कैंसर एक्सप्रेस : इस ट्रेन में कैंसर रोगियों को है मुफ्त यात्रा की सुविधा

दुर्गेश पार्थसारथी
बठिंडा। भाई साहब, बीकानेर जाने वाली कैंसर एक्सप्रेस का टाइम क्या है, यह किस प्लेटफार्म से जाएगी? जी हां, बठिंडा रेल स्टेशन के पूछताछ कार्यालय में बैठे रेल कर्मी से कुछ इसी तरह के सवाल पूछते लोग दिख जाएंगे। पहली नजर में यह अटपटा तो जरूर लगता है, लेकिन यह हकीकत है। बठिंडा रेलवे स्टेशन पर पहुंचने वाले अधिकांश लोगों से कोई न कोई यह सवाल जरूर पूछ लेता है।

दरअसल फिरोजपुर रेलमंडल इस तरह की कोई ट्रेन नहीं चलाता। रोजाना बठिंडा से बीकानेर जाने वाली रेलगाड़ी को लोगों ने कैंसर एक्सप्रेस का नाम दे दिया है। इसके पीछे कारण यह है कि इस ट्रेन में कैंसर रोगियों की संख्या अधिक होती है जो पंजाब के पड़ोसी राज्य में बीकानेर के तुलसी रीजनल कैंसर ट्रीटमेंट सेंटर में उपचार कराने जाते हैं।

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पूछताछ काउंटर पर बैठे कर्मचारी भी अब कैंसर एक्सप्रेस के नाम के आदी हो गए हैं और बिना किसी लागलपेट के यात्रियों को बता देते हैं कि बठिंडा से बीकानेर जाने वाली कैंसर एक्सप्रेस रात के 9:25 पर फलां प्लेटफार्म से जाएगी। इसी से इस बात का आंदाजा लगाया जा सकता है कि पंजाब में कैंसर की स्थिति कितनी भयावह है। वह भी खासकर मालवा बेल्ट में।

कैसे कैंसरग्रस्त हुआ मालवा
पिछले दिनों पीजीआई चंडीगढ़ से जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक देशभर के 23 राज्यों से पीजीआई में उपचार कराने आने वाले कैंसर रोगियों में से अकेले सर्वाधिक 33.3 प्रतिशत रोगी पंजाब के थे। पंजाब को यदि भौगोलिक दृष्टि से बांटा जाए तो इसके तीन हिस्से बनते माझा, दोआबा और मालवा। सूबे के इसी मालवा में माझा व दोआबा के मुकाबले कैंसर रोगियों की संख्या 80 फीसद से अधिक है।

मालवा जोन में आने वाले जिलों बठिंडा, मानसा, फरीदकोट, फिरोजपुर, मोगा, संगरूर व बरनाला सहित आसपास के क्षेत्र आते हैं। पंजाब के अन्य हिस्सों के मुकाबले यहां की जमीन रेतीली है। यहां धान की खेती करना भूजलस्तर नीचे होने की वजह से काफी महंगी साबित होती है। अत: इन क्षेत्रों के किसानों ने धान की रवायती खेती छोडक़र कपास की खेती शुरू कर दी। कपास के फूलों को अमेरिकन बॉलवर्म नामक कीट से बचाने के लिए यहां के किसानों ने कीटनाशकों का प्रयोग शुरू कर दिया।

कीटनाशकों का प्रयोग यहीं तक सीमित नहीं रहा बल्कि अधिक पैदवार लेने के लिए रासायनिक खादों व कीटनाशकों का प्रयोग भी किसानों ने जरूरत से ज्यादा करना शुरू कर दिया। रासायनिक खादों के दम पर किसानों ने कपास सहित धान, गेहूं व सब्जियां उगानी शुरू कर दी। एक अनुमान के मुताबिक पंजाब में फसलों पर छिडक़ी जाने वाली कीटनाशक प्रति हेक्टेयर 900 से 1000 ग्राम है, जबकि अन्य देशों में इसका इस्तेमाल 300 से 450 ग्राम प्रति हेक्टेयर किया जाता है। किसान मानक से अधिक कीटनाशकों का प्रयोग करके पंजाब की फिजां में जहर घोल रहे हैं।

वैसे जानकारों के मुताबिक इसके पीछे दूसरा कारण भी हो सकता है। मसलन कपास का काटन बीज। काटन बीज तैयार करते वक्त इसके बीज में एक बैक्टीरिया मिला दिया जाता है जो कपास के पौधे में एक प्रोटीन पैदा करता है। इसको खाते ही अमेरिकन बॉलवर्म कीट की मौत हो जाती है। अब सवाल यह उठता है कि कपास के बीज से कैंसर का क्या मतलब।

इस संबंध में कुछ लोगों का मानना है कि जो बैक्टीरिया एक बीज के रूप में जमीन में बोया जाता है वह आगे चलकर जहर बनकर मिट़़टी में मिल जाता है और इसी का जहरीला तत्व कैंसर का कारक बनता है। यही नहीं कारखानों का जहरीला पानी भी कैंसर का कारक बनता है। मेहनतकश पंजाब के किसानों ने बेतहाशा रासायनिक खादों व कीटनाशकों के प्रयोग से फसल की उपज तो बढ़ाई,लेकिन इसके साथ ही माटी में जहर भी बो दिया, जिसे अब कैंसर के रूप में काटना पड़ रहा है।

