नवाब की मोहब्बत: कभी दी जाती थी मिसाल, अब धीरे-धीरे हो रही ख़त्म

यहां का मुख्य आकर्षण भवनों में वास्तुकला का बेजोड़ नमूना व कोंड़र झील में उतरती भवन की सीढ़ियां हैं। कोंड़र झील में केवड़े की महक नवाब आसफ़उद्दौला की देन है।

Published by Rahul Joy Published: May 31, 2020 | 12:41 pm
Modified: May 31, 2020 | 12:45 pm
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गोंडा। जिले के़ वजीरगंज कस्बे के निकट जमशेद बाग में बेगम के मकबरे को देखकर ही एहसास हो जाता है कि अपनी सबसे चहेती पत्नी शमसुन्निसा बेगम उर्फ दुल्हन बेगम को नवाब कितना पसंद करते थे। बेगम से बेइंतहा मोहब्बत में ही नवाब आसफुद्दौला ने 250 साल पहले गोंडा जिले में जमशेद बाग का निर्माण कराया था। जहां वे महीनों बेगम के आगोश में रहकर अपना राजकाज चलाते थे।

नवाब के प्रेम की निशानी जमशेद बाग एक समय अवध साम्राज्य के राजनीतिक का केन्द्र रहा। लेकिन अब यहां सिर्फ़ जर्जर इमारत, बारादरी, इमामबाड़ा, टूटी चहार दीवारी और उपेक्षित कोंडर झील के सिवाय और कुछ नहीं दिखता। आज भले ही अवध के नवाब द्वारा बसाए गए जमशेद बाग की पहचान पुराने स्मारकों में एक उजड़े स्थान के रुप में रह गई है, किन्तु एक समय में यह अवध की मिनी राजधानी हुआ करता था।

अवध के नवाब

मुग़ल बादशाह मोहम्मद शाह ने 09 सितंबर 1722 को अपने सिपहसालार सआदत खान को अवध की नवाबी दी थी। सआदत खान मूलतः फ़ारस के ख़ोरासान इलाके से थे। मुग़ल साम्राज्य के सभी मुस्लिम प्रांतों और अधीनस्थों में अवध का यह शाही परिवार सबसे नया था। मुग़लों की सेवा में कई ख़ोरासानी थे, जिनमें अधिकतर सिपाही थे और उनकी सफलता पर उन्हें इनाम मिलता था। इसमें सआदत खान सबसे अधिक सफल हुए और उन्हें 1722 में अवध प्रांत का जागीरदार बना दिया गया। उन्हें पहले पहल नाज़िम (राज्यपाल) का खिताब दिया गया था। बाद में नवाब बना दिया गया। 1740 में नवाब को नवाब वज़ीर (मुख्यमंत्री) के नाम से जाना जाने लगा।

 

अंग्रेजो से लड़ाई की

सआदत खान के बाद 1739 से 1754 तक सफदर जंग, 1754 से 1774 तक शुजाउद्दौला, 1775 से 1797 तक आसफुद्दौला, 1797 से 1798 तक वज़ीर अली, 1798 से 1814 तक सादत अली, 1814 से 1819 तक गाज़िउद्दीन हैदर, 1827 से 1837 तक गाज़िउद्दीन हैदर के बेटे नासिरुद्दीन ने शासन किया। चूंकि नासिरुद्दीन निःसंतान थे इसलिए 1837 से 1842 तक नवाब सादत अली के बेटे मोहम्मद अली शाह, 1842 से 1847 तक मुहम्मद अली शाह के पुत्र अमजद अली शाह, 1847 से 1856 तक अमजद अली शाह के सबसे बड़े पुत्र, वाजिद अली शाह अवध के शासक रहे।
1856 में अंग्रेजों ने जब अवध को हड़प लिया तो उनकी पत्नी बेगम हजरत महल ने अंग्रेजों से खूब लड़ाइयां लड़ी। लेकिन जीत नहीं पायीं। अन्ततः उन्हें मित्र राष्ट्र नेपाल में शरण लेनी पड़ी।

कौन थीं दुल्हन बेगम

अवध की तत्कालीन राजधानी फैजाबाद में आसफुद्दौला से 1769 में निकाह कर शमसुन्निसां नवाब आसफुद्दौला की बेगम बनीं। शादी के बाद में वे दुल्हन बेगम के नाम से मशहूर हुईं। बेहद खूबसूरत और भोली दुल्हन बेगम पर आसफुद्दौला फिदा थे। यही कारण था कि उनके शासन के दौरान दुल्हन बेगम की तूती बोलती थी। इतिहास कारों के अनुसार, वे बहुत नेक और धार्मिक थीं और दिन रात ख़ुदा की इबादत में लीन रहती थीं। शेरो-शायरी से भी उनका गहरा लगाव था।

