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Satya Movie: वह फ़िल्म जिसने मुंबई का नर्क दिखाया और क्राइम फिल्मों की भाषा बदल दी
Bollywood Old Movie Satya: 1998 में आई ‘सत्या’ ने हिंदी सिनेमा में क्राइम फिल्मों की भाषा बदल दी।
Bollywood Old Movie Satya Full Story
Bollywood Old Movie Satya:1990 का दशक। अख़बारों में रोज़ खबरें होती थीं - सुपारी हत्या, गैंगवार, पुलिस मुठभेड़। दाऊद इब्राहिम और छोटा राजन के नाम हर घर में जाने जाते थे। शहर के भीतर एक और शहर था जो रात को जागता था, गोलियाँ चलाता था, और सुबह होते-होते फिर छिप जाता था। लेकिन हिंदी सिनेमा? वह अब भी गैंगस्टरों को स्टाइलिश सूट पहनाकर, चमकदार गाड़ियों में बैठाकर और रोमांटिक पृष्ठभूमि में दिखा रहा था। अपराध एक तमाशा था, खतरनाक लेकिन आकर्षक। 1998 में राम गोपाल वर्मा ने यह तमाशा बंद किया। 'सत्या' आई और परदे पर पहली बार मुंबई का वह चेहरा दिखाई दिया जिसे सिनेमा ने हमेशा छिपाया था।
राम गोपाल वर्मा: वह फ़िल्मकार जो डरता नहीं था
राम गोपाल वर्मा 'रंगीला' की सफलता के बाद उद्योग के चहेते बन चुके थे। वे आसान रास्ता ले सकते थे, एक और रंगीन, मनोरंजक फ़िल्म का। लेकिन उन्होंने ये रास्ता नहीं लिया। वे मुंबई अंडरवर्ल्ड को लेकर जुनूनी हो रहे थे। पत्रकारों से मिलते थे जो क्राइम बीट कवर करते थे। पुलिस अधिकारियों से बातें करते थे। उन इलाकों में जाते थे जहाँ सामान्य आदमी नहीं जाता। एक बार उन्होंने कहा था, "मुझे गैंगस्टर की स्टाइल नहीं, उसका डर दिखाना था। वह डर जो उसे खुद लगता है।"
यही सोच 'सत्या' की नींव थी
अनुराग कश्यप और सौरभ शुक्ला: वह कलम जिसने भाषा बदल दी 'सत्या' की पटकथा और संवाद लिखे अनुराग कश्यप और सौरभ शुक्ला ने। दोनों मुंबई की सड़कों, गलियों और उन लोगों को जानते थे जो शहर के अँधेरे कोनों में रहते थे। उन्होंने तय किया कि फ़िल्म के किरदार फिल्मी नहीं बोलेंगे।
पहले ड्राफ्ट के बाद राम गोपाल वर्मा ने कहा था - और असली। और गंदा। और सच।
तीनों ने मिलकर ऐसी भाषा गढ़ी जो हिंदी सिनेमा ने पहले कभी नहीं सुनी थी। गालियाँ थीं, लेकिन वे चरित्र का हिस्सा थीं। अधूरे वाक्य थे, लेकिन उनमें पूरी ज़िंदगी थी।
'सत्या' के बाद हिंदी सिनेमा के अपराध संवादों की पूरी ध्वनि बदल गई।
मनोज बाजपेयी: एक किरदार जो इतिहास बन गया 'सत्या' का शीर्षक पात्र सत्या है। लेकिन फ़िल्म से जो नाम इतिहास में दर्ज हुआ, वह था भीकू म्हात्रे।
मनोज बाजपेयी उस समय लगभग अज्ञात थे। बड़े बैनर नहीं। बड़ी फ़िल्में नहीं। बस एक कलाकार जो काम की तलाश में था। राम गोपाल वर्मा ने उन्हें देखा और पहली नजर में अप्रूव कर दिया।
मनोज बाजपेयी ने भीकू के लिए महीनों तैयारी की। मुंबई के उन इलाकों में घूमे जहाँ छोटे गुंडे रहते थे। उनकी चाल देखी। बात करने का तरीका सुना। हाथ से बाल कैसे हटाते हैं, कैसे बैठते हैं, गुस्से में आवाज़ कहाँ से आती है ये सब नोट किया।
