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प्रयाग में मस्ती के बीच कीचड़ और कपड़ा फाड़ होली

raghvendra

raghvendraBy raghvendra

Published on 28 Feb 2018 12:04 PM GMT

प्रयाग में मस्ती के बीच कीचड़ और कपड़ा फाड़ होली
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कौशलेन्द्र मिश्र

इलाहाबाद: वैसे तो होली रंगों का पर्व है, लेकिन प्रयाग में यह त्योहार कीचड़ और कपड़ाफाड़ होली के लिए भी जाना जाता है। इस दौरान लोग अपनी-अपनी टोलियां बनाकर पास-पड़ोस के घरों में जाकर लोगों को कीचड़ और गोबर से पोतने का प्रयास करते हैं। ‘बुरा न मानो होली है’ सूत्र वाक्य के चलते लोग इसका बुरा भी नहीं मानते। दहन से पूर्व होलिका का शृंगार खास ढंग से किया जाता है। चौराहों पर एकत्रित की गई लकडिय़ों को फूल-मालाओं से सजाया जाता है। पूजन के बाद होलिका की परिक्रमा के बाद उसे आग के हवाले कर दिया जाता है। इसी के साथ ही शहर में ढोल मंजीरे की थाप के बीच अबीर-गुलाल लगाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। आमतौर पर शहर में दो दिनों तक होली खेली जाती है, लेकिन पुराने शहर के ठठेरी बाजार में मान्यता के अनुरूप केवल तीसरे ही दिन होली खेली जाती है। चौक के लोकनाथ चौराहे पर कपड़ाफाड़ होली का एक अलग ही नजारा दिखता है। यदि किसी के तन पर कपड़ा दिखा तो मान लिया जाता है कि उसने होली नहीं खेली है।

वसंत पंचमी के दिन चौराहों एवं गली-मुहल्लों के नुक्कड़ों पर होलिका दंड गाड़ दिया जाता है और फिर होलिका को अनाप-शनाप चीजों से विस्तार दिया जाता है। होलिका दहन से पूर्व रंगभरी एकादशी पर भी अबीर-गुलाल लगाने की परम्परा है। फाल्गुन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा पर होलिका दहन कर लोग रात भर होली गीत गाते हैं। होलिका पर्व पर नगर के तमाम मुहल्लों में सांस्कृतिक आयोजनों की धूम रहती है। इस दौरान मुगदर बारात, हथौड़ा बारात, मुर्दा बारात और कहीं-कहीं तो गधे की सवारी भी जुलूस की शक्ल में निकाली जाती है।

तारों पर फेंक दिए जाते हैं कपड़े

इलाहाबाद में लोकनाथ की कपड़ा फाड़ होली की खास पहचान है। शहर भर के युवा अपनी टोलियों में यहां जुटकर माहौल को मस्त बना देते हैं। चौराहे पर रंगवर्षा का विशेष इंतजाम रहता है। फुहारों से हो रही रंगवर्षा युवाओं को परम्परागत रूप से यहां खींच लाती है। पुराना शहर होने के चलते तंग चौराहे पर हजारों की भीड़ कैसे एक साथ मस्ती करती है, यह देखते ही बनता है। माहौल को देखते हुए यहां खड़े लोगों के पैर अपने आप ही थिरकने लगते हैं। इस दौरान मदमस्त लोग एक दूसरे को जबर्दस्ती पकडक़र उनके कपड़े फाड़ देते हैं। फटे कपड़े तारों पर फेंक दिए जाते हैं ताकि दोबारा न मिल सकें।

कपड़ा फाड़ होली का असर बिजली के तारों पर कई दिनों तक देखा जाता है। इस दौरान फिल्मी होली गीतों के बीच युवाओं में अलग ही तरंग दिखती है। फाल्गुन की मस्ती अपने चरम पर होती है। लोग कुछ वक्त के लिए खुद को भूल जाते हैं। रोजमर्रा की जिन्दगी से हटकर कुछ फूहड़ करने की छूट भी इसी महापर्व पर ही संभव है। बच्चे, बड़े और बुजुर्ग सभी एक ही धुन में मस्त रहते हैं। कहीं कोई दीवार नजर नहीं आती। इस मौके पर सभी धर्मों के लोग आपस में गले मिलते हैं।

