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सिस्टम की फाइलों में जब खो गई आस, ग्रामीणों ने किया अपने हाथ अपना विकास

Rishi

RishiBy Rishi

Published on 22 Aug 2018 1:12 PM GMT

सिस्टम की फाइलों में जब खो गई आस, ग्रामीणों ने किया अपने हाथ अपना विकास
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लखनऊ : ग्रामीण जनता की सुविधाओं के लिए दौड़ रही फाइलें सिस्टम के मकड़जाल में कही खो गयीं। लोग विकास की बात जोहते थक गए। आँखे पथरा गयीं। विकास के लिए सरकारों के सभी दावे अखबारों और चैनलों पर तो दिख रहे थे लेकिन हकीकत में कुछ कही नजर नहीं आ रहा था। ऐसे में गांव की भोली भाली जनता को समझ आने लगा कि सर्कार और उसके तंत्र से कुछ उम्मीद न की जाय। कर बहियाँ बल आपने की तर्ज पर जब सभी जुटे तो खुद ही रास्ता तैयार हो गया। यहाँ हम यूपी, बिहार और झारखण्ड में ग्रामीण जनता द्वारा खुद अपने लिए पुल और सड़क बनाने की कहानी प्रस्तुत कर रहे हैं।

गोंडा : चंदा से जुटे 30 लाख तो बनने लगा पुल

बात गोंडा जिले में टेढ़ी नदी के आर पार बेस गावो की है। लोगो को अपने जिला मुख्यालय तक की 7 किमी की दूरी तय करने के लिए 20 किमी का चक्कर लगाना पड़ता है। लोगो की इस परेशानी को दूर करने के लिए यहाँ एक आश्रम बना कर रहने वाले मेरठ से आये एक साधु ने पहल की है। उन्होंने गांव वालो से चन्दा एकत्र करा कर टेढ़ी नदी पर सेतु के निर्माण कार्य शुरू करा दिया है। इस निर्माण कार्य में गांव वाले खुद ही मिस्त्री और मजदूर के रूप में कार्य कर रहे हैं। पुल के दो पिलर बन कर तैयार हो चुके हैं। अब गांव वालो को लगने लगा है कि उनकी वर्षो पुरानी गंभीर समस्या से उन्हें मुक्ति मिल सकेगी।

श्रावस्ती : ग्रामीणों ने खुद ही बना डाला अस्थाई पुल

प्रदेश के ही श्रावस्ती जिले में जब प्रशासन ने ग्रामीणों की नहीं सुनी तो उन्होंने हिम्मत करके राप्ती नदी पर खुद ही अस्थाई पुल बना डाला। पुल न बनने से अधर में लटके विकास को गति देने के लिए ग्रामीणों ने खुद अपने हाथ मजबूत किये और मंजिल तक सफर आसान करने के लिए अलग-अलग घाटों पर बांस बल्ली के सहारे पुल बना डाला। अब ग्रामीणों ने खुद ही चंदा लगाकर अपने रास्ते को आसान किया है। श्रावस्ती जिले के इकौना, गिलौला विकास क्षेत्र के दर्जनों गांव राप्ती नदी के किनारे पर स्थित है। नदी में पानी भरा होने से गांव के लोग गांव में ही कैद होकर रह गए थे। सरकार की कल्याणकारी योजनाएं भी गांव तक नहीं पहुंच पाती थी। बरसात के दिन बीतने के बाद जब कछार में पानी कम होता है तो क्षेत्र के किसान या सब्जी की खेती करते हैं। इसे मंडी तक पहुंचाने के लिए रास्ता ना होने से किसानों की गरीबी दूर नहीं हो पाती थी।