कहा जाता है कि बेगम की मोहब्बत में ही नवाब ने गोंडा जिले में जमशेद बाग का निर्माण कराया था। दुल्हन बेगम की मौत के बाद उन्हें उनके सबसे पंसदीदा जमशेद बाग में जगह दफन किया गया। बेगम का यह मकबरा आज भी नवाब और बेगम के अटूट प्यार की गवाही दे रहा है।

अवध की मिनी राजधानी रहा जमशेद बाग

नवाब मोहम्मद यहिया मीरज़ा अमनी ‘आसफ़उद्दौला‘ को गद्दी मिली तो वह अवध की राजधानी को फ़ैज़ाबाद से लखनऊ ले गए। यह इतिहास का वह दौर था जब अवध सल्तनत की शान-शौकत अपने शबाब पर थी। उन्होंने कई इमारतें बनाईं और कलाओं को खूब प्रोत्साहन दिया। नवाब आसिफ़उद्दौला ने साल 1775 से 1795 के मध्य अवध की राजधानी लखनऊ से सैकड़ों मील दूर गोंडा जनपद मुख्यालय से 26 किलोमीटर दूर वजीरगंज कस्बे के पास स्थित कोंडर झील के किनारे लगभग पांच सौ एकड़ के क्षेत्रफल में मजबूत चहारदीवारी के मध्य, रिहायशी बारादरी, इमामबाड़ा, पीलखाना समेत कई भव्य इमारतों का निर्माण कराया था।

उन्होंने इसका नाम जमशेदबाग रखा था। उस समय अवध के शाही परिवार का यहां बराबर आवागमन होता रहता था। नवाब छुट्टियां बिताने सौंदर्य से परिपूर्ण इसी सुरक्षित स्थान पर आते थे और महीनों तक यहीं से राज्य का संचालन करते थे।

20 फुट ऊंची चहारदीवारी के अंदर बारादरी, न्यायालय

जमशेद बाग में बारादरी के साथ ही मस्जिद, न्यायालय एवं अनेक भवन भी निर्माण हुए थे। आसपास का क्षेत्र घने पेड़ों से आच्छादित था। इसमें फलदार वृक्ष थे। जमशेद बाग की सुरक्षा के लिए 20 फुट ऊंची व लगभग चार फुट चौड़ी चहारदीवारी बनाई गई थी। चहारदीवारी की सुरक्षा की दृष्टि से ऐसे मोढे़ बनाए गए थे, जिसके जरिए सैनिक बाहरी क्षेत्रों पर नजर रखते थे।

जरूरत पड़ने पर स्वयं को सुरक्षित रखते हुए बाहरी आक्रमण से आसानी से निपट लेते। यह क्षेत्र अभेद्य दुर्ग था। कहा जाता है कि अचानक अंग्रेजों के आक्रमण से बारादरी भवन का निर्माण अधूरा रह गया था। 1797 ई. में आसफ़उद्दौला की मृत्यु के बाद 1837 से 1842 के मध्य में तत्कालीन बादशाह (08 अक्टूबर 1819 को नवाब के स्थान पर बादशाह-ए-अवध खिताब मिला) अमजद अली शाह ने इसे अपने मंत्री अमीनउद्दौला के चहेते मुंशी बकर अली खां को दे दिया। इसके बाद से ही इस ऐतिहासिक स्थल की उपेक्षा शुरु हो गई।

बेगम की मौत से नवाब का मोहभंग

अवध की मिनी राजधानी रहे जमशेद बाग की कोंडर झील हमेशा प्रवासी पक्षियों के कोलाहल से गंुजायमान रहती थी। इस अद्भुत नजारे को देखने के लिए नवाब अपनी सबसे चहेती बेगम शम्सुन्निसा बेगम उर्फ दुल्हन बेगम के साथ झील के तट पर घंटों बैठे रहते थे। एक बार जब नवाब अपनी बेगम के साथ छुट्टियां बिताने आए तो अचानक दुल्हन बेगम की तबियत बिगड़ गई।

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तमाम इलाज के बाद भी उनको बचाया नहीं जा सका। बेगम को जमशेद बाग में ही बारादरी के ही निकट दफनाया गया। बेगम के मकबरे का अवशेष आज भी नवाब और बेगम के प्रेम की गवाही दे रहा है। बेगम की मौत के बाद नवाब आसुफद्दौला का यहां से मोहभंग हो गया और उन्होंने यहां आना बंद कऱ दिया।

