कुंभ 2019 – मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर, आस्था का पर्व

कुंभ और मानवता एक दूसरे के परिचायक है। कुंभ पर्व में मेलजोल और मानवजीवन के उत्थान पर चिंतन मानवता को प्रगाढ़ करता है। पूरे विश्व में यह संदेश देने में आस्था  के इस पर्व ने लगातार का कार्य किया है।स्नान और दान के माध्यम से दिनचर्या में जीता हुआ कुंभ पर्व जीवन के प्रति उल्लास और प्रेम की एक ऐसी डगर बनाता है जिस पर चल कर मानवता के फूल खिलाए जाते है।

कुंभ 2019 - मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर, आस्था का पर्व

अनूप ओझा

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,
पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,
सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥

कुंभ और मानवता एक दूसरे के परिचायक है। कुंभ पर्व में मेलजोल और मानवजीवन के उत्थान पर चिंतन मानवता को प्रगाढ़ करता है। पूरे विश्व में यह संदेश देने में आस्था  के इस पर्व ने लगातार का कार्य किया है।स्नान और दान के माध्यम से दिनचर्या में जीता हुआ कुंभ पर्व जीवन के प्रति उल्लास और प्रेम की एक ऐसी डगर बनाता है जिस पर चल कर मानवता के फूल खिलाए जाते है।

मानव मात्र का कल्याण, सम्पूर्ण विश्व में सभी मानव प्रजाति के मध्य वसुधैव कुटुम्बकम के रूप में अच्छा सम्बन्ध बनाये रखने के साथ आदर्श विचारों एवं गूढ़ ज्ञान का आदान प्रदान कुंभ का मूल तत्व और संदेश है जो कुंभ पर्व के दौरान प्रचलित है। कुंभ भारत और विश्व के जन सामान्य को अविस्मरणीय काल तक आध्यात्मिक रूप से एकताबद्ध करता रहा है।

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यूनेस्को की ‘ग्लोबल इनटैंजिबल कल्चरल हेरिटेज लिस्ट’
यूनेस्को द्वारा साल 2017 में कुंभ मेले को ‘ग्लोबल इनटैंजिबल कल्चरल हेरिटेज लिस्ट’ में शामिल किया गया था। कुंभ मेले को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के तौर पर यूनेस्कों ने अपनी सूची में शामिल करते हुए इसे पृथ्वी पर विभिन्न संप्रदायों के शांतिपूर्ण पर्व के तौर पर देखा था। क्योंकि कुंभ में किसी भी पंथ और धर्म को माननेवाले लोग जा सकते हैं।

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ऐतिहासिक साक्ष्य कालनिर्धारण के रूप में राजा हर्षवर्धन का शासन काल (664 ईसा पूर्व) के प्रति संकेतन करते हैं जब कुंभ मेला को विभिन्न भौगोलिक स्थितियों के मध्य व्यापक मान्यता प्राप्त हो गयी थी। प्रसिद्व यात्री हवेनसांग ने अपनी यात्रा वृत्तांत में कुंभ मेला की महानता का उल्लेख किया है। यात्री का उल्लेख राजा हर्षवर्धन की दानवीरता का सार संक्षेपण भी करती है।

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किसी उत्सव के आयोजन में भारी जनसम्पर्क अभियान, प्रोन्नयन गतिविधियां और अतिथियों को आमंत्रण प्रेषित किये जाने की आवश्यकता होती है, जबकि कुंभ विश्व में एक ऐसा पर्व है जहाँ कोई आमंत्रण अपेक्षित नहीं होता है उसके बाद भी करोड़ों तीर्थयात्री इस पवित्र पर्व को मनाने के लिये एकत्र होते हैं। कुंभ पर्व का एक महत्वपूर्ण भाग गरीबों एवं वंचितों को अन्न एवं वस्त्र का दान कर्म है और संतों को आध्यात्मिक भाव के साथ गाय एवं स्वर्ण दान किया जाता है।

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परम्पराओं, भाषाओं और लोगों का भी अद्भुत संगम – प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संदेश में कहा,कुम्भ को भारतीय संस्कृति को महापर्व कहा गया है। प्रयागराज के इस संगम में कुम्भ के समय कई परम्पराओं, भाषाओं और लोगों का भी अद्भुत संगम होने वाला है। संगम तट पर स्नान और पूजन का तो विशिष्ट महत्व है ही, साथ ही कुम्भ का बौद्धिक, पौराणिक, ज्योतिषीय और वैज्ञानिक आधार भी है। एक प्रकार से कहें तो कुम्भ स्नान और ज्ञान का भी अनूठा संगम सामने लाता है।