"मुंबई का किंग कौन?" वाला दृश्य जो फ़िल्म इतिहास में अमर हो चुका है कई बार शूट हुआ। हर बार मनोज बाजपेयी ने उसे थोड़ा और भीतर से निकाला। अंततः जो दृश्य परदे पर आया वह किसी का अभिनय नहीं लगता। वह उस आदमी का विस्फोट लगता है जिसे शहर ने कभी सम्मान नहीं दिया। भीकू डरावना है लेकिन दुखद भी है। यही उसकी असली ताकत है।
जेडी चक्रवर्ती: वह ख़ामोशी जो सबसे ज़्यादा बोलती है, अगर भीकू आग है तो सत्या पत्थर है। जेडी चक्रवर्ती ने सत्या को बिल्कुल अलग भाषा में जिया। शांत। भीतर बंद। आँखों में लगातार एक दूरी। यह भी उतनी ही कठिन भूमिका थी लेकिन अलग तरह से। भीकू को फूटना था, सत्या को जमे रहना था।
दोनों की दोस्ती फ़िल्म की भावनात्मक रीढ़ है। और यह दोस्ती इतनी वास्तविक इसलिए लगती है क्योंकि दोनों अभिनेताओं ने अपने किरदारों के बीच का तनाव, प्रेम और आपसी निर्भरता को शूटिंग के दौरान भी जीया।
उर्मिला मातोंडकर: सामान्य जीवन की आख़िरी उम्मीद
विद्या का किरदार 'सत्या' के सबसे महत्वपूर्ण तत्वों में से एक है लेकिन यह सबसे कम चर्चित रहा। वह एक साधारण लड़की है। संगीत सीखती है। छोटे सपने रखती है। सत्या उससे इसलिए प्रेम करता है क्योंकि वह उसके भीतर बची हुई मनुष्यता को छूती है। जब वह उसके पास होता है तो वह भूल जाता है कि वह कौन है और कहाँ से आया है।
उर्मिला मातोंडकर ने इस किरदार में वह सादगी लाई जो एक चमकदार अभिनेत्री के लिए सबसे कठिन काम होता है सामान्य दिखना।
विद्या फ़िल्म में एक प्रश्न है कि क्या इस दुनिया में सामान्य जीवन संभव है? और उसका उत्तर जो अंत में मिलता है फ़िल्म का सबसे दुखद सत्य है।
वास्तविक मुंबई: वह शहर जो किरदार बन गया
राम गोपाल वर्मा ने फ़िल्म की शूटिंग के लिए स्टूडियो से इनकार कर दिया। असली गलियाँ। असली बदबूदार कमरे। असली जर्जर इमारतें। असली रात। यह निर्णय तकनीकी रूप से बेहद कठिन था। भीड़ को नियंत्रित करना मुश्किल था। रोशनी सेट करना मुश्किल था। आवाज़ रिकॉर्ड करना मुश्किल था। लेकिन इसी कठिनाई ने फ़िल्म को उसकी पहचान दी।
जब भीकू और उसके साथी एक छोटे कमरे में बैठकर योजनाएँ बनाते हैं, उस कमरे में पंखा घूम रहा है, दीवारें गंदी हैं, रोशनी मंद है। वहाँ कोई सिनेमाई भव्यता नहीं है। और यही यथार्थ दर्शक को अपनी सीट से बाँध लेता है।
कैमरा: जो जासूस जो शहर के भीतर उतर गया
'सत्या' की सिनेमैटोग्राफी हिंदी सिनेमा में एक नई भाषा लेकर आई।
हैंडहेल्ड कैमरा। कम रोशनी। अचानक कटिंग। वास्तविक शोर।
कैमरा पात्रों के साथ दौड़ता था। जब हिंसा होती थी तब वह उससे दूर नहीं भागता था, उसके भीतर घुस जाता था।यह उस चमकीले, स्थिर, दूरी बनाकर चलने वाले बॉलीवुड कैमरे से बिल्कुल अलग था। दर्शक को लगता था कि वह फ़िल्म नहीं देख रहा। वह उस गली में खड़ा है।
