महिला नक्सली : बना दिया जिस्म की आग बुझाने का साधन, फिर भी बड़ा खतरा हैं ये

आशीष शर्मा 'ऋषि'
 आशीष शर्मा ‘ऋषि’

लखनऊ : अपने आरंभिक दौर में नक्सली संगठनों ने लड़ाई को जनांदोलन का रूप देने के लिए तय किया था कि संगठन में महिलाओं की 40 फीसदी हिस्सेदारी रहेगी। इस पर अमल भी हुआ। बड़े पैमाने परमहिलाएं शामिल की गईं| लेकिन यहीं खेल हो गया लड़ाई में सहभागी बनाने के इतर उनकी इज़्ज़त से ही खेल शुरू हो गया। अब आलम ये है, कि इस ख़ूनी आंदोलन में शामिल महिला नक्सली संगठन छोड़ भाग रही हैं। या फिर आत्मसमर्पण कर रही हैं। समाज को बदल देने का सपना अब उनकी आंखों में नजर नहीं आता।

नक्सलवादी संगठन की हार्डकोर मेंबर रही 32 साल की रमा (बदला हुआ नाम) दिल्ली की एक दुकान पर जूठे बर्तन धोती है। झारखंड के दुमका की रहने वाली रमा समाज की सोच बदलने का सपना संजोए इस क्रांति का हिस्सा बनी थी। रमा कहती है, कि संगठन में रहते हुए उसके सपने तो सच नहीं हुए।

अलबत्ता संगठन के कमांडर और अन्य सदस्यों ने उसे अपनी हवस की आग बुझाने का सामान बना लिया। उसके साथ बलात्कार होता और कोई उसकी गुहार नहीं सुनता, सुनता भी कौन जब सभी इसमें शामिल थे। आज उसका नतीजा ये है, की उसे सिफलिस हो गयी है। आज भले ही वो बर्तन मांज रही है। लेकिन उसे इस बात का खतरा नहीं है की कोई उसकी इज्ज़त से खेलेगा। दिल्ली तक का सफर उसने कैसे तय किया ये वो ही जानती है।

आज उसकी आखों में बंदूक के दम पर दुनिया को बदलने का सपना ग़ायब हो चुका है। बचा है, तो बस दो व़क्त की रोटी की फिक्र का हिसाब।

राजनांदगांव की रहने वाली 17 साल की सुनीता (बदला हुआ नाम) एड्‌स से पीड़ित है। सुनीता को ये जानलेवा बिमारी इन्हीं क्रांतिकारी लाल सलाम वालों ने दी है। सुनीता तिल-तिल कर मर रही है, उसकी माँ उसे मरते हुए देखने को मजबूर है क्योंकि गरीबी, लाचारी और भूख की जंग उसे इलाज का मौका ही नहीं दे रहे।

यह दिल दहला देने वाली हालत रक्त क्रांति के सेक्स क्रांति में तब्दील हो जाने का नतीजा है। सुनीता देवकी दलम नाम के नक्सली संगठन की सदस्य थी। छत्तीसगढ़ के नक्सल कमांडर बुधु बेतलू की विधवा सोनू गावड़े की ज़िंदगी भी नरक बन चुकी है। दलम कमांडर बुधु की मौत के बाद संगठन के सदस्यों ने 24 साल की सोनू गावड़े के साथ महीनों बलात्कार किया। आख़िरकार सोनू ने अपने को पुलिस के हवाले कर दिया।

सोनू ने जो कुछ बताया वो दिल दहला देने वाला था। उसे बताया कि नक्सली संगठन में एक-एक महिला के साथ पांच-छह पुरुष ज़बरदस्ती करते हैं। इंकार करने पर उनके साथ जानवरों सरीखा व्यवहार होता है। नक्सली संगठनों की महिला कार्यकर्ताओं का संगठन के पुरुष सदस्यों द्वारा बर्बर तरीक़े से शारीरिक और मानसिक शोषण किया जा रहा है। यौन प्रताड़ना से कहीं वे गर्भवती न हो जाएं इसकी ख़ातिर जबरन उनकी नसबंदी करा दी जाती है।

यही नहीं, गांव गांव में फैले उनके एजेंट लंबी-चौड़ी कद काठी की लड़कियों की तलाश कर उन्हें बहला फुसला कर, या फिर ज़बरन संगठन में शामिल कर लेते हैं। यह दौर सालों से जारी है।

अकेली सुनीता ही इस भयानक यंत्रणा की शिकार नहीं है। उसके जैसी सैकड़ों सुनीता हैं, जिन्होंने भूख और ग़रीबी से लोहा लेने और बंदूक की ज़ोर पर शोषक दुनिया को बदलने का सपना लिए रक्त क्रांति की दुनिया में प्रवेश किया। उन्हें लगा कि अपने विद्रोही तेवरों से वे दुनिया का रुख़ मोड़ देंगी। हालांकि, संगठन में शामिल होने के बाद उनकी ज़िंदगी का ही रुख़ बदल गया।

