शुरू हो गए। मसलन, क्या योगी के विकल्प हैं रवि किशन! क्या रवि किशन योगी की पसंद हैं! यदि नहीं तो किसकी पसंद है! आखिर सीट पर योगी की पसंद को दरकिनार क्यों किया गया! सवाल यह भी क्या योगी का गोरखपुर से मोह खत्म हो रहा है या फिर भाजपा में कोई ऐसा धड़ा भी है जो गोरखपुर से चुनाव हारने में खुद का भला देख रहा है। रवि किशन को गोरखपुर के सियासी मैदान में उतारे जाने के पीछे का मिशन क्या है? या फिर रवि किशन किसी राजनेता के दिमाग मे चल रहे खेल का मोहरे हैं। वैसे, इन सवालों का जवाब जीत-हार से तय होगा, लेकिन रवि किशन को लेकर गोरखपुर एक बार सुर्खियों में जरूर है।

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सिर्फ मोदी का गुणगान
टिकट पाने के बाद रवि किशन का बयान भी बहुत कुछ कहता है। योगी के गढ़ में उतारे गए रवि किशन ने सिर्फ मोदी का गुणगान किया। वह कहते हैं कि उपचुनाव की हार भूल जाइए। वह उपचुनाव था, ये प्रधानमंत्री जी का चुनाव है। गांव-गांव में, बच्चे-बच्चे के मुंह पर मोदी हैं। उनकी कार्यशैली, उनकी नि:स्वार्थता, सच्चाई और उनकी सभी चीजों से मैं प्रभावित हूं। पूरी तरह मोदी के लिए समर्पित हो गया हूं। भले ही योगी भी मोदी का जाप कर रहे हों, लेकिन रवि किशन द्वारा सिर्फ मोदी जाप योगी समर्थकों को फिलहाल रास नहीं आ रहा है।
दरअसल, 15 अप्रैल को भाजपा की सूची में शामिल सात नाम में से गोरखपुर-बस्ती मंडल के जिन तीन सीटों पर चेहरों को उतारा गया उनमें से कई योगी की पंसद के नहीं बताए जा रहे हैं। देवरिया से प्रत्याशी बनाए गए पूर्व भाजपा अध्यक्ष डॉ रमापति राम त्रिपाठी योगी पर 2009 के विधानसभा चुनाव में टिकट बेचने का आरोप लगाते हुए बगावत तक कर चुके हैं। पिछले दिनों संतकबीर नगर के सांसद और डॉ रमापति त्रिपाठी के पुत्र शरद त्रिपाठी ने योगी के करीबी विधायक राकेश सिंह बघेल को जिस तरह से जूतों से भरी बैठक में पीटा था, तब भी अंदरखाने से योगी का गुस्सा दिखा था। खैर, मौजू सवाल यह है कि गोरखपुर से रवि किशन को लड़ाने का समीकरण क्या है। कोई स्वीकारने को तैयार नहीं दिख रहा है कि भोजपुरी फिल्मों के अभिनेता रवि किशन योगी की पसंद हैं।