बाबा फरीद यूनिवर्सिटी ने बताया पानी में यूरेनियम
करीब छह साल पहले बाबा फरीद यूनिवर्सिटी ने अपनी खोज में यह दावा किया था कि पंजाब के मालवा में कैंसर का मुख्य कारण पानी में यूरेनियम की मात्रा का अधिक होना है। यूनिवर्सिटी के खोजकर्ताओं ने इसके पीछे कीटनाशक व रासायनिक खादों का प्रयोग बताया है। हालत यह है मालवा के बठिंडा, मानसा, मोगा, फरीदकोट, फिरोजपुर, मुक्तसर, मलोट, संगरूर व बरनाला सहित अन्य क्षेत्रों में स्थिति भयावह है।

यहां का भूजल मनुष्य के पीने लायक नहीं है। इसके लिए प्रशासन की ओर से हर मोहल्ले में आरओ प्लांट लगाए गए हैं। यही नहीं वाटर सप्लाई के लिए नहरी पानी की व्यवस्था की गई है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) द्वारा संचालित आल इंडिया कोआर्डिनेटिड रिसर्च प्रोजेक्ट आन पेस्टीसाइड के अनुसार पंजाब में डीडीटी, एचसीएच और बीएचसी ने आहार शृंखला में घुसपैठ कर ली है।

यह फल, दूध, मक्खन, शिशु आहार, चावल, अन्य अनाज और सब्जियों तक में है। सर्वाधिक चिंता की बात तो यह है कि पंजाब की सब्जियों में इंडोसल्धान, क्पामिलफोस, क्लोरोपेरिफोस, मेलाथियोन, पेराथियोन और मोनोकोटोफास के अंश भी पाए गए हैं। फिर फलों में फासमोडोन और क्वानिलफोस भी हैं। वहीं दिल्ली की विख्यात पर्यावरण संस्था सेंटर फार साइंस एंड इन्वायरमेंट के अनुसंधान के अनुसार तलवंडी साबो क्षेत्र के लोगों के खून के नमूनों में मोनोकोटोफास, क्लोपेरिफास, फारमीडोन और मेलाथियोन के अंश घातक रूप में पाए गए।

खून के ज्यादातर नमूनों में 6 से 13 प्रकार के कीटनाशक मिले। यह कीटनाशक ओरगेनोक्लोरीन और ओरगेनोफासफेटस दोनों प्रकार की श्रेणी के थे। फिर पंजाब में मां के दूध में कीटनाशक पाए जाने की पहले ही पुष्टि हो चुकी है। यह पंजाब के स्वास्थ्य की एक भयानक तस्वीर प्रस्तुत करती है। यह कीटनाशक अनेक भयानक रोगों का कारण बन रहे हैं। एक आंकड़े के मुताबिक पिछले तीन सालों में अकले बठिंडा में कैंसर से मरने वालों की संख्या एक हजार से अधिक थी।

इसलिए नाम पड़ा कैंसर एक्सप्रेस
रोजाना रात को बठिंडा से 9:25 बजे चलकर बीकानेर जाने वाली इस रेलगाड़ी में ज्यादातर कैंसर रोगी उपचार के लिए बीकानेर जाते हैं। ट्रेन में कैंसर रोगियों को मुफ्त यात्रा की सुविधा है। मरीज के साथ एक व्यक्ति को किराये में 75 प्रतिशत की छूट भी मिलती है। अनुमान के मुताबिक इस ट्रेन में रोज 200 से ज्यादा कैंसर मरीज बीकानेर स्थित आचार्य तुलसी रीजनल कैंसर ट्रीटमेंट और रिसर्च सेंटर में इलाज के लिए जाते हैं।

यह ट्रेन 326 किलोमीटर का सफर तय करते हुए करीब 20 छोटे-बड़े स्टेशनों से गुजरती हुई कैंसर रोगियों को लेकर राजस्थान के बीकानेर पहुंचती है। बताया जाता है कि आचार्य तुलसी रीजनल कैंसर संस्थान में हर तरह के कैंसर का इलाज होता है। यह देश के चुनिंदा कैंसर अस्पालों में से एक है। इजाल के लिए बीकानेर जाने वाले कैंसर रोगियों का कहना है कि इस अस्पताल में कैंसर का इलाज अन्य अस्पतालों से सस्ता है।

यहां दवाएं भी कम दाम पर उपलब्ध हैं। यहीं नहीं यहां मरीजों व उनके तीमारदारों के लिए अस्पताल की कैंटीन में बहुत ही कम पैसे में अच्छा खाना मिलता है। इसके अलावा यहां बनी धर्मशाला में मरीजों के तीमारदारों के लिए 50 रुपये में कमरा मिल जाता है। इसके अलावा पंजाब सरकार के कैंसर राहत कोष योजना के तहत यह अस्पताल पंजीकृत है। कैंसर रोगियों के लिए राज्य सरकार की ओर से एक लाख रुपये की सहायता व बस में मुफ्त सफर की सुविधा भी उपलब्ध करवाई जाती है।

पंजाब के कैंसर ग्रस्त मालवा क्षेत्र के बीकानेर से नजदीक होने के कारण भी कैंसर रोगी बठिंडा-बीकानेर एक्सप्रेस पकडऩे बठिंडा आते हैं। इस ट्रेन में कैंसर रोगी यात्रियों की संख्या अधिक होने के कारण इसका नाम कैंसर एक्सप्रेस पड़ गया। अन्य प्रदेशों या पंजाब के माझा या दोआबा से पहली बार बठिंडा रेलवे स्टेशन पर पहुंचे यात्रियों को यह नाम सुनकर हैरानी जरूर होती है,लेकिन वे भी कैंसर रोगियों के साथ बीकानेर तक का सफर कर इस ट्रेन के मूल नाम बठिंडा-बीकानेर एक्सप्रेस को भूल इसे कैंसर ट्रेन ही कहने लगते हैं।