लोगों को 30 से 45 किलोमीटर तक अतिरिक्त सफर से मुक्ति

इस क्षेत्र के ग्रामीण बताते हैं कि जिला तहसील व ब्लाक मुख्यालय पहुंचने के लिए यहां के लोगों को 30 से 45 किलोमीटर तक अतिरिक्त सफर करना पड़ता था। कछार का इलाका होने से यहां सुगम यातायात के साधनों की कमी थी। गांव के लोगों को कड़ी मेहनत कर राप्ती नदी के सिसवारा, मध्य नगर के बेली ककरा, व मझौवा सुमाल घाटों पर खुद से लकड़ी का पुल बना कर तैयार कर लिया। अस्थाई ही सही पर इन्होंने कछार में रह रहे लोगों की ठहरी हुई जिंदगी को नई गति दी है।

मलाही के तौर पर कुछ रुपए लेकर निकलते हैं खर्च

गिलौला ब्लाक के सिसवारा घाट पुल के देखरेख की जिम्मेदारी के लिए सोहन लाल वर्मा बताते हैं कि पुल के सहारे नदी पार करने वाले लोगों से मलाही के तौर पर कुछ रुपए लिए जाते हैं। साइकिल सवार से 5 रुपये, बाइक सवार से 10 रुपये लिए जाते हैं। इस पैसे से पुल बनाने का खर्च तो निकलता ही है। इसकी सुरक्षा व प्रबंध देखने वाले लोगों को रोजगार भी मिला है। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार मांग करने के बावजूद जब जिम्मेदारों ने नहीं सुनी तो उन्होंने राप्ती नदी के कछार में स्थित गांव के लोगों ने पुल बना दिया। ग्रामीणों ने बताया कि अति पिछड़े क्षेत्रों को तहसील ब्लाक व जिला मुख्यालय से जुड़ने के लिए नदी के घाटों पर पक्के पुल की दरकार है लंबे समय से है लेकिन ग्रामीणों की इस जरूरत पर सिर्फ राजनीति हो रही है।

हापुड़: काली नदी पर खुद ही पुल बना रहे ग्रामीण

हापुड़ में काली नदी पर भी चन्दा लगा कर खुद ही पुल बना रहे हैं। दरअसल हापुड़ में एक ऐसा खूनी रेलवे ट्रैक है जिसपर दो दर्जन से ज्यादा मौतें होने के बावजूद पुल नहीं बना। गांव वाले बताते हैं कि करीब ढाई सौ से ज्यादा ट्रेनें यहां से गुजरती हैं। नीचे काली नदी का गहरा जहरीला पानी और ऊपर तेज रफ्तार से चलती ट्रेन, जान हथेली पर लेकर इस पुल को पार करने के दौरान दो दर्जन से ज्यादा लोग मौत के घाट उतर चुके हैं। गजालपुर गांव के बुजुर्ग हरपाल काली नदी के रेलवे ट्रैक की वह जगह दिखते हैं जहां चार साल पहले उनकी बेटी, नाती और उनके दामाद की ट्रेन से कटकर मौत हो गई थी।

इसे मौत का ब्रिज कहते हैं ग्रामीण

दरअसल गजालपुर, ददारपुर और श्यामपुर जैसे गांव में रहने वाले ग्रामीणों को काली नदी पर पुल न होने की वजह से 12 किमी घूम कर हापुड़ जाना पड़ता है। अगर वे इस 60 फीट के रेलवे ट्रैक को पार करके जाते तो केवल चार किमी की दूर तय करके हापुड़ पहुंच जाते हैं। यही वजह है कि मौत के इस रेलवे ब्रिज को पार करने की जब-जब कोशिश होती तब जान जाने का खतरा बढ़ जाता।

