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Kuch Kuch Hota Hai Movie: वह फ़िल्म जिसे एक पीढ़ी ने सिनेमाघर में नहीं, अपने दिल में देखा
Kuch Kuch Hota Hai Movie: जानिए क्यों ‘कुछ कुछ होता है’ सिर्फ एक फिल्म नहीं बल्कि 90s की पूरी पीढ़ी की भावनात्मक पहचान बन गई।
Bollywood Old Movie Kuch Kuch Hota Hai
Kuch Kuch Hota Hai Movie: याद है वह दौर? जब फ्रेंडशिप बैंड बाँधना दोस्ती का सबसे बड़ा सबूत था। जब कैसेट पर गाना रिवाइंड करके बार-बार सुना जाता था। जब कॉलेज जाने की कल्पना में रंगीन कैंपस, बास्केटबॉल कोर्ट और अंग्रेज़ी मिली-जुली हिंदी होती थी। उस दौर को एक फ़िल्म ने परिभाषित किया - 'कुछ कुछ होता है'।
करण जौहर की आत्म-घोषणा
1998 का साल। करण जौहर पहली बार निर्देशक की कुर्सी पर बैठे थे। लेकिन यह केवल किसी का पहला निर्देशन नहीं था। यह एक पीढ़ी का सिनेमाई घोषणापत्र था। करण जौहर जानते थे कि भारतीय युवा बदल चुका है। एमटीवी आ चुकी थी। केबल टेलीविज़न घरों में था। ब्रांडेड कपड़े और अंग्रेज़ी शब्द रोज़मर्रा की ज़िंदगी में घुस आए थे। पुराना रोमांस, गाँव, परंपरा, आँचल, उस पीढ़ी की भाषा नहीं रहा था।
लेकिन एक बात नहीं बदली थी। वह थी - भावनाएँ।
करण जौहर ने यह समझा और उन्होंने एक ऐसी फ़िल्म बनाई जो बाहर से आधुनिक थी, लेकिन भीतर से पूरी तरह भारतीय। यही उनकी सबसे बड़ी रचनात्मक चतुराई थी।
एक कहानी जो सतह पर सरल, भीतर से जटिल है
राहुल, अंजलि, टीना - तीन नाम। एक प्रेम त्रिकोण। सुनने में साधारण लगता है। लेकिन 'कुछ कुछ होता है' असाधारण इसलिए नहीं है कि उसकी कहानी जटिल है। वह असाधारण इसलिए है क्योंकि उसने उस सबसे सामान्य मानवीय सच को छुआ कि हम अक्सर सबसे ज़रूरी रिश्ते को बहुत देर से पहचानते हैं।
राहुल अंजलि को प्रेम में नहीं देखता। वह उसे दोस्त देखता है, भरोसेमंद, हँसाने वाली, हमेशा साथ खड़ी रहने वाली। और इसीलिए वह उसे प्रेम की नज़र से नहीं देख पाता। यही भावनात्मक अंधापन 'कुछ कुछ होता है' का असली विषय है। यह प्रेम-त्रिकोण नहीं बल्कि भावनात्मक परिपक्वता की यात्रा है।
शाहरुख खान: करिश्मा और कमज़ोरी का अनोखा मेल
शाहरुख खान 1998 तक रोमांटिक सुपरस्टार के रूप में स्थापित हो चुके थे। 'दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे' ने उन्हें एक पीढ़ी का प्रेमी बना दिया था।
लेकिन 'राहुल' अलग था। वह करिश्माई था लेकिन भावनात्मक रूप से अपरिपक्व। उसे देर से समझ आता है कि असली प्रेम ग्लैमर में नहीं, भरोसे में होता है। यह कमज़ोरी उसे मानवीय बनाती थी।
शाहरुख खान की सबसे बड़ी ताकत यही थी कि वे स्टार होते हुए भी कमज़ोर दिख सकते थे। और इसीलिए करोड़ों दर्शकों ने राहुल में अपने आपको देखा।