वास्तुकला में बेजोड, झील में केवड़े की महक

यहां का मुख्य आकर्षण भवनों में वास्तुकला का बेजोड़ नमूना व कोंड़र झील में उतरती भवन की सीढ़ियां हैं। कोंड़र झील में केवड़े की महक नवाब आसफ़उद्दौला की देन है। ऐतिहासिक बारादरी का मुख्य आकर्षण इसके दक्षिण में सीढ़ियों को स्पर्श करती कोंडर झील है, जिसके किनारे नबाब आसिफुद्दौला अपनी बेगम के साथ सैर करने के लिए जाते थे।

उन दिनों बारादरी स्थित झील में लगे केवड़ों की खुशबू से जहां पूरा वातावरण महका करता था। बेगम के मकबरे की बेमिसाल नक्काशी व मीनाकारी भारतीय स्थापत्यकला व फारसी शैली का बेजोड़ नमूना है।

बदहाली से उजड़ा चमन

आज जमशेद बाग की पहचान पुराने स्मारकों में एक उजड़े चमन के रुप में रह गई है। यह स्थान शराबियों व जुआरियों का अड्डा बन चुका है। दूसरी ओर तोप के गोलों को भी झेलने वाली ऊंची चाहरदीवारी भी टूटकर बिखर रही है। इसके बावजूद इस स्थल का नजारा स्वर्ग की अनुभूति कराकर मन को मोह लेता है। संरक्षण के अभाव में वजीरगंज का बेगम का मकबरा भी अपना अस्तित्व खोता जा रहा है। दीवारें टूट रही हैं छत पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। मकबरे के अन्दर बनी कब्र जगह-जगह से टूट रही है।

पुरातत्व विभाग की उदासीनता से आने वाले दिनों में इस नायाब ऐतिहासिक विरासत के नष्ट होने का खतरा पैदा हो गया है। जलकुंभियों और गंदगी के तले दब कर कोंडर झील का निर्मल जल अपना अस्तित्व खोता जा रहा है। ऐतिहासिक बारादरी की शोभा बढ़ाने वाली झील पर्यटन व पुरातत्व विभाग की उपेक्षा के चलते अपने बदहाली पर सिसकियां ले रही हैं।

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खतरे में है ऐतिहासिक धरोहर

अपने वैभवशाली अतीत को समेटे बारादरी तो फिर भी कुछ बेहतर स्थिति में है। लेकिन चहारदीवारी के अंदर बनी अन्य इमारतों में इमामबाड़ा व फीलखाना पूरी तरह से जमींदोज हो चुका है। अब मकबरा भी पुरातत्व विभाग की उदासीनता के चलते नष्ट होने के कगार पर पहुंच चुका है। इसके आसपास के बाग काफी पहले ही नष्ट हो चुके हैं।

अधिकांश चहारदीवारी भी ढह चुकी है। बारादरी में लगी इमारती लकड़ियां लोग निकाल ले गए। आसपास की जमीन पर अतिक्रमण है। इसके बावजूद मुख्य भवन का आकर्षण कम नहीं हुआ है। भवन की सुंदरता निखारने वाली कोड़र झील जलकुंभी से पटी पड़ी है।

औपचारिकता निभा रहा पुरातत्व विभाग

पुरातत्व विभाग ने एक दशक पूर्व बारादरी की मरम्मत करा कर उसका पुनरुद्धार कराया था। किन्तु यहीं पर स्थित दूसरी इमारतें विभाग के रहमोकरम से अछूती ही रहीं। कुछ साल पहले पुरातत्व विभाग ने औपचारिकता वश भवन के किनारे कंटीले तार लगाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली। इसके संरक्षण के लिए विभाग ने बोर्ड लगा दिया और चौकीदार भी तैनात किया जो कभी-कभी आता है। मात्र कागजी खानापूर्ति के प्रशासनिक अमला भी इसके संरक्षण के लिए कुछ नहीं कर रहा है।

अब इसके अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है। जिले के वरिष्ठ अधिवक्ता जटाशंकर सिंह ने कहते हैं कि बारादरी हमारी विरासत है, इसे संरक्षित करना पुरातत्व विभाग का काम है। इसके संरक्षण के लिए प्रदेश एवं केन्द्र सरकार को आगे आना चाहिए। चिकित्सक डा. ओम प्रकाश भारती ने कहा कि जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को इसके संरक्षण व विकास के लिए कुछ करना चाहिए।

रिपोर्टर- तेज प्रताप सिंह , गोंडा

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