INTERVIEW: सुरेंद्र दुबे – विद्या के मूल स्रोत से कट गई शिक्षा

लखनऊ: स्वातंत्रयोतर भारत में उच्च शिक्षा की दशा और दिशा कुछ भटकाव लिये रही है। यद्यपि देश में विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों का संजाल बढ़ा है, लेकिन उच्च शिक्षा और शोध की गुणवत्ता वैसी नहीं मिल पा रही जैसी देश की जरूरत है। साथ ही हिन्दी साहित्य का रचना संसार भी कहीं न कहीं लोक से विमुख हुआ है। इन्हीं सब बिन्दुओं को लेकर ‘अपना भारत,न्यूज़ ट्रैक डॉट कॉम’ के संपादक विचार संजय तिवारी ने प्रख्यात साहित्यकार और बुंदेलखण्ड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सुरेंद्र दुबे से लम्बी बातचीत की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश-

वर्तमान में भारत में शिक्षा के सामने कौन सी चुनौती सबसे बड़ी है?
-यह शिक्षा विद्या नहीं दे रही। यह न तो विद्यार्थी की चेतना को विकसित कर रही है और न हीं संस्कारवान बना रही है। यह शिक्षा केवल साक्षर, शिक्षित, रोबोट पैदा कर रही है। इसका भारतीय आर्ष विद्या परम्परा से न तो कोई बोध है और नहीं उस मूल स्रोत से इसका  कोई संबंध है। जिस तरह गंगोत्री से गंगा को काट दिया गया और तब जो दशा गंगा के पानी की होगी वही दशा आज शिक्षा की है। यह अपनी मूल स्रोत से कटी हुई है।

देश के विश्वविद्यालयों  को आप किसी दशा में पाते हैं?
-विश्वविद्यालय आज कहने मात्र के लिए स्वायत्त रह गये हैं। इन पर सदैव शासन का अंकुश विद्यमान है। विश्वविद्यालय अपनी आवश्यकता के अनुरूप न तो अपनी विशिष्टता पर काम कर पा रहे है न तो विभागों में और पदों पर देश -विदेश के विशिष्ट एवं योग्यतम शिक्षाविदों को रख सकते हैँ। ऐस मकें एक यथास्थितिवादी सोच से सभी विश्वविद्यालय ग्रस्त हैं। विश्वविद्यालय में तैनात होने वाले प्रत्येक अधिकारी जैसे-तैसे अपना समय काट रहे हैं। विश्वविद्यालयों के पास भविष्य कोई दृष्टि नहीं बची है। सभी विश्वविद्यालय लालफीताशाही की चंगुल में हैं।

विश्वविद्यालयों में शिक्षण प्रबंधन की क्या स्थिति है?
-विश्वविद्यालयों शिक्षण और प्रबंधन की स्थिति बहुत ही दयनीय है। जो शिक्षक नियुक्त होता है वह नियुक्ति की तिथि से ही खुद को पठन-पाठन से मुक्त समझने लगता है। नये शोध और विद्या अर्जन से सर्वथा विरत रहे हुए वह केवल क्लासरूम तक सीमित होकर रह जाता है। हालांकि इनमें बहुत से अपवाद भी हैं।  कई विश्वविद्यालय ऐसे हैं जिन्होंने अभी भी शैक्षिक स्तर को बनाये रखा है।

विश्वविद्यालयों के पाठयक्रमों की दशा कैसी है। क्या इससे भारत की आवश्यकताएं पूरी होती हैं?
-विश्वविद्यालयों को अपने पाठयक्रमों को विद्या की उस मूल गंगोत्री से यानी अपनी आर्ष परम्परा से यदि जोड़ कर रखा जाये तो उनमें शोध, अन्वेषण, नवोन्नेश ठीक-ठीक उसी प्रकार होते रहेंगे जैसे गंगोत्री से प्रवाहित होने वाली गंगा अविरल बहती है। इससे बीच-बीच में मिलने वाले प्रदूषक तत्वों से कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। विश्वविद्यालयों को अपने पाठ्यक्रम बनाते समय इस पर बहुत ध्यान देने की जरूरत है।

हिन्दी और उसका बाजार बहुत बढ़ा है, इसका साहित्य पर क्या असर पड़ा है?
-दरअसल हिन्दी बाजार के कारण ही व्यापक हो रही है। बाजार के कारण हिन्दी बहुत बढ़ी है। दुनिया भर की बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अपने उत्पादों का विज्ञापन हिन्दी भाषा में दे रहे हैं। लेकिन यह भाषा केवल उपभोक्ता संस्$कृति की भाषा है। यह हिन्दी की मूल प्रकृति नहीं है। यह बाजारू है। इसका दूरगामी परिणाम निकलेगा और इससे हिन्दी का कोई लाभ नहीं होने वाला, बल्कि नुकसान ही होगा।

हिन्दी में सृजन की स्थित कैसी है?
-हिन्दी साहित्य के शिक्षण और सृजन की दशा बहुत ही आशाप्रद है। नई पीढ़ी में अपनी भाषा उसके शिक्षण और उसके साहित्य के साथ जुडऩे की ललक है। यह संख्या यद्यपि कम है, लेकिन निराशाजनक नहीं है। हिन्दी की अनगिनत पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं और उन्हें लोग खरीद का पढ़ रहे हैं। इसमें लोगों को अपने समय की अभिव्यक्ति का साहित्य मिल रहा है। वास्तव में आज जो हिन्दी है वह अज्ञेय और मुक्तिबोध से बहुत आगे निकल चुकी है। समय की उलझनों, बारीकियों और वैश्विक पटल पर नित्य घटित घटनाओं की अभिव्यक्ति के सफल माध्यम के रूप में हिन्दी में सृजन चल रहा है। इसी समानान्तर लोक जीवन से भी साहित्य जुड़ रहा है। लोक संस्कृति और संवेदनाओं को आज के संदर्भ में पुनर्सृजित करने का सार्थक प्रत्यन दिखाई दे रहा है। इसीलिए हिन्दी की शिक्षण और सृजन की दशा सकारात्मक रूप में चल रही है।