संजय निषाद कर रहे थे ब्लैकमेलिंग
उपचुनाव में भी योगी की पसंद को दरकिनार किया गया। गोरखपुर सीट पर पिछले वर्ष हुए उपचुनाव में प्रवीण निषाद ने सपा के टिकट पर चुनाव जीता था। तब पार्टी ने उपेन्द्र दत्त शुक्ला को चुनाव मैदान में उतारा था। यह वहीं उपेन्द्र दत्त शुक्ला हैं जिन्होंने डेढ़ दशक पहले कौड़ीराम सीट पर हुए उपचुनाव में योगी समर्थित उम्मीदवार के समक्ष चुनाव लड़ा था। तब भाजपा के साथ योगी समर्थित प्रत्याशी को हार का मुंह देखना पड़ा था। उपचुनाव में योगी ने मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहते हुए उपेन्द्र दत्त शुक्ला के पक्ष में 24 से अधिक सभाएं कीं। लेकिन इन सभाओं में जुट रही मुठ्ठी भर भीड़ ने परिणाम की तरफ इशारा कर दिया था। रही सही कसर मतदान के दिन पूरी हो गई। जब योगी समर्थक तमाम भाजपाई नेपाल की सैर पर निकल गए और एक धड़ा घर में बैठकर जीत-हार का समीकरण सेट करता रहा। बहरहाल, चुनाव परिणाम आया तो उपेन्द्र के खाते में हार मिली और सपा के प्रवीण गोरक्षपीठ के दो दशक से अधिक पुराने तिलिस्म को तोडऩे में कामयाब हुए। इस बार चुनाव में सपा की तरफ से प्रवीण निषाद का लडऩा तय था, लेकिन प्रवीण के पिता और निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय निषाद की ब्लैकमेलिंग ने समीकरण को उलट-पलट दिया। दरअसल, संजय निषाद बेटे को गोरखपुर, खुद महराजगंज और बाहुबली धनंजय सिंह को जौनपुर से टिकट दिलाना चाहते थे। ब्लैकमेलिंग के आजिज सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पैंतरा बदला तो भाजपा का एक खेमा डॉ संजय निषाद को लेकर योगी के पास पहुंच गया।

गोरखपुर में कई नाम थे चर्चा में
महत्वपूर्ण यह है कि संजय को योगी से मिलाने वाले प्रदेश सरकार के मंत्री थे सिद्धार्थनाथ सिंह। लेकिन मुलाकात के चंद मिनटों बाद ही वायरल हुई मीटिंग की फोटो ने काफी कुछ संकेत दे दिया। दरअसल योगी कभी भी निषाद पार्टी से गठबंधन के पक्ष में नहीं थे, न पार्टी में शामिल होने से चंद घंटे पहले करोड़ों के लेनदेन के स्टिंग में फंसे प्रवीण निषाद को भाजपा में शामिल करने के। गोरखपुर सीट से योगी ने कई विकल्पों पर विचार किया था। उनकी पहली पसंद संगठन से जुड़े धर्मेन्द्र सिंह थे, जिन्हें वह महापौर का टिकट दिलाने में नाकामयाब रहे थे। दलित समीकरण में गोरखनाथ मंदिर के पुजारी कमलनाथ की चर्चा थी। वहीं ठाकुर जाति की सियासत में पूर्व मंत्री फतेह बहादुर सिंह और सैथवार नेता और विधायक महेन्द्र पाल सिंह का नाम उछला। निषाद वोटों के समीकरण में पूर्व मंत्री जमुना निषाद के बेटे अमरेन्द्र और पत्नी राममति निषाद को पार्टी में शामिल कराकर टिकट का भरोसा दिया गया। अब सवाल उठता है कि जिन दिग्गजों ने गोरखपुर से चुनाव लड़कर संसद तक पहुंचने का सपना देखा वह कितनी निष्ठा से रवि किशन के साथ होंगे? अमरेन्द्र निषाद कहते हैं कि पार्टी के निर्देश का इंतजार है तो उपेन्द्र दत्त शुक्ला दबी जुबान में कहते हैं कि पार्टी ने जिसे टिकट दे दिया उसके पक्ष में प्रचार करना मजबूरी है। पूर्व मंत्री राजेश त्रिपाठी ने पहले तो रवि किशन के नाम पर आश्चर्य जताया, लेकिन बाद में यह कहते हुए दिखे कि रवि और आदित्य सूर्य के पर्यायवाची हैं। योगी के साथ रवि को चमकने से कोई ताकत नहीं रोक सकती है।

