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पुण्यतिथि: अमेरिका के प्रस्ताव को ठुकराया था, रियाज के दम पर बने शहनाई उस्ताद

Aditya Mishra

Aditya MishraBy Aditya Mishra

Published on 21 Aug 2018 8:26 AM GMT

पुण्यतिथि: अमेरिका के प्रस्ताव को ठुकराया था, रियाज के दम पर बने शहनाई उस्ताद
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लखनऊ: शहनाई उस्ताद भारत रत्न 'बिस्मिल्लाह खान' की आज पुण्यतिथि है। शादी हो या फिर मातमी माहौल अक्सर आपको शहनाई की धुन सुनाई पड़ जाती होगी। इसकी गूंज केवल अपने ही देश में नहीं, बल्कि पूरे विश्व में पहुंचाने का श्रेय शहनाई के बिस्मिल्लाह खान को ही जाता है।

एक बार एक अमेरिकी व्यापारी उनसे मिलने के लिए काशी आए थे। उसने खान साहब से कहा कि जितना भी पैसा चाहिए ले लीजिए, लेकिन हमारे साथ अमेरिका चलिए। लेकिन बिस्मिल्लाह खान ने जाने से मना कर दिया था।newstrack.com आज आपको उसी बिस्मिल्लाह खान की अनटोल्ड स्टोरी के बारे में बता रहा है।

रियाज के दम पर बने शहनाई के उस्ताद

शहनाई के शहंशाह उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का जन्म 21 मार्च 1916 को बिहार के बक्सर जिले के डुमरांव राज के पैगंबर बख्श मियां के घर हुआ था। शहनाई से लगाव देखकर आर्थिक तंगी से बेहाल पैगंबर बख्श, बेटे कमरूद्दीन को मामू अली बक्श के यहां बनारस भेज दिया।

रियाज के बूते पर साधारण शहनाई पर शास्त्रीय धुन बजाकर पूरे विश्व को अपना मुरीद बना लिया। सबसे पहले साल 1930 में इलाहाबाद में कार्यक्रम पेश करने का मौका मिला था। इसके बाद जैसे पीछे मुड़कर देखने का मौका ही नहीं मिला। धीरे-धीरे खान साहब उस्ताद बन गए।

इन गलियों में बीता था बचपन

छह साल की उम्र में ही वह बिहार से बनारस पहुंचे और मामा अली बख्श से शहनाई की शिक्षा लेने लगे। बनारस की दालमंडी, बालाजी घाट, पक्का महल और मंगलागौरी की गलियों में ही उनका बचपन बीता।

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अमेरिका जाने से किया था मकान

बेटे जामिन बताते हैं कि बचपन के दिनों में अब्बा जान को एक अमेरिकी व्यापारी मिलने के लिए काशी आए थे। उसने खान साहब से कहा कि जितना भी पैसा चाहिए ले लीजिए, लेकिन हमारे साथ अमेरिका चलिए। खान साहब ने पूछा, 'क्या वहां मां गंगा मिलेंगी। गंगा को भी ले चलो तब चलूंगा।' आज भी खान साहब के कमरों में रियाज की पिपहरी, जूता, चप्पल और उनके कागजात को सहेज कर रखा गया है। जामिन बताते हैं कि अब्बा जान शहनाई का रियाज बालाजी घाट पर गंगा की लहरों के साथ तान मिलाकर किया करते थे।

अमेरिकी संस्था निखारेगी घाट

विश्व के हेरिटेज बिल्डिंग को बचाने का संकल्प लिए अमरीकन एक्सप्रेस संस्था 18वीं सदी के बालाजी घाट के स्वरूप को निखारेगी। गंगा तट पर स्थित बालाजी मंदिर और बालाजी घाट के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। बालाजी घाट बिस्मिल्ला खान की यादों से भी जुड़ा है। उस्ताद बिस्मिल्ला खान यहां बने नौबत खाने में बैठ कर शहनाई की तान छेड़ गंगा की अराधना किया करते थे।

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भारत के हेरिटेज बिल्डिंग पर कर रही है काम

अमरीकन एक्सप्रेस संस्था भारत में INTACH के साथ मिलकर जीर्णशीर्ण हुए घाट और बालाजी जी मंदिर का प्राचीन स्वरूप लौटाएगी। INTACH की कोऑर्डिनेटर बिंदु मनचंदा ने बताया कि बालाजी जी घाट प्राचीन कला और संस्कृति की धरोहर है। इसका काफी हिस्सा गिर चूका है। इस घाट को नेपाल की साखू की लकड़ी और पत्थरों को तराश कर बनाया गया था।

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