अपना भारत से बोले राम गोविंद चौधरी, ‘चुप नहीं बैठेंगे, सरकार से हम डरने वाले नहीं’

उत्तर प्रदेश के इतिहास में यह पहली बार हुआ है, जब सत्तापक्ष से नाराज विपक्ष ने एकजुटता दिखाते हुए समानान्तर सदन चलाया। इसकी चर्चा बहुत हुई। मामला वैधानिकता का भी उठा लेकिन विधानसभा अध्यक्ष की ओर से इस पर किसी तरह का गंभीर संज्ञान न लिए जाने से विवाद बढ़ नहीं पाया।

विधानसभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित सिर्फ यह कहकर रह गए कि विपक्ष का यह रवैया दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा। लेकिन राजनीतिक हलकों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि विपक्ष की यह एकता भले ही बहाने से हुई है, इसके दूरगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं। यह एकता भाजपा के लिए आगे भी बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।

बहरहाल, विधानसभा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के भाषण की कुछ बातों को विपक्ष ने गंभीर धमकी के रूप में लिया और सदन के बहिष्कार पर आमादा है। नेता प्रतिपक्ष राम गोविंद चौधरी बहुत नाराज हैं। यह नाराजगी उनकी दूरगामी रणनीति कर हिस्सा हो सकती है लेकिन वह कहते हैं कि मुख्यमंत्री जिस तरह की भाषा सदन में बोल रहे हैं, वह गरिमा के अनुकूल नहीं है। हम किसी धमकी से डरते नहीं हैं, इसीलिए पूरे विपक्ष ने मिलकर तय किया है कि इस पूरे सत्र में हम सदन में नहीं जाएंगे। पूरे मसले को लेकर अपना भारत के लिए आरबी त्रिपाठी ने नेता प्रतिपक्ष राम गोविंद चौधरी से विस्तार से बातचीत की। पेश हैं बातचीत के अंश-

= विरोधी दल विधानसभा सदन का बहिष्कार क्यों कर रहे हैं?
– बजट पेश होने के बाद उत्तर भाषण में मुख्यमंत्री ने विपक्ष के बारे में जिस तरह की भाषा इस्तेमाल की है, वह बेहद आपत्तिजनक है। इस सरकार के लोगों ने परंपरा तोड़ी है। विपक्ष को मार दिया जाएगा, काट दिया जाएगा। हमारे साथ रहिए। यानी सरकार में बैठे लोग विपक्ष को सुनना ही नहीं चाहते। यह कैसे हो सकता है।

= क्या इसके लिए सपा ने दूसरे दलों ने मिलकर रणनीति बनाई है?
– नहीं, यह सबकी मिली जुली रणनीति है। यह स्वत:स्फूर्त है। किसी ने किसी को बुलाया नहीं। सबने महसूस किया कि सरकार गलत कर रही है। गलत भाषा बोल रही है। इसलिए सबने मिलकर बहिष्कार का फैसला किया है।

= बजट पर आपत्ति है या फिर कोई राजनीतिक फायदा लेने की कोशिश है?
– बजट को लेकर आपत्ति तो है ही। इस बजट में कुछ है ही नहीं। न तो किसानों के हित में है और न ही गरीबों और समाज के दूसरे तबकों के लिए है। इनका बजट तो कुछ है नहीं। छलावा है। दिखावा है। न तो किसानों का कर्ज माफ किया और न ही बैंकों को कोई निर्देश दिया। ये लोग केवल भाषणबाजी तक सीमित हैं। उस पर सरकार कोई बहस नहीं कराना चाहती। किसी की कुछ सुनना नहीं चाहती। ऊपर से धमकी दे रही है। हम समाजवादी हैं, किसी धमकी से नहीं डरने वाले और न ही झुकने वाले हैं।

= सदन से बाहर जाकर बातें कहने को सत्तापक्ष पलायनवाद के दायरे में मान रहा है। आपने विधानसभा अध्यक्ष से शिकायत क्यों नहीं की अगर नेता सदन ने गलत भाषा का इस्तेमाल किया था?
– ये लोग पहले कांग्रेस मुक्त भारत की बात कहते थे और अब सपा-बसपा मुक्त उत्तर प्रदेश की बात कहते हैं। लोकतंत्र में विपक्ष का कोई मतलब होता है, नहीं तो यह व्यवस्था क्यों बनती। पर ये लोग सबको खत्म कर देना चाहते हैं। कुछ सुनना ही नहीं चाहते। ऐसे माहौल में हम सदन में क्यों रहें। जब सदन की परंपराएं टूट रही हैं तो किसी से कहने, सुनने और शिकायत का क्या मतलब।