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जौनपुर में रवि किशन की जब्त हो चुकी है जमानत
सियासत की पिच पर सफल मनोज तिवारी का अनुसरण करते हुए वर्ष 2014 में रवि किशन को भी सियासत की चाह उठी और अचानक वे राजनीति में आ गए। कांग्रेस के टिकट पर अपनी पैतृक सीट जौनपुर से चुनाव भी लड़े पर उन्हें केवल 42,759 वोट मिले और वे हार गए। 2017 में उन्होंने नरेन्द्र मोदी से प्रभावित होकर भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली। अब उनका दावा है कि गोरखपुर को कर्मभूमि बनाकर मोदी को मजबूत करेंगे।

रवि किशन के सियासी गुरु को हरा चुके हैं योगी
रवि किशन के सियासत में एंट्री के पीछे दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष और भोजपुरी गायक मनोज तिवारी के सपोर्ट को वजह बताया जा रहा है। मनोज तिवारी दस साल पहले गोरखपुर लोकसभा सीट से सपा के टिकट पर योगी के खिलाफ ताल ठोक चुके हैं। 2009 के लोकसभा चुनाव में योगी को 4,03,156 वोट मिले थे तो वहीं सपा की साइकिल पर सवार मनोज तिवारी 83,059 वोट पाकर अपनी जमानत भी नहीं बचा सके थे।

कहीं उलटफेर का संकेत तो नहीं
गोरखपुर-बस्ती मंडल की नौ लोकसभा सीटों पर घोषित अधिकतर सीटों के प्रत्याशी योगी की पसंद के नहीं है। देवरिया से घोषित डॉ रमापति राम त्रिपाठी कभी योगी की पसंद नहीं रहे हैं। महराजगंज से प्रत्याशी पंकज चौधरी डॉ.रमापति राम को अपना गुरु बताते हैं। गोरखनाथ मंदिर को पिछले दिनों पैदल मार्च पर निकले सपा सांसद प्रवीण निषाद पर जिस प्रकार पुलिस ने लाठियां भांजी थी, वह किसी दोस्ती का संकेत तो नहीं ही है। इस लाठीचार्ज में प्रवीण के हाथ में गंभीर चोट आई थी। कभी हिन्दू युवा वाहिनी के सक्रिय सदस्य रहे विजय दूबे कांग्रेस के करीब हुए तो योगी ने उनसे दूरी बना ली थी। पार्टी ने विजय दूबे को कुशीनगर में उतारा है। बस्ती में हरीश द्विवेदी, डुमरियागंज में जगदम्बिका पॉल, सलेमपुर में रविन्द्र कुशवाहा भले ही योगी विरोधी नहीं हों, लेकिन खांटी समर्थक भी नहीं हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर वह कौन है जिसे योगी की पसंद की परवाह नहीं है जिसे योगी की हार में कुछ फायदा नजर आ रहा है। इस खेल को समझने के लिए कुछ संकेतों को समझना होगा। संतकबीरनगर में शरद त्रिपाठी और राकेश सिंह बघेल के बीच जूता चला तो आक्रोशित समर्थकों ने शरद को घेर लिया था। चर्चा है कि सुस्त पड़े प्रशासन से केन्द्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश के बाद बघेल के समर्थकों पर लाठीचार्ज किया था। जूताकांड के बाद शरद का टिकट कटना तो तय था, लेकिन योगी विरोधी खेमे ने कई दिग्गजों को दरकिनार कर डॉ.रमापति त्रिपाठी को देवरिया से टिकट दिला दिया। योगी की मंशा के विपरीत निषाद पार्टी से गठबंधन के पीछे भी इसी धड़े के खेल को वजह बताया जा रहा है। अब सवाल उठता है कि योगी की हार में किसे फायदा होने वाला है। क्या भाजपा का एक धड़ा चुनाव बाद के परिदृश्य को ध्यान में रखकर शतरंज की सियासी विसात पर चालें चल रहा है। सवाल यह भी क्या चुनाव बाद प्रदेश में बड़ा उलटफेर होगा। सवाल तो तमाम है, लेकिन जवाब चुनाव बाद का आंकड़ा ही देगा।

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