साहित्यकारों की होली

प्रयाग में साहित्यकारों की होली भी काफी प्रसिद्ध रही है। किसी जमाने में मुट्ठीगंज निवासी हरिवंशराय बच्चन तो ढोल की थाप पर शहर भर में घूम-घूमकर होली की मस्ती करते थे। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा, जगदीश गुप्त एवं कैलाश गौतम जैसे लोग इस फेहरिस्त में शामिल रहेे। रंगों से परहेज करने वाले निराला जी तो अपने आवास पर साहित्यकारों की टोली जुटने पर अपने शब्दबाण से होली खेलते थे। यह परम्परा अब भी बदस्तूर जारी है।

मुगदर बारात का रहता है क्रेज

दारागंज में परम्परागत ढंग से आयोजित कवि सम्मेलन से पूर्व मुगदर बारात निकाली जाती है। इस दौरान फूल-मालाओं से सजे रथ पर बारात निकाली जाती है। बारात में दूसरे जनपदों के भी पहलवान शिरकत करते हैं। निराला चौराहे पर पुरस्कार जीतने के लिए मुगदर भांजने की जोरआजमाइश की जाती है। इस दौरान सबसे ज्यादा मुगदर भांजने वाले पहलवान को पुरस्कृत किया जाता है।

हुड़दंग कवि सम्मेलन पर महंगाई की मार

प्रयाग की खास पहचान बन चुका हुड़दंग कवि सम्मेलन अब बंद कर दिया गया है। महंगाई की मार इस सम्मेलन पर भी पड़ी है जिससे आयोजकों ने अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं। इस सम्मेलन की खास बात यह होती थी कि इसका उदघाटन कद्दू फोडक़र किया जाता था। आरती तो लकड़ी के चैले से उतारी जाती थी। कद्दू भंजन के लिये हथौड़े की बारात निकलती थी। मेहमानों का स्वागत जानवरों के मुखौटे और सब्जियों की माला जैसी उटपटांग चीजों से किया जाता था। क्रिकेट मैच में चीयर्स गल्र्स की तर्ज पर तालियों की गडग़ड़ाहट के बीच लंगोटधारी चीयर्स ब्वॉय मंच पर उतारे जाते थे।

ठंडाई पीकर करते हैं मस्ती

इलाहाबाद की होली और ठंडई एक-दूसरे के पूरक हैं। ठंडई में नशा गहरा करने के लिए इसमें भांग भी मिलाया जाता है। भांग मिश्रित ठंडई का सुरूर ही है जो हर कोई एक-दूसरे से कहता है कि ‘छान-छान किसी की न मान, जब छूट जाएगा प्राण, तब कौन कहेगा छान।’ होली पर तैयार की जाने वाली ठंडई आम दिनों की ठंडई से अलग होती है। इसमें सूखे मेवे व केसर आदि की भरमार रहती है। इसे काजू, बादाम, पिस्ता, काली मिर्च, पोस्ते का दाना, सौंफ, क्रीम, इलायची एवं गुलाब की पंखुडियों आदि का मिश्रण कर बनाया जाता है। आमतौर पर इस तरह की चीजों से दूर रहने वाले भी होली के अवसर पर इसका सेवन करने से नहीं हिचकते। ठंडई तो ऐसी बनाई जाती है कि इसकी सुगंध से बच्चे भी खासा आकर्षित रहते हैं।

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राघवेंद्र प्रसाद मिश्र जो पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद एक छोटे से संस्थान से अपने कॅरियर की शुरुआत की और बाद में रायपुर से प्रकाशित दैनिक हरिभूमि व भाष्कर जैसे अखबारों में काम करने का मौका मिला। राघवेंद्र को रिपोर्टिंग व एडिटिंग का 10 साल का अनुभव है। इस दौरान इनकी कई स्टोरी व लेख छोटे बड़े अखबार व पोर्टलों में छपी, जिसकी काफी चर्चा भी हुई।

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