= आपको मुख्यमंत्री की भाषा पर आपत्ति थी। आप भी तो जवाब उसी अंदाज में दे सकते थे?
– हम वह भाषा नहीं बोल सकते। हम लोकतांत्रिक व्यवस्था भंग नहीं कर सकते। हमने लोकतंत्र को हमेशा मजबूत किया है और लोकतंत्र मजबूत बनाने के लिए संघर्ष किया है। समाजवादियों ने इसके लिए हमेशा संघर्ष किया है।

= पर अलग से सदन चलाना राजनीतिक अराजकता नहीं माना जाए?
– देखिए, हम तो सदन में अपना विरोध जाहिर करना चाह रहे थे लेकिन सरकार में बैठे लोग जब धमकी दे रहे हैं तो उस धमकी को बर्दाश्त कैसे किया जा सकता है। अब रही बात अलग से सदन चलाने की तो हमें अपने उस साथी मथुरा पाल के प्रति शोक संवेदना व्यक्त करनी थी, जो इस दुनिया में नहीं रहे। ऐसे में सारे दलों ने मिलकर अलग से सदन चलाने का फैसला किया। इसके लिए विधानसभा का सेंट्रल हाल चिह्नित किया और वहां सदन चलाया। कांग्रेस विधान मंडल दल के नेता अजय कुमार लल्लू नेता सदन बनाए गए थे। बसपा के नेता लालजी वर्मा अध्यक्षता कर रहे थे। मैं स्वयं नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में था। हमने लोकतांत्रिक मर्यादा के अनुरूप काम किया है। कोई अराजकता नहीं की है।

= भाजपा विधायक कह रहे हैं कि विपक्ष ने सदन की गरिमा गिराई है?
– यह आरोप तो सत्तापक्ष पर लागू होता है। गरिमा तो उन्होंने गिराई है। धमकी हमें वह दे रहे हैं। हमने तो नहीं धमकाया। विपक्ष तो अपना काम कर रहा है। लोकतंत्र में विरोध दर्ज कराना हमारा अधिकार है लेकिन सरकार सुनने को तैयार हो तब न।

= आप सत्ता पक्ष के डर से सदन में नहीं गए या फिर कोई और बात थी?
– जब हम सदन का बहिष्कार कर चुके थे तो जाने का प्रश्न ही नहीं। जहाँ तक डरने की बात है तो हम डरने वाले नहीं हैं। यह हमारे विरोध का अपना तरीका था, जो कहीं से गलत नहीं है।

= क्या उस समस्या का समाधान हो गया जिसका आप  चाहते थे?
– बेशक नहीं हो गया लेकिन समाधान करेगा कौन। सरकार तो समाधान करना ही नहीं चाहती। इसीलिए तो वह विपक्ष को सुन ही नहीं रही है। अगर सरकार समाधान चाहती तो विपक्ष को बोलने का मौका देती। कुछ बात सुनती, कुछ कहती। ऐसा कुछ होने ही नहीं दिया जा रहा। सदन की परंपराएं तोड़ी जा रही हैं। कब, किसे और क्या बोलना है, कोई समझ ही नहीं रहा। मनमानी चल रही है।

= आपके सदन बहिष्कार और विपक्षी एकता को देखते हुए माना जाने लगा है कि यह भविष्य की किसी बड़ी रणनीति का हिस्सा है?
– नहीं, जो भी एकता है फिलहाल यह विधानसभा सत्र के लिए है। इसमें किसी तरह की आगे की रणनीति की बात नहीं है, जैसा आप सवाल उठा रहे हैं। आगे अगर कोई रणनीति होगी तो उसे पार्टी के राष्ट्रीय नेता तय करेंगे। हमारा काम सदन की रणनीति पर काम करने का है, वह हम कर रहे हैं।

= क्या इसके लिए आपने अपने पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव से बात की थी?
– उनकी जानकारी में सारी बातें हैं। सदन में क्या फैसला करना है, वह तात्कालिक परिस्थितियों के अनुसार हम खुद तय करते हैं।

= यह एकता आगे बनी रहेगी या नहीं?
– इस पर फिलहाल कोई रणनीति नहीं बनी है। वैसे भी हमारी रणनीति सदन की है। भाजपा की तानाशाही और गलतबयानी से पूरा देश परेशान है। हर कोई अपने अपने स्तर से विरोध तो कर ही रहा है।

= क्या आगे के विधानसभा सत्रों में भी ऐसा ही विरोध जारी रहेगा?
– यह तो समय और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। अगर सत्तापक्ष का यही रवैया रहा तो देखा जाएगा कि हमें क्या करना है। लेकिन जनता को पता चल गया कि सरकार विपक्ष को दबा रही है। और यह भी तय है कि जनता के मुद्दों पर विपक्ष दबने वाला नहीं है।​