 इस समय देश में सृजन की दिशा क्या होना चाहिए?
भारत एक भूसांस्कृति राष्ट्र है। यह केवल भौतिक, भौगोलिक सीमाओं का कोई भू-भाग भर नहीं है। यह चिन्मय भारत है जहां का कण-कण एक सुसंगत प्राकृतिक विधानों के अनुरूप संचालित है। इसे ऋषियों ने ऋत कहा है अर्थात प्राकृतिक नियम। इस प्राकृतिक नियम की जब-जब अवहेलना हुई है। तब-तब समाज और संस्कृति में विकृतियां पैदा हुई हैं। विसंगतियों ने बीमारियां पैदा की हैं। इसके लिए सबसे आवश्यक है कि हम स्वयं को उसी प्राकृतिक नियम के अनुरूप अपने दैहिक, दैविक, भौतिक और सांस्कृतिक संदर्भों को प्रकृति के राग, छन्द के साथ जोड़ते हुए आत्मान्वेषण करें।

इस समय साहित्य के केन्द्र में कौन सी विधा महत्वपूर्ण है?
-साहित्य का उद्भव श्लोक से हुआ है। श्लोक अर्थात कविता। वैदिक काल से आज तक कविता ही साहित्य के केन्द्र में रही है। साहित्य के मूल्यांकन या परीक्षण के जो भी औजार विकसित किये गये वे सब कविता को आधार बनाकर ही किये गये। भरत मुनि का नाट्य शास्त्र हो या आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की रसमीमांसा, इन सभी के मूल में कविता ही रही है, लेकिन आज भी सामाजिक स्थितियों के कारण कविता महत्वपूर्ण होकर भी हासिए पर है और कथा साहित्य केन्द्र में दिखाई दे रहा है।

संचार और बाजार के इस युग में आप साहित्य को किस दशा में पाते हैं?
संचार और बाजार के इस युग में साहित्य निश्चित तौर पर बहुत महत्वपूर्ण है। हम बचपन से सुनते चले आ रहे हैं। हमारे फिल्मकार कहते हैं कि जनता जैसा देखना चाहती है। हम वैसी ही फिल्में बनाते हैं। यह बात कुछ साहित्यकारों ने भी कहना शुरू कर दिया। साहित्य और फिल्में सम्प्रेषण का बहुत बड़ा माध्यम है। कला और साहित्य का कार्य लोकहित और लोक शिक्षण भी है। साहित्य लोकशिक्षण के साथ, लोकमानस और लोकचेतना का संचार करते हुए एक स्वस्थ चेतनशील संवेदनशील मनुष्य के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करता है ना कि दो पैरों वाले अविकसित या प्रदूषित मानसिकता वाले पशु की ।

वामपंथी साहित्य के मुकाबले सामान्यजन के साहित्य की दशा कैसी है। राष्ट्रवादी साहित्य का लेखन किस रूप में देखते हैं?
भारत में यह दुर्भाग्य रहा है कि लम्बे समय तक वामपंथी और कथित साहित्यकारों तथा विचारकों ने भारत की विद्या को उसकी आर्ष परम्परा से काटने का कुचक्र किया।  वे यह बताते रहे है कि राष्ट्र, राष्ट्रीय सिद्धान्त, राष्ट्रीय मूल्य, चिंताएं, संस्कृति, मनुष्य आदि की चर्चा करना पुरातनपंथी या अगतिवादी है। इसका परिणाम यह हुआ कि बीच की एक बड़ी पीढ़ी पहले तो अंग्रेजों और फिर वामपंथियों के इस अज्ञान की भूल-भुलैया में भटकती चली गई। आज यदि दृढ़ता से उनके इस छदम को बेनकाब नहीं किया जायेगा तो हमारी सोच, विचारधारा और चिंतन ऐसी अंधी सुरंग में समा जायेंगे जहां से लौटने का कोई मार्ग नहीं बचता।  यही उपयुक्त समय है कि हम स्वयं का पुनर्मुलायंकन करें। हमारे यहां विद्या के लिए ऊध्र्वमूलं अधोस्वा कहा गया है अर्थात विद्या का मूल ऊध्र्व से है। इसका संबंध परमसत्ता से है। इसकी शाखाएं नीचे हैं परा या अपरा विद्या के रूप में। इसका अंतिम लक्ष्य ऊध्र्व की खोज है।
हमारे यहां व्याकरण का मूल अक्षर है। गणित का मूल शून्य है। साहित्य का मूल रस है। संगीत का मूल राग है। यह सब उस अक्षर ब्रह्म के पर्याय हैं और सभी विद्याएं उसी अक्षर तक पहुंचने की साधन हैं। इस अधिष्ठान के साथ अगर अपनी विद्या  परम्परा को पुन: पूजते हुए उसका नवोन्मेष करेंगे तो निश्चित ही भारतीय विद्या पुन: अपने गौरवशाली अतीत को प्राप्त कर सकेगी।