सरकार 60 साल में 60 फीट का पुल नहीं बना पाई

दर्जनों मौतों के बावजूद जब सरकार 60 साल में 60 फीट का पुल नहीं बना पाई तो इन ग्रामीणों ने खुद काली नदी पर पुल बनाने की शुरुआत कर दी। मजदूर बनकर ग्रामीण इस पुल को बनाने में जुटे हैं। पुल बनाने में घूंघट वाली महिलाओं से लेकर बुजुर्ग और नौकरी कर रहे लोग तक शामिल हैं। हालांकि पैसों की समस्या आड़े आ रही है लेकिन फिलहाल चंदे के चार लाख रुपए से पुल काफी हद तक बन चुका है। गजालपुर गांव के समरपाल कहते हैं कि हम बस यही कहना चाहते हैं कि किसी नेता या जनप्रतिनिधि ने हमारा सहयोग नहीं किया। काफी दौड़ भाग की है, हमें लग रहा है कि हमारा गांव बलूचिस्तान में है।

बरेली : गांव वालों ने खुद ही बना लिया पुल

अखिलेश सरकार की प्राथमिकता वाले लोहिया समग्र गांव मुडिया हाफिज के लिए अफसर संपर्क मार्ग के टूटे पुल का निर्माण नहीं करा पाए। जनप्रतिनिधियों ने भी लाचारी जाहिर कर दी तो गांव वालों ने खुद ही पुल बनवाने का निर्णय कर लिया। आपस में सबने चंदा किया और 85 हजार रुपये जुटाकर 15 फिट लंबाई और इतनी ही चौड़ाई के पुल का निर्माण डेढ़ महीने में कराकर अपने लिए रास्ता बना लिया।

लोहिया गांव था घोषित, फिर भी नहीं हुआ काम

करीब तीन हजार की आबादी वाला मुडिया हाफिज गांव वित्तीय वर्ष 2013-14 के लिए लोहिया समग्र गांव के रूप में चयनित हुआ था लेकिन इस गांव में नाम भर के लिए काम कराए गए। गांव वाले अफसरों से कहते रहे कि गांव के संपर्क मार्ग पर स्थित पुल जर्जर है, इसका निर्माण करा दो लेकिन उनकी फरियाद नहीं सुनी गई। नतीजा यह हुआ कि पिछले साल सितंबर में यह पुल टूट गया। गांव को यही पुल प्रमुख रास्ता है जो धौराटांडा कस्बे से जुड़ता है इसलिए ग्रामीणों के लिए रास्ता बंद हो गया। गांव के प्रधान मोहम्मद उमर बताते हैं कि पुल बनवाने के लिए नहर और सिंचाई विभाग से लेकर बीडीओ और प्रशासन तक से फरियाद की। सांसद संतोष गंगवार और क्षेत्रीय विधायक शहजिल इस्लाम से भी गांव के लोग मिले और अफसरों से कहकर पुल बनवाने को कहा लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला।

आश्वासनों से ऊबे गांव के लोगो ने कर लिया फैसला

सिंचाई विभाग वालों ने कह दिया कि प्रस्ताव बनाकर शासन को भेज देंगे। जब पैसा आएगा तब पुल बनवा दिया जाएगा। मुख्तार अंसारी बताते हैं कि पूर्व बीडीओ ने आश्वासन दिया था कि प्रस्ताव बनाकर भेज रहे हैं। मंजूरी के बाद पैसा आएगा तो काम शुरू करा देंगे। कुछ महीने तो इंतजार किया कि शायद पुल बन जाए लेकिन जब अफसरों और जनप्रतिनिधियों ने कुछ नहीं किया तो प्रधान मोहम्मद उमर से रायमशविरा करके लोगों से चंदा करके खुद ही पुल बनवाने का फैसला ले लिया। इस बारे में भोजीपुरा की क्षेत्र विकास अधिकारी ने भी स्वीकार किया कि पुल का निर्माण सिंचाई विभाग को कराना था। उनके स्तर से प्रस्ताव गया होगा तो मेरी जानकारी में नहीं है लेकिन यह पता है कि पुल का निर्माण गांव वालों ने खुद ही करा लिया।