काजोल: वह किरदार जो परिभाषा बन गया
हिंदी सिनेमा की सबसे प्रभावशाली महिला पात्रों में 'अंजलि' का नाम आता है। ये इसलिए नहीं कि वह सबसे सुंदर थी। बल्कि इसलिए कि वह सबसे सच्ची थी।
कॉलेज में वह टॉमबॉय थी, शरारती, प्रतिस्पर्धी, खुलकर बोलने वाली। और वही अंजलि जब दूसरे भाग में दिखाई देती है तो परिपक्व, शांत, अपनी भावनाओं को छिपाती हुई। दर्शक समझता है कि बीच में कितना दर्द गुज़रा होगा।
काजोल ने इन दोनों रूपों को एक ही किरदार में जिया। बिना किसी असंगति के।
करण जौहर ने बाद में कहा था कि अगर काजोल नहीं होतीं, तो 'कुछ कुछ होता है' यह फ़िल्म नहीं होती।
रानी मुखर्जी और वह किरदार जो खलनायिका नहीं बना
'टीना' का किरदार लिखना सबसे कठिन था।
वह प्रेम-त्रिकोण का तीसरा कोण थी जिसे हिंदी सिनेमा अक्सर खलनायिका बना देता है। करण जौहर ने ऐसा नहीं किया।
टीना जानती है कि राहुल और अंजलि के बीच कुछ अधूरा रह गया है। और मृत्यु के बाद भी वही अपनी बेटी के ज़रिए उस कहानी को पूरा करने की कोशिश करती है।
यह विचार कि एक स्त्री मरने के बाद भी किसी दूसरे के प्रेम को पूरा करना चाहती है, फ़िल्म को साधारण रोमांस से बहुत ऊपर उठा देता है।
रानी मुखर्जी ने इस सीमित लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण किरदार को वह गर्माहट दी जो उसे याद रखने लायक बनाती है।
सेट डिज़ाइन : कॉलेज सपने जैसा
करण जौहर ने अपने कला निर्देशक को एक ही निर्देश दिया था कि यह कॉलेज वास्तविक नहीं लगना चाहिए। यह वैसा लगना चाहिए जैसा दर्शक सोचते हैं कि कॉलेज होना चाहिए।
रंगीन कैंपस। चौड़े कॉरिडोर। बास्केटबॉल कोर्ट। फैशन-प्रधान युवा।
यह यथार्थवादी कॉलेज नहीं था। यह एक सपना था।
और यही सपना लाखों भारतीय किशोरों की कॉलेज जीवन की पहली कल्पना बन गया।
संतोष थुंडियिल की सिनेमैटोग्राफी
'कुछ कुछ होता है' की दृश्य भाषा का एक सिद्धांत था कि हर फ्रेम भावनात्मक रूप से सुंदर होना चाहिए।
सिनेमैटोग्राफर संतोष थुंडियिल ने मुलायम रोशनी, गर्म रंग और रोमांटिक फ्रेमिंग से एक ऐसी दुनिया बनाई जो वास्तविक नहीं लगती लेकिन महसूस बिल्कुल वास्तविक होती है। यह स्मृति की सिनेमैटोग्राफी थी। जैसे पुरानी तस्वीरें थोड़ी धुंधली और थोड़ी सुनहरी होती हैं, इस फ़िल्म के फ्रेम वैसे ही हैं।
जतिन-ललित का संगीत: एक पीढ़ी की भावनात्मक भाषा
जब 'कुछ कुछ होता है' का संगीत रिलीज़ से पहले बाज़ार में आया तो कैसेट की दुकानों पर भीड़ लग गई।
जतिन-ललित ने वह किया जो उस समय बॉलीवुड संगीत को चाहिए था - आधुनिक ध्वनि और भावुक मेलोडी का दुर्लभ संतुलन।
'तुझे याद ना मेरी आई'- अधूरे प्रेम का सबसे सटीक गीत। 'कोई मिल गया' - दोस्ती और रोमांस का खेल। 'साजन जी घर आये' - जो बॉलीवुड विवाह-उत्सव दृश्यों की नई भाषा बन गई।