असुरक्षित और असामान्य सेक्स की वज़ह से नक्सलियों में एचआईवी वायरस तेज़ी से पैर पसार रहा है। इसकी वज़ह से कई नक्सलियों की मौतें भी हुई हैं। जंगलों में छुपने और भागते फिरने से नक्सलियों का इलाज भी नहीं हो पाता। फलतः वे इस भयावह बीमारी का प्रसार करने का ज़रिया बन जाते हैं।

गढचिरौली के एसपी रहे राजेश प्रधान के मुताबिक उनके सामने कई महिला गुरिल्लाओं ने इसीलिए आत्मसमर्पण कर दिया, क्योंकि वे संगठन में अपने साथ हो रहे यौन उत्पीड़न से तंग आ चुकी थीं। संगठन में उनके साथ बंदूक की नोक पर बलात्कार किया जाता था।

चंपा, बबीता, आरती, शांति और संगीता पीडब्लूजी और एमसीसी की सदस्याएं हैं। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश-इन चार राज्यों की पुलिस इनके ख़ूनी कारनामों से भय खाती थी। पर इनके साथ भी संगठन में जिस कदर यौनाचार होता था, वह दिल को दहलाने वाला है। उत्तर प्रदेश, बिहार-झारखंड सब जोनल कमेटी में फिलहाल लगभग 1500 महिला सदस्य हैं। लगभग, सबकी व्यथा एक जैसी ही है।

ऐसी ही कहानी है, बबीता और चंपा नाम की महिला कमांडरों की। चंपा ने जब अपने साथियों को इंकार करना शुरू किया तो उसकी बेरहमी से पिटाई की गई। जब बबीता ने आत्मसमर्पण किया उस समय वह गर्भवती थी। जेल में ही उसने बच्चे को जन्म दिया। नक्सलियों के कुकर्मों से वो इतनी आजिज़ आ चुकी थी, कि उसने अपने नवजात बच्चे को जेल के शौचालय में मिट्टी के घड़े में बंद कर मार डाला।

नक्सलवादी आंदोलन के नाम पर हर नाजायज़ व ग़ैर-क़ानूनी काम कर रहे हैं। नक्सलवादी आंदोलन के जनक कानू सान्याल नक्सलियों के इस नैतिक पतन और हवस को क्रांति कतई नहीं मानते थे। वे कहते थे, कि आंदोलन अपना रास्ता भटक चुका है। अपने अंतिम दिनों में कानू नक्सलियों के इस पतन से बेहद दुखी रहे।

बड़ी मुसीबत हैं ये महिला नक्सली

ये महिला नक्सली देश और सरकार के लिए खतरा बनी हुई हैं। नक्सली हमला हो या पुलिस से मुठभेड़। ये पुरूषों के मुक़ाबले ज़्यादा उग्रता और तीव्रता से टूट पड़ती हैं। नक्सली संगठन भी इनका जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस काफिले हुआ हमला याद होगा आपको, इसमें भी महिला नक्सलियों का नाम सामने आया।

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक देश भर से सैन्य कद-काठी की चुनिंदा आदिवासी युवतियों को आंध्र प्रदेश के जंगलों में अत्याधुनिक हथियार चलाने और पुलिस से मुक़ाबला करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इन्हें छापामार युद्ध प्रणाली में भी पारंगत किया जा रहा है।

प्रशिक्षण पाने वाली महिला नक्सलियों को दो समूहों में बांटा जाता है। पहला समूह ख़ु़फिया जानकारी जुटाता है, जबकि दूसरा हमले करता है। ट्रेनिंग पाने वाली महिला माओवादी अपने पुरूष समकक्षों से ज़्यादा ख़तरनाक और कुशल हैं। मुश्किल तो यह है कि इन महिला माआवादियों की शिनाख्त में भी परेशानी होती है।

पुरूषों की तुलना में ये संगठन के प्रति ज़्यादा व़फादार होती हैं। इसके अलावा ये पुरुषों की तुलना में लोगों से ज़्यादा आसानी से घुलमिल जाती हैं। सूचनाएं निकाल लेती हैं, हथियारों और अन्य आपत्तिजनक वस्तुओं के साथ धड़ल्ले से एक जगह से दूसरी जगह आ-जा सकती हैं। लिहाज़ा नक्सलवादी संगठन नक्सली हमलों में भी इनका ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। पिछले दिनों झारखंड, आंध्र प्रदेश,उड़ीसा आदि राज्यों में जितनी भी नक्सली वारदातें हुई हैं, उनमें महिला नक्सलियों ने बढ़-चढ़ कर भागीदारी की है।

पुरूष नक्सलियों की अपेक्षा महिला नक्सलियों से जूझना पुलिस बलों के लिए के लिए ज़्यादा चुनौती भरा है, क्योंकि ये बेहद आसानी से भीड़ में घुलमिल जाती हैं। बस्तर, दंतेवाड़ा, रायगढ़ ज़िले में इनका ज़्यादा बोलबाला है। पुलिस से बचने और सुरक्षित ठिकाने की गरज़ से उड़ीसा और आंध्र प्रदेश की सीमा पर स्थित जंगलों में इनका बड़ा ठिकाना है।