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ये हैं गुजरात चुनाव के ‘तीन तिलंगे’, निभा सकते हैं अहम भूमिका

गुजरात चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के बीच ही मुख्य लड़ाई है। राज्य की राजनीति के तीन युवा खिलाड़ी इस चुनाव में अहम भूमिका निभाने की स्थिति में हैं। ये हैं अल्पेश ठाकोर, जिग्नेश पटेल और हार्दिक पटेल।

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tiwarishaliniBy tiwarishalini

Published on 21 Oct 2017 10:42 AM GMT

ये हैं गुजरात चुनाव के ‘तीन तिलंगे’, निभा सकते हैं अहम भूमिका
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गांधीनगर: गुजरात चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के बीच ही मुख्य लड़ाई है। राज्य की राजनीति के तीन युवा खिलाड़ी इस चुनाव में अहम भूमिका निभाने की स्थिति में हैं। ये हैं अल्पेश ठाकोर, जिग्नेश पटेल और हार्दिक पटेल।

अल्पेश ओबीसी वोटों को अपने पीछे एकजुट बताकर ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाने के लिए राजनीतिक सौदेबाजी की लाइन पर चल रहे हैं। हार्दिक पटेल पाटीदार अनामत आंदोलन समिति के संयोजक हैं, वहीं 37 वर्षीय जिग्नेश मेवाणी राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच की अगुआई कर रहे हैं।

गुजरात में पाटीदार 18 फीसदी और दलित 7 फीसदी है। अल्पेश, हार्दिक और जिग्नेश का दावा है कि तीनों मिलकर गुजरात की 120 सीटों पर किसी भी पार्टी को हराने की क्षमता रखते हैं। तीनों एकजुटता की बात तो कर रहे हैं, लेकिन विचारधारा को लेकर इनके आपस में ही विरोधाभास हैं।

हार्दिक पटेल

भाजपा विरोधी चेहरों में सबसे आगे हैं पाटीदारों के नेता हार्दिक पटेल। हार्दिक अभी चुनाव नहीं लड़ सकता क्योंकि वह अभी 25 साल से कम उम्र का है। लेकिन उसकी हैसियत पाटीदार समाज के बड़े हिस्से को प्रभावित करने की है। हार्दिक पटेल कांग्रेस का साथ देने को तैयार तो नजर आता है। लेकिन इस दोस्ती का आधार क्या होगा यह तय नहीं हो पा रहा है। पार्टी ने अंदरखाने हार्दिक से बातचीत शुरू कर दी है। समझा जाता है कि हार्दिक के साथ शुरुआती बातचीत सफल रही है और सब कुछ इसी तरह चला तो चुनाव में हार्दिक पटेल कांग्रेस के पक्ष में वोट देने की अपील कर सकता है। बदले में कांग्रेस पाटीदारों को आरक्षण पर ठोस आश्वासन दे सकती है। साथ ही हार्दिक के कुछ करीबियों को टिकट भी दिया जा सकता है।

जिग्नेश

जिग्नेश दलित समाज से ताल्लुक रखते हैं। गुजरात के वेरावल में दलितों की पिटाई के बाद भड़के दलित आंदोलन का नेतृत्व जिग्नेश ही कर रहे हैं। जिग्नेश ने उना की घटना के बाद घोषणा की थी कि अब दलित लोग समाज के लिए ‘गंदा काम’ नहीं करेंगे,‘ यानी मरे हुए पशुओं का चमड़ा निकाला, मैला ढोना आदि। 1980 में मेहसाना में जन्मे जिग्नेश मेघानीनगर में रह रहे हैं जो अहमदाबाद का दलित बहुल इलाका है। महात्मा गांधी की ‘दांडी यात्रा‘ से प्रेरणा लेते हुए उन्होंने दलितों की यात्रा का आयोजन किया और उसे ‘दलित अस्मिता यात्रा’ का नाम दिया। जिग्नेश अंग्रेजी और कानून में स्नातक हैं और ऊना दलित अत्याचार लड़त समिति (यूडीएएलएस) के संयोजक हैं। कांग्रेस इन्हें अपने पक्ष में करने की कोशिशों में जुटी हुयी है। पार्टी लगातार जिग्नेश के भी संपर्क में हैं। जिग्नेश ने बीजेपी विरोध का झंडा तो बुलंद कर रखा है, लेकिन समझा जाता है कि उसने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लडऩे से भी इंकार कर दिया है। कांग्रेस की कोशिश है कि, जिग्नेश जहां से भी चुनाव लड़े, पार्टी उसको समर्थन दे दे और बदले में जिग्नेश बीजेपी विरोध का झंडा लहराये रखे।

अल्पेश ठाकोर

ठाकोर (क्षत्रिय) समाज से ताल्लुक रखने वाले अल्पेश किसानों, छात्रों और महिलाओं के मुद्दे उठाते रहे हैं। अल्पेश का कहना है कि वह बीजेपी को हराने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ेंगे, लेकिन ऐसे कई मौके आए हैं जब अल्पेश गुजरात में बीजेपी सरकार के साथ समझौते भी करते नजर आए हैं। ऐसे में फिलहाल यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि अल्पेश की ओबीसी राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा।

23 अक्टूबर को ओबीसी एससी/एसटी एकता मंच के संयोजक अल्पेश की अहमदाबाद में रैली है जिस पर सबकी निगाहें टिकी हैं। इस रैली को ‘जनादेश सम्मेलन‘ का नाम दिया गया है। गुजरात के चुनावीरण में ओबीसी वोटों का कितना महत्व है, यह इसी से साफ है कि राज्य में 54 फीसदी ओबीसी यानी अति पिछड़े वर्ग की आबादी है। यही वजह है कि अल्पेश चुनावी चौसर पर अपना दांव बेहद चतुराई से चल रहे हैं।

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tiwarishalini

Excellent communication and writing skills on various topics. Presently working as Sub-editor at newstrack.com. Ability to work in team and as well as individual.

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