अपना भारत/न्यूज़ट्रैक Exclusive: देर आए दुरुस्त आए

अनुराग शुक्ला
       अनुराग शुक्ला 

लखनऊ: प्रदेश में बिजली के हालात सुधारने के लिए सूबे के बिजली मंत्री श्रीकांत शर्मा ने आदेश जारी किया है कि यूपी के सभी सरकारी विभागों, निगम, बोर्ड और आयोगों के दफ्तरों में अब प्री-पेड मीटर के जरिये बिजली दी जाएगी मगर इसके साथ एक यक्ष प्रश्न यह भी है कि यूपी में बिजली की स्थिति कहां तक सुधर पाएगी।

दरअसल यूपी के सरकारी विभाग भी यूपी पावर कारपोरेशन के करीब 11 हजार करोड़ से ज्यादा के बकायेदार हैं। यूपी में  बिजली के 121 ऐसे बकायेदार ऐसे हैं जो विभाग का एक करोड़ से ज्यादा दबाकर बैठे है। वैसे भी बिजली विभाग का घरेलू उपभोक्ताओं पर करीब 20 हजार करोड़ बकाया है। खुद विभाग मानता है कि इसमें से एक तिहाई से ज्यादा वसूला ही नहीं जा सकता यानी कुल बकाया करीब 30 हजार करोड़।

ऊर्जा विभाग का यह फैसला देर से लिया गया फैसला कहा जा रहा है। अब इसे सही भी साबित करना है। उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन की मुश्किल सिर्फ उसके उपभोक्ता कैसे बढ़ा रहे हैं इसकी गवाही आकंड़े देते हैं। खुद पावर कारपोरेशन की बकाये पर प्रकाशित होने वाली किताब में बकाया करीब 32 हजार करोड़ है। इसमें बिजली विभाग के बड़े देनदार सरकारी विभाग हैं जिन पर 11 हजार करोड़ का बकाया है।  पावर कॉर्पोरेशन सरकारी विभागों को बकाया बिल जमा करने के लिए जल्द ही नोटिस भेजेगा।

सरकारी विभागों पर नहीं हो पाती सख्ती

सबसे बड़ी बात यह है कि उत्तर प्रदेश में बिजली बकाया कम होने के बजाय सुरसा के मुंह की तरह बढ़ता जा रहा है। दरअसल इस बात की गवाही आंकड़े दे रहे हैं। उत्तर प्रदेश का बिजली विभाग हर साल सिंचाई और नगर निगम जैसे बड़े बकायेदारों को तीन हजार करोड़ का बिल थमाता है, पर उसे इसका 50 फीसदी राजस्व भी बमुश्किल मिल पाता है। सरकार के बाकी 65 विभाग भी बिजली विभाग का पैसा मारने में बहुत पीछे नहीं हैं। हर साल 1500 करोड़ के बिल के बदले सरकारी खाते में करीब 800 करोड़ के आसपास की रकम ही जमा होती है। उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन इंजीनियर्स एसोसिएशन के महामंत्री राजीव सिंह के मुताबिक सरकारी विभागों को हर काम बजट के मदों के हिसाब से खर्च करना होता है।

बिजली का बिल चुकाने के मद में जितने पैसे होते हैं, सरकारी विभाग वो दे देता है। हम लोग सरकारी विभागों से ज्यादा जोर जबरदस्ती नहीं कर सकते। बहुत बार बिजली काटने के बाद  उसी दिन बिना बकाये की राशि मिले फिर से कनेक्शन जोडऩा पड़ता है।

वहीं ऑल इंडिया पावर इंजीनियर फेडरेशन के अध्यक्ष शैलेंद्र दुबे के मुताबिक ऊर्जा विभाग का प्रीपेड मीटर लगाने का फैसला बहुत अच्छा है क्योंकि अगर सिंचाई, जल निगम और स्थानीय निकाय जैसे बड़े बकायेदारों की बिजली काट दी जाए तो सूबे में खेतों की सिंचाई, पीने के पानी की कमी और सडक़ों पर अंधेरा छाने जैसे संकट आ जाएंगे। विभाग इन्हीं का फायदा उठाते हैं। सरकार को अब अपने विभाग और सरकारी कालोनियों में प्रीपेड मीटर और सिंगल प्वाइंट कनेक्शन जैसे लीक से बाहर फैसले लेना जरूरी है। इसके बिना हालत सुधरते नहीं दिखते।

पार्टियों पर भी हो चुकी है सख्ती

बिजली जानकारों की इस बात में दम दिखता है। साल 2011 में बिजली के बड़े बकायेदारों में पाॢटयों पर भी कार्रवाई हुई थी। खुद बीजेपी का नौ लाख का बकाया बताया गया। जनता दल यूनाइटेड पर 18 लाख से ज्यादा और कांग्रेस पर पांच लाख साठ हजार बकाया बताया गया था। उस समय बिजली काटी गयी पर दलों ने कुछ पैसे जमा कराए पर बकायेदारों की लिस्ट से पूरी तरह नाम नहीं हटा। इनके अलावा यूपी रेवेन्यू बोर्ड और पुलिस लाइन डीआईजी लखनऊ आफिस भी बकायेदारों की लिस्ट में है।

प्रीपेड मीटर से सुलझ सकती है समस्या

सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2012-13 में यूपी की दक्षिणांचल विद्युत वितरण कंपनी ने 2839.88 करोड़ रुपये का घाटा सहा। वहीं पूर्वांचल विद्युत वितरण कंपनी को दो हजार दो सौ चौवालीस करोड़ का नुकसान हुआ।  इसी तरह पश्चिमांचल विद्युत वितरण कंपनी को 1991.60 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ और मध्यांचल विद्युत वितरण कंपनी को 1764.84 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। इस अवधि में यूपी पावर कारपोरेशन लिमिटेड को 2721.85 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

बिजली के जानकार मानते हैं कि घरेलू और सरकारी बकायेदारों को मिला लिया जाय तो करीब 30 हजार करोड़ रुपये की कुल देनदारी प्रदेश में फैली हुई है। कोढ़ में खाज यह कि इसमें से एक तिहाई वसूला नहीं जा सकता और बड़े बकायेदारों के पास अदालती स्थगन आदेश का कवच है। ऐसे में पहले एक बार विशेष अदालतों का भी सहारा लिया गया पर काम नहीं आया था। अब शायद प्रीपेड मीटर इस अनपेड बिल को पेड बना सकें।

श्रीकांत शर्मा, ऊर्जा मंत्री, उत्तर प्रदेश कहते हैं, बिजली बिल जमा करने में लेटलतीफी और लापरवाही को देखते हुए सभी सरकारी दफ्तरों में प्री-पेड मीटर लगाकर बिजली देने का फैसला किया गया है। इससे बकाया वसूली का झंझट खत्म होगा और बिजली कंपनियों को एडवांस में बिजली का पैसा मिल जाएगा।

कौन कितना बकायेदार

सरकार की बात की जाय तो सरकार के विभाग तो खुद पावर कारपोरेशन के 11 हजार करोड़ रुपये के बकायेदार हैं। इसमें सबसे बड़ा बकायेदार लघु सिंचाई विभाग है। इसमें लगे ट्यूबवेल पर करीब साढ़े पांच हजार करोड़ का बकाया है। वहीं नगर निगम पर करीब 4 हजार करोड़ का बकाया है। इसके अलावा दूसरे विभागों पर करीब ढाई हजार करोड़ का बकाया है।