उदित नारायण और अलका याज्ञनिक की आवाज़ों ने इन गीतों को वह मानवीय छुअन दी जो केवल स्वर-संरचना से नहीं आती। और 'कुछ कुछ होता है' - वह शीर्षक गीत जो फ़िल्म का थीम नहीं, उस पीढ़ी की भावनात्मक पहचान बन गया।
वह फैशन जो स्कूलों तक पहुँचा
फ़िल्म रिलीज़ हुई। और अगले कुछ महीनों में भारत के स्कूलों और कॉलेजों में एक अजीब बदलाव आया।
लड़कियाँ स्पोर्टी शैली में आने लगीं। लड़कों के हाथों में फ्रेंडशिप बैंड दिखाई देने लगे। काजोल का टॉमबॉय लुक और रानी मुखर्जी का मिनिमल ग्लैमर, दोनों एक साथ ट्रेंड बन गए। यह किसी फ़िल्म का कॉस्ट्यूम डिज़ाइन नहीं था। यह एक पीढ़ी की पहचान बन गई थी।
भावनात्मक संरचना जो दिखती नहीं लेकिन काम करती है
'कुछ कुछ होता है' की सबसे बड़ी तकनीकी उपलब्धि उसका "इमोशनल विज़ुअल डिज़ाइन" था।
फ़िल्म का हर तत्व यानी रोशनी, रंग, कॉस्ट्यूम, संगीत, कैमरा एक साथ दर्शक को भावनात्मक रूप से निर्देशित करता है।
जब कॉलेज वाला भाग है तो रंग चटख हैं, कैमरा तेज़ और गतिशील है, संगीत ऊर्जावान है। जब दुख का भाग आता है तो रोशनी नरम होती है, कैमरा धीमा होता है, और मौन अधिक बोलता है।
यह इमोशनल रिद्म इतनी कुशलता से बुना गया है कि दर्शक को पता ही नहीं चलता। वह बस महसूस करता रहता है। और यही महसूस करना, यही फ़िल्म की असली ताकत है।
'कुछ कुछ होता है' के बाद बॉलीवुड रोमांस बदल गया
हर निर्माता ने युवा-ग्लैमरस लेकिन पारिवारिक फ़िल्म बनाने की कोशिश की। 'कभी खुशी कभी ग़म', 'कल हो ना हो', 'मोहब्बतें' - पूरी 'धर्मा' शैली इसी फ़िल्म से जन्मी।
विदेशों में बसे भारतीयों के लिए यह फ़िल्म एक अलग अर्थ लेकर आई। वह भारत जो वे छोड़ आए थे, वह भाषा जो वे भूलने लगे थे, वह भावनात्मक दुनिया जिसकी उन्हें तलाश थी, सब यहाँ था।
'कुछ कुछ होता है' एनआरआई बॉलीवुड संस्कृति की आधारशिला बन गई।
अधूरापन, जो फ़िल्म को अमर बनाता है
फ़िल्म का दूसरा भाग दरअसल खोये हुए समय की खोज है। राहुल और अंजलि केवल दो लोग नहीं हैं जो फिर से मिल रहे हैं। वे अपनी अधूरी युवावस्था, अपने अनकहे भाव और उन रिश्तों के पास लौट रहे हैं जिन्हें उन्होंने अपने-अपने डर से बचाकर रखा था।
और यही भावनात्मक वापसी हर उस इंसान को छूती है जिसने कभी किसी रिश्ते को बहुत देर से समझा। हर पीढ़ी में ऐसे लोग होते हैं। इसीलिए हर पीढ़ी इस फ़िल्म को अपना समझती है।
'कुछ कुछ होता है' इसलिए महान नहीं है कि उसने रिकॉर्ड तोड़े। वह इसलिए महान है क्योंकि उसने एक पूरी पीढ़ी को उसकी अपनी भावनात्मक भाषा दी।
वह भाषा जिसमें दोस्ती और प्रेम के बीच की रेखा धुंधली थी। जहाँ सबसे ज़रूरी रिश्ते को समझने में वक़्त लगा।
और जहाँ अंत में जब समझ आया तो देर हुई थी।
लेकिन बहुत देर नहीं।