बिहार : चंदा से पल बना रहे ग्रामीण

छपरा जिले के गरखा थाना क्षेत्र के स्थानीय रामपुर गढवारटोला गंडकी नदी पर लगभग छह माह से ग्रामीणों द्वारा चन्दा इकट्ठा कर पुल बनवाया जा रहा है। पुल के बन जाने से ग्रामीणों के लिए लगभग छह किलोमीटर की दूरी कम हो जाएगी। यहां के महादलित छात्र-छात्राओं को काफी समस्या होती है। छात्र तो छह किलोमीटर अपनी साइकिल चलाकर या पैदल चले जाते हैं, लेकिन वहां की छात्राएं शिक्षा से वंचित रह जाती हैं। वहीं स्थानीय लोगों की मानें तो चुनाव के समय प्रतिनिधियों द्वारा लाख दावे किए जाते हैं, लेकिन जीत जाने के बाद तो पुल बनाने की बात कौन करे, जनता को कोई पूछने भी नहीं आता है। अगर रात्रि में किसी व्यक्ति की तबीयत खराब हो जाए या कोई काम हो तो छह किलोमीटर घूम कर जाना पड़ता है. रामपुर में भी गंडक नदी पर पुल बना है। वह भी पूरी तरह से जर्जर हो चुका है। वह पुल भी भगवान भरोसे ही चल रहा है। पुल कब पानी में बह जाए इसकी गारंटी नहीं है। यहां के स्थानीय चन्दा मांगकर इसका निर्माण करवा रहे हैं ब्रजेश सिंह शिक्षक, महामाया सिंह,नरेश राय, उपमुखिया रामपुर पंचायत, दिनेश राय, रामपुर मुखिया बच्चू प्रसाद बीरू, जेडीयू नेता सुरेंद्र मिस्त्री, परमा सिंह, भूतपूर्व मुखिया रामपुर शिवजी तिवारी, रामएकबाल महतो, राजेश दास, अशोक सिंह, रविन्द्र सिंह आदि लोगों के सहयोग से इस पुलिया का निर्माण कार्य कराया जा रहा है।

झारखण्ड : 58 करोड़ का प्रोजेक्ट महज 50 लाख में पूरा किया ग्रामीणों ने

झारखंड के एक गांव में सड़क नहीं थी। गांववालों की मांग पर बार-बार नेता सड़क बनवाने का वादा करते थे, पर कभी काम शुरू नहीं हुआ। आखिरकार, वादों से तंग गांववालों ने खुद ही सड़क बना ली। मामला हजारीबाग जिले के लराही गांव का है। यह भी दिलचस्प है कि गांववालों ने इस काम को पूरा करने में महज 50 लाख रुपए खर्च किए। इसी काम में सरकार 58 करोड़ रुपए खर्च कर देती। डेढ़ किमी सड़क बनाकर गांववालों ने कोडरमा की दूरी भी 15 किमी कम कर दी।पहले कोडरमा जाने के लिए 45 किमी की दूरी तय करनी पड़ती थी। अब सिर्फ 30 किमी की दूरी तय करनी पड़ेगी। लोगों ने श्रमदान और चंदे के पैसे से न सिर्फ डेढ़ किमी लंबी सड़क बनाई, बल्कि करीब 100 फीट चौड़ी कोयला नदी पर पुल भी बना दिया।

हादसे में मर गए थे 6 गांववाले

जिस कोयला नदी पर सड़क बनाई गई है, बरसात में वहां 15 से 20 फीट पानी रहता है। सड़क-पुलिया बनाने में अहम रोल अदा करने वाले त्रिलोकी यादव ने बताया कि 1996 में नदी में नाव पलटी थी। इसमें छह लोगों की मौत हो गई थी। इसके बाद से ही गांववाले सड़क और पुल बनाने की मांग कर रहे थे। लेकिन नेताओं की ओर से सिर्फ आश्वासन ही मिलता रहा। आखिरकार, गांव वाले चंदे और श्रमदान से यहां पुल और सड़क बनाने के लिए राजी हुए।

