पटेल फैक्टर ने राज्यसभा चुनाव को विधानसभा चुनावों से ज्यादा अहम बना दिया

Published by Rishi Published: July 30, 2017 | 9:33 pm
Modified: July 30, 2017 | 9:37 pm

उमाकांत लखेड़ा
सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार के तौर पर अहमद पटेल के सियासी कद ने इस बार गुजरात में चार माह बाद होने वाले चुनावी दंगल का पारा कई गुना बढ़ा दिया है। अहमदाबाद से लेकर दिल्ली तक पिछले एक सप्ताह का घमासान बयान कर रहा है कि 8 अगस्त को गुजरात में तीन सीटों पर होने वाला राज्यसभा चुनाव भाजपा व कांग्रेस के बीच करो या मरो की लड़ाई में तब्दील हो गया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व अमित शाह की रणनीति ने इस बार अहमद पटेल को वाकई में चने चबाने को विवश कर दिया है। रातों रात कांग्रेस विधायकों को सेंधमारी से बचाने के लिए कर्नाटक ले जाने की हड़बड़ी के पीछे अहमद पटेल पर मंडराता संकट बता रहा है कि मौजूदा घेराबंदी से बाहर निकलकर आसानी से चुनाव जीत पाना उनके लिए कठिन हो गया है।

कुछेक भाजपा विधायकों में सेंधमारी की अहमद पटेल की कोशिशों पर भी पानी फिरता नजर आ रहा है क्योंकि पाटीदार आंदोलन से जुड़े भाजपा विधायक नलिन कोटलिया समेत कुछ और को भाजपा ने वापस अपने पाले में खींच लिया है। जीत हार कांटे की है और हार जीत का फैसला एक दो वोटों पर सिमट जाने से अहमद पटेल के लिए जीत तक पहुंचने के लिए संख्याबल जुटाना टेढ़ी खीर है।

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ज्ञात रहे कि पिछले दो दशक से अहमद पटेल कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के अति विश्वसनीय लोगों में रहे हैं। 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सत्ता में आने के बाद कांग्रेस में अहमद पटेल की अहमियत कांग्रेस व मनमोहन सरकार के दस बरस के कार्यकाल में बढ़ती चली गई। गुजरात में तीन राज्यसभा सीटों के चुनाव में अहमद पटेल के रास्ते में कांटे बिछाने की भाजपा की रणनीति के पीछे भी सबसे बड़ी वजह ही यही है कि किसी भी तरह अहमद पटेल को उनके गृह राज्य गुजरात से ही राज्यसभा चुनाव हरवाकर सीधे सोनिया गांधी को झटका दिया जाए।

रोचक बात यह है, कि अहमद पटेल भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके बेहद करीबी भाजपाध्यक्ष अमित शाह भी गुजरात से ही ताल्लुक रखते हैं। इस दफे चौथी बार गुजरात विधानसभा चुनाव फिर से जीतना भाजपा के लिए उतना ही अहम है, जितना अहमद पटेल को गुजरात से राज्यसभा में पहुंचने से रोकना। इसलिए अहमद पटेल भी बखूबी जानते हैं कि उनके राजनीतिक जीवन की यह अब तक की सबसे बड़ी चुनौती है। यह भी कि इस बार से बाजी हारे तो कांग्रेस में सत्ता केंद्र बने रहने की उनकी राजनीति पर हमेशा के लिए ग्रहण लग जाएगा।

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अहमद पटेल नेहरू गांधी परिवार के अति वफादार नेताओं में गिने जाते रहे हैं। आज भी वे कांग्रेस में अग्रपंक्ति के उन गिने चुने नेताओं में शामिल हैं जो एक परिवार की चार पीढ़ियों यानी इंदिरा, राजीव, सोनिया व राहुल गांधी की भीतरी टीम के अहम किरदार के तौर पर काम कर रहे हैं। कांग्रेस के आंतरिक और बाहरी दोनों ही हल्कों में उन्हें गांधी नेहरू परिवार का अहम राजदार माना जाता है।

वे सोनिया की निजी कोर टीम की ऐसी अहम कड़ी हैं जिनके बिना सोनिया कोई फैसला नहीं लेतीं। यहां तक कि सोनिया गांधी को किससे मिलना है, यह तय करने का काम भी पिछले दो दशक से अहमद पटेल के जिम्मे माना जाता रहा है। अहमद पटेल के लगातार बढ़ते कद को देखते हुए कांग्रेस में यह धारणा भी खासी चर्चा में रहती थी कि अहमद पटेल सोनिया की मजबूरी हैं क्योंकि उनके पास कई ऐसे संवेदनशील राज हैं जिनकी वजह से सोनिया उनसे दूरी नहीं बना सकतीं।

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अहमद पटेल की गिनती कांग्रेस में उन लोगों में भी होती है जो महज परदे के पीछे रहकर शतरंज की चालबाजी में माहिर हैं। कांग्रेस के बाहर भाजपा को छोड़ बाकी क्षेत्रीय पार्टियों के प्रमुख नेताओं के साथ अहमद पटेल के बेहद निजी रिश्तों ने कई खास मौकों पर सोनिया कोमजबूती दी।

यूपी की राजनीति को लेकर मुलायम सिंह यादव, मायावती व बिहार में लालू प्रसाद व नीतीश कुमार के अलावा कई बाकी नेताओं के साथ सोनिया कांग्रेस की साझा रणनीति बनाने में अहमद पटेल की अथक कोशिशें कई बार रंग लाईं। पांच साल पहले राष्ट्रपति चुनाव में ममता बनर्जी कई क्षेत्रीय नेताओं को कांग्रेस के पक्ष में खड़े रखने में अहमद पटेल की परदे के पीछे की भूमिका कांग्रेस के लिए अचूक बाण साबित हुई।

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यूपीए 2 के कार्यकाल में अहमद पटेल कांग्रेस में लगातार ताकतवर होते गए। संगठन से लेकर यूपीए सरकार तक अहमद पटेल की पंसद के कई लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर बिठाया गया। हालांकि कई लोग इन दायित्वों को संभाल पाने में नकारा साबित भी हुए। कई प्रदेशों में उनकी पसंद के प्रभारी महासचिवों ने पार्टी की तरक्की के बजाय लुटिया डुबोने में भूमिका निभाई लेकिन वे लोग उन पदों से महज इसलिए नहीं हटाए गए, क्योंकि उन पर अहमद पटेल का वरदहस्त लगातार बना रहा है।