मुम्बई की सांस जैसा विशाल भारद्वाज का संगीत
'सत्या' का संगीत विशाल भारद्वाज ने तैयार किया।
'गोली मार भेजे में' - सड़क की बेलगाम ऊर्जा। 'सपने में मिलती है' - निम्नवर्गीय उत्सव की वह गंदी खुशी जो असली होती है।
लेकिन संगीत की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि वह फ़िल्म पर हावी नहीं हुआ। संगीत मुंबई की आवाज़ था जिसमें था लोकल ट्रेन, ट्रैफिक, गलियों का शोर, पंखे की आवाज़, दूर बजता रेडियो। यह सब मिलकर फ़िल्म का बैकग्राउंड स्कोर बन गया। मुंबई यहाँ केवल लोकेशन नहीं थी वह साँस लेती थी। वह कानों में समा जाती थी।
वह कलाकार जिसे रातोंरात पहचाना गया
जब 'सत्या' रिलीज़ हुई तो शुरुआती प्रतिक्रिया धीमी थी।लेकिन फिर कुछ हुआ। युवा दर्शक सिनेमाघरों से निकलकर एक ही नाम ले रहे थे -भीकू म्हात्रे। मनोज बाजपेयी।
वही मनोज बाजपेयी जो सालों से काम की तलाश में थे। जिनकी पहचान नहीं थी। जिन्हें उद्योग अजीब चेहरे वाला अभिनेता कहता था। 'सत्या' के बाद वे भारतीय सिनेमा के सबसे महत्वपूर्ण अभिनेताओं में गिने जाने लगे। और अनुराग कश्यप, जिनका नाम तब किसी को नहीं पता था, उस फ़िल्म के बाद एक आवाज़ बन गए। वह आवाज़ जो आगे चलकर 'ब्लैक फ्राइडे' और 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' बनाएगी।
वह विरासत जो आज भी जीवित है
'सत्या' के बाद हिंदी सिनेमा में अपराध फिल्मों की पूरी व्याकरण बदल गई। गैंगस्टर अब स्टाइलिश डॉन नहीं रहे। वे असुरक्षित, अकेले, टूटे हुए इंसान बन गए जो शहर में पहचान की तलाश में आते हैं और धीरे-धीरे उसी शहर में खो जाते हैं।
'कंपनी', 'ब्लैक फ्राइडे', 'गैंग्स ऑफ वासेपुर', 'मिर्ज़ापुर' - यह पूरी परंपरा 'सत्या' की संतान है।
फिल्म स्कूलों में आज भी इसे पढ़ाया जाता है यथार्थवादी सिनेमा, शहरी हिंसा और चरित्र-निर्माण के उदाहरण के रूप में।
वह सत्य जो सबसे भयावह था
'सत्या' का सबसे गहरा दुख इसकी हिंसा से नहीं आता। वह इस बात से आता है कि फ़िल्म के हर पात्र के भीतर किसी न किसी कोने में एक सामान्य जीवन की इच्छा थी।भीकू अपने परिवार के साथ हँसना चाहता था। सत्या प्रेम करना चाहता था। विद्या बस गाना सीखकर जीना चाहती थी। लेकिन अपराध की दुनिया इंसान को धीरे-धीरे उस बिंदु तक ले जाती है जहाँ वह सामान्य जीवन के योग्य नहीं बचता। और शहर?
वह अगले दिन फिर उसी तरह चलता रहता है। जैसे कुछ हुआ ही न हो।
'सत्या' इसलिए महान नहीं है कि उसने बड़े पुरस्कार जीते या रिकॉर्ड तोड़े। वह इसलिए महान है क्योंकि उसने पहली बार हिंदी सिनेमा को वह सच दिखाया जिससे वह हमेशा डरता रहा था। कि मुंबई सपनों का शहर नहीं है।
यह उन लोगों का शहर है जो सपने लेकर आते हैं और धीरे-धीरे शहर उन्हें निगल जाता है।