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कुम्भ में श्रद्धालुओं को विभिन्न मठों से जुडे शंकराचार्यों, महामंडलेश्वरों और साधु-संतों का सान्निध्य मिलता है। इसे विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक मेला माना जाता है। हमारे लिए यह गर्व की बात है कि यूनेस्को ने कुम्भ मेले को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता प्रदान की है।आस्था के इस पावन पर्व में आकर्षण से खिंचे हुए देश विदेश से श्रद्धालु गण प्रयागराज की धरती पर मानवता के सजीव चित्रण को महसूस करते है। पर्यावारण,आपसी समरसता,हिंदू धर्म की मान्यताएं और जीवन को धन्य बनाने का लक्ष्य लिए कलपवासी एक मास तक संगम तट पर निवास करते हुए जीवन के विविध रूपों और रहस्यों का अवलोकन करते है।कुंभ पर्व में देश विदेश के विभिन्न हिस्सों में निवास करने वाले मानवों की जीवनशैली से मानवता के अलग रंग दिखायी देते हैं।दान,दया और परोपकार सहयो्ग के आधार पर विकसित हुयी मानवता का संगम को कुंभ मेले में साक्षात देखने को मिलता है।

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कुंभ का आध्यात्मिक मंथन
परम्परा कुंभ मेला के मूल को 8वी शताब्दी के महान दार्शनिक शंकर से जोड़ती है, जिन्होंने वाद विवाद एवं विवेचना हेतु विद्वान सन्यासीगण की नियमित सभा संस्थित की। कुंभ मेला की आधारभूत किवदंती पुराणों (किंबदंती एवं श्रुत का संग्रह) को अनुयोजित है-यह स्मरण कराती है कि कैसे अमृत (अमरत्व का रस) का पवित्र कुंभ (कलश) पर सुर एवं असुरों में संघर्ष हुआ जिसे समुद्र मंथन के अंतिम रत्न के रूप में प्रस्तुत किया गया था। भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर अमृत जब्त कर लिया एवं असुरों से बचाव कर भागते समय भगवान विष्णु ने अमृत अपने वाहन गरूण को दे दिया, जारी संघर्ष में अमृत की कुछ बूंदे हरिद्वार, नासिक, उज्जैन और प्रयाग में गिरी। सम्बन्धित नदियों के प्रत्येक भूस्थैतिक गतिशीलता पर उस महत्वपूर्ण अमृत में बदल जाने का विश्वास किया जाता है जिससे तीर्थयात्रीगण को पवित्रता, मांगलिकता और अमरत्व के भाव मंन स्नान करने का एक अवसर प्राप्त होता है। शब्द कुंभ पवित्र अमृत कलश से व्युत्पन्न हुआ है।

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कुम्भ का तात्विक अर्थ
कुम्भ सृष्टि में सभी संस्कृतियों का संगम है। कुम्भ आध्यत्मिक चेतना है। कुम्भ मानवता का प्रवाह है। कुम्भ नदियां, वनों एवं ऋषि संस्कृति का प्रवाह है। कुम्भ जीवन की गतिशीलता है। कुम्भ प्रकृति एवं मानव जीवन का संयोजन है। कुम्भ ऊर्जा का श्रोत है। कुम्भ आत्मप्रकाश का मार्ग है।

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वेदों से मानवता की राह
प्राथमिक स्नान कर्म के अतिरिक्त पर्व का सामाजिक पक्ष विभिन्न यज्ञों, वेद मंत्रों का उच्चारण, प्रवचन, नृत्य, भक्ति भाव के गीतों, आध्यात्मिक कथानकों पर आधारित कार्यक्रमों, प्रार्थनाओं, धार्मिक सभाओं के चारो ओर धूमती हैं, जहाँ सिद्धांतों पर वाद-विवाद एवं विमर्श प्रसिद्ध संतों एवं साधुओं के द्वारा किया जाता है और मानकस्वरूप प्रदान किया जाता है।

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स्नान
मकर संक्रांति (माघ मास का प्रथम दिन, जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है) से आरंभ होकर प्रयागराज कुंभ के प्रत्येक दिन इस कर्मकाण्ड का सम्पादन एक पवित्र स्नान माना जाता है, तथापि कतिपय मांगलिक पवित्र स्नान तिथियां और भी हैं। शाही स्नान कुंभ मेला का प्रमुख केन्द्रीय आकर्षण हैं और महोत्सव का सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाग है।

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आरती
विभिन्न स्वरूपों यथा नदी, पर्वत ,वृक्ष आदि को देव-स्वरुप मान कर उनकी आराधना करने का प्रचलन आदिकाल से चला आ रहा है। इसी प्रकार श्रद्धाभाव, आदर एवं सम्मान से ओत-प्रोत आरतियाँ तीर्थराज प्रयाग में गंगा एवं यमुना के तटों के साथ- साथ संगम स्थल पर भी आयोजित होती हैं।

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मानवीय पक्ष में लगातार खोज करने की जीवंत प्रयोगशाला
मानवीय पक्ष में लगातार खोज करने की जीवंत प्रयोगशाला की भूमिका निभाने वाला यह महाआयोजन सभी मनुष्यों में स्नेह करने का मूल पाठ मानव धर्म सिखाता है। जाति, संप्रदाय, वर्ण, धर्म, देश आदि के विभिन्न भेदभाव के लिए यहां कोई स्थान नहीं है। मानव धर्म का आदर्श और इसकी मनोभूमि अत्यंत ऊंची है और इसके पालन में मानव जीवन की वास्तविकता निहित है। कुंभ का चिरायु होना यह सिद्ध करता है कि मानवता यहां अंकुरित होती है।