सरकारी काम होता तो 58 करोड़ खर्च होता

सड़क के अलावा गांववालों ने दो और छोटी-छोटी पुलिया बनाई गई। इस काम को करने के लिए 50 लोगों ने लगातार चार महीने तक काम किया। इस तरह ग्रामीणों ने सरकार की करीब 58 करोड़ की परियोजना को महज 50 लाख रुपए में पूरी कर दिया। इससे 20 से ज्यादा गांवों को फायदा मिलेगा। 28 फरवरी 2016 से यह काम शुरू किया गया था, करीब चार माह में ही 85 पर्सेंट काम पूरा कर अपनी एकता की ताकत दिखाई।

गांववालों ने ऐसे मिलकर किया काम

काम के लिए दो पोकलेन करीब 11 सौ घंटा चलाई गई। इसका मार्केट रेट 15 सौ रुपए प्रति घंटा है। पांच हाइवा एक महीना चला। हाइड्रा छह दिन, जेसीबी छह दिन। श्रमदान करने के लिए लराही गांव से रोज 50 महिला-पुरुषों ने लगातार तीन महीने तक काम किया। ग्रामीणों ने होली, रामनवमी जैसे त्योहारों पर भी काम किया। सड़क बनाने को ही किसी त्योहार से ऊंचा दर्जा देकर दिनभर काम में जुटे रहे। एक बड़ा पुल और दो पुलिया बनाने का काम 5 जून 2016 से शुरू किया गया था। पुल बनाने के लिए 85 पीस ह्यूूम पाइप लाने में दो दिन टेलर चला। इस निर्माण में 700 बैग सीमेंट, 30 ट्रैक्टर छरी (गिट्टी), 10 हाईवा बोल्डर, मेटल 55 ट्रैक्टर और 120 ट्रैक्टर बालू से सड़क और पुल बनाया।

सरकार के मुंह पर तमाचा

गांववालों ने कहा कि नाव हादसे के बाद कई सांसद, विधायक ने पुल और सड़क का सपना दिखाया, लेकिन किसी ने काम पूरा नहीं किया। गांव के रामचंद्र यादव ने बताया, "नेताओं के मुंह मोड़ने के बाद गांव के लोगों ने हिम्मत नहीं छोड़ी। सभी ने कंधे से कंधा मिलाकर काम किया और उसका नतीजा आज हमारे सामने है।स्थानीय विधायक मनोज कुमार यादव ने कहा, "गांववालों ने प्रशंसनीय काम किया है। एक मिसाल पेश की है, जो सरकार के मुंह पर तमाचा है। जनप्रतिनिधियों के लिए भी एक सबक है।

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आशीष शर्मा ऋषि वेब और न्यूज चैनल के मंझे हुए पत्रकार हैं। आशीष को 13 साल का अनुभव है। ऋषि ने टोटल टीवी से अपनी पत्रकारीय पारी की शुरुआत की। इसके बाद वे साधना टीवी, टीवी 100 जैसे टीवी संस्थानों में रहे। इसके बाद वे न्यूज़ पोर्टल पर्दाफाश, द न्यूज़ में स्टेट हेड के पद पर कार्यरत थे। निर्मल बाबा, राधे मां और गोपाल कांडा पर की गई इनकी स्टोरीज ने काफी चर्चा बटोरी। यूपी में बसपा सरकार के दौरान हुए पैकफेड, ओटी घोटाला को ब्रेक कर चुके हैं। अफ़्रीकी खूनी हीरों से जुडी बड़ी खबर भी आम आदमी के सामने लाए हैं। यूपी की जेलों में चलने वाले माफिया गिरोहों पर की गयी उनकी ख़बर को काफी सराहा गया। कापी एडिटिंग और रिपोर्टिंग में दक्ष ऋषि अपनी विशेष शैली के लिए जाने जाते हैं।

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