UP सरकार को झटका, VC निशीथ राय के खिलाफ जांच बिठाने का आदेश HC ने किया रद्द

Published by aman Published: November 16, 2017 | 8:13 pm

लखनऊ: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुर्नवास विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. निशीथ राय को गुरुवार (16 नवंबर) को बड़ी राहत दी। कोर्ट ने उनके खिलाफ जांच बिठाने एवं जांच के दौरान उन्हें कामकाज से अलग रखने संबंधी आदेशों को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने कहा, कि विस्तृत आदेश शीघ्र ही जारी किया जाएगा।

जस्टिस विक्रम नाथ एवं जस्टिस अब्दुल मोईन की डिवीजन बेंच ने इसी साल 16 अगस्त को डॉ. राय के खिलाफ पारित आदेशों के खिलाफ उनकी ओर से दायर याचिका को मंजूर करते हुए यह आदेश पारित किया। मामले की सुनवायी पिछले तीन महीने में 28 तारीखों पर हुई।

सरकार की नाक का सवाल बना है ये केस
राज्य सरकार की ओर महाधिवक्ता राघवेंद्र सिंह व उनके सहयोगी सरकारी अधिवक्ताओं अभिनव एन त्रिवेदी व रणविजय सिंह ने अपना पक्ष रखा तो वहीं डॉ. राय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एलपी मिश्रा, गौरव मेहरोत्रा व अभिनव सिंह ने जोरदार तरीके से उनका पक्ष रखा। सरकार की नाक का सवाल बने इस केस मेें महाधिवक्ता के तर्कों से बेंच सहमत नहीं हुई। कोर्ट ने महाधिवक्ता को पिछली तारीख पर सुझाया था कि डॉ. राय के खिलाफ पारित आदेशों को रद्द कर मामले को कुछ शर्तो के साथ रिमांड कर दिया जाए, परंतु महाधिवक्ता ने मेरिट पर पूरा फैसला सुनाने की बात बेंच के सामने रखी। जिसके बाद कोर्ट ने आदेश दिया कि याचिका को मंजूर किया जाता है और विस्तृत आदेश चार पांच दिन में जारी कर दिया जाएगा।

ये है मामला
डॉ. शकुंतला मिश्रा विश्वविद्यालय की जनरल काउसिंल जिसका चेयरपर्सन मुख्यमंत्री स्वयं होता है, ने गत 16 अगस्त को आदेश पारित करके डॉ. निशिथ राय के खिलाफ जांच बिठा दी थी। डॉ. राय के खिलाफ कई आरोप लगाए गए थे, जिनमें प्रमुख आरोप था कि उन्होंने नियुक्तियों में अनियमितता बरती थी। जिसके जवाब में डॉ. राय की अेार से कहा गया, कि राज्यपाल जो कि विश्वविद्यालय का विजिटर होता है उसने ऐसी अनियमितताओं के शिकायत की जांच की थी और पाया था कि आरोप निराधार हैं। तो, ऐसे में सरकार की ओर से बिना किसी अधिकार के फिर से जांच बिठाने का कोई औचित्य नहीं है।

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सीएम को रखा अंधेरे में
डॉ. राय की ओर से तर्क दिया गया कि पूरी कार्यवाही सीएम योगी आदित्यनाथ को अंधेरे में रखकर बिना सारे तथ्य उनकी संज्ञान में लाए विकलांग कल्याण मंत्री ओमप्रकाश राजभर के दबाव में विभाग के प्रमुख सचिव महेश कुमार गुप्ता के कहने पर की गई, जो बिल्कुल मनमानी व गैरकानूनी है। कहा गया, कि गवर्निंग कॉउंसिल की अर्जेंट मीटिंग के जरिए सारी कार्यवाही गैरकानूनी तरीके से संपादित की गयी।

योगी के मंत्री पर लगाया आरोप
डॉ. राय की ओर से प्रमुख सचिव महेश कुमार गुप्ता पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने ही प्रारम्भिक जांच की और मुख्यमंत्री के सामने पत्रावली बढ़ायी। इसके बाद उन्होंने भी कॉउंसिल की सर्कुलेशन से बैठक करायी, जिसके बाद वह स्वयं विश्वविद