अपना भारत/न्यूज़ट्रैक Exclusive : राष्ट्रपति चुनाव सिर्फ पद नहीं प्रतिष्ठा की भी लड़ाई

अनुराग शुक्ला
     अनुराग शुक्ला

लखनऊ। उत्तर प्रदेश को सियासत का अखाड़ा कहा जाय तो गलत नहीं होगा। यहां जीत-हार के हर दांव है। हर शह और मात में दांव का मजा है। हर दांव की सीख है। हर सीख के बाद नए दांव हैं।

चुनाव भले ही राष्ट्रपति का हो रहा हो पर सियासी दांवपेंच में यूपी में कोई कमी नहीं है। किसकी जीत या किसकी हार होगी, इससे इतर उत्तर प्रदेश में हर पार्टी को इस चुनाव में बहुत कुछ खोना-पाना है। इस चुनाव में उनका बहुत कुछ दांव पर है।

भाजपा की नजर दूसरे दलों पर 
अगर भाजपा की बात की जाय तो इतना तो तय है कि आंध्र, तेलंगाना से समर्थन मिलने और नीतीश कुमार के विपक्ष के उम्मीदवार के पक्ष में न खड़े होने से अब उसके उम्मीदवार रामनाथ कोविंद की जीत करीब-करीब पक्की है। उत्तर प्रदेश के लिहाज से देखा जाय तो कोविंद की जीत खासा मतलब रखती है। यह पहली बार है कि उत्तर प्रदेश को यह गौरव मिल रहा है कि राष्ट्रपति सूबे का ही नागरिक हो सकता है।
ऐसे में यूपी में एक अलग तरह के समीकरण हैं। भाजपा ने पहले ही दो तिहाई मत मिलने का ऐलान कर दिया है। ऐसे में यह साफ है कि यूपी के मतों का बहुत महत्व है। वैसे भी इस साल फरवरी-मार्च में पांच राज्यों यूपी, गोवा, उत्तराखंड, पंजाब तथा मणिपुर में चुनाव हुए थे जहां राष्ट्रपति चुनाव के लिए कुल 1 लाख 3 हजार 756 मत हैं।
राष्ट्रपति के चुनाव में सांसदों के वोट का मूल्य निश्चित है मगर विधायकों के वोट का मूल्य अलग-अलग राज्यों की जनसंख्या पर निर्भर करता है। देश में सबसे अधिक जनसंख्या वाले राज्य यूपी के वोट का मूल्य सबसे अधिक है जबकि पूर्वोत्तर के वोट का मूल्य कम है।
वहीं भाजपा के पास एक मौका यह दिखाने का भी है कि चुनाव की जीत के बाद वह फ्लोर मैनेजमेंट में भी माहिर है। उत्तर प्रदेश में हिमालय जैसे बहुमत के बाद भी यह बातें लगातार सियासी गलियारों की हवा में तैर रही हैं कि बसपा, कांग्रेस और सपा के बहुत से विधायक भी सत्ताधारी भाजपा के नेताओं के संपर्क में हैं।
राष्ट्रपति चुनाव में किसी तरह की कोई व्हिप जारी नहीं हुई है। ऐसे में अपने समर्थक वोटों के अलावा क्रासवोटिंग कर जहां सरकार अपने मजबूत होने का प्रमाण दे सकती है, वहीं दलबदलू अपनी निष्ठा का भी प्रमाण दे सकते हैं।

सपा के लिए नेताजी ही मुसीबत
समाजवादी पार्टी की बात की जाय तो उसका भी बहुत कुछ दांव पर है। वह विपक्ष के साझा उम्मीदवार को लेकर वह सूत्रधार है। उसे ही 2019 के चुनाव में सूबे में भाजपा का मुख्य रूप से मुकाबला करना है।
यूपी में समाजवादी पार्टी और बसपा के बीच गठबंधन की जो तस्वीर बन रही है उसमें भी वह बिग ब्रदर की भूमिका चाहेगी। ऐसे में सपा की कोशिश होगी कि वह न सिर्फ अपने सारे वोट बचाए बल्कि भाजपा के पाले के कुछ ऐसे वोट पर उसकी नजर हो जो किसी न किसी वजह से पार्टी से खुश नहीं हैं।
पार्टी की सबसे बड़ी परेशानी खुद नेताजी भी साबित हो सकते हैं। दरअसल पार्टी के अध्यक्ष पद पर जिस तरह से खुद की ताजपोशी अखिलेश यादव ने की है उससे शिवपाल यादव और खुद नेताजी खुश नहीं बताए जा रहे हैं।
शिवपाल यादव जुलाई में धमाका करने की धमकी भी दे चुके हैं। शिवपाल के कभी सिपहसालार रहे दीपक मिश्रा ने खुलकर कोविंद का समर्थन करने का आह्वान किया है।

बसपा में विद्रोह की चिंगारी 
बसपा का बहुत कुछ इस चुनाव में दांव पर है। दरअसल दलित उम्मीदवार उतारकर भाजपा ने यूपी की दलित किलेबंदी में एक बड़ा दांव चल दिया। वैसे भी लोकसभा चुनाव और बाद में यूपी के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने दलित राजनीति के ढाईघर की चाल से बसपा को चित कर दिया है।
अब इस जीत को स्थायी बनाने का मौका बसपा नहीं देना चाहेगी। इसके अलावा मायावती पहले कोविंद का दलित के नाम पर समर्थन कर चुकी हैं। बाद में मीराकुमार का नाम आने पर वे उनके पाले में खड़ी हो गयीं।
ऐसे में उनकी ही पार्टी में यह चर्चा है कि अगर दलित का ही समर्थन करना है तो यूपी के दलित का समर्थन किया जाय जिससे पार्टी को 2019 में कुछ फायदा मिल सकता था।
वहीं मीराकुमार का संबंध बिहार से हैं जिनका समर्थन करने से यूपी के दलित समाज को कोई मैसेज नहीं दिया जा सकेगा। ऐसे में बसपा के अंदरखाने विद्रोह की चिंगारी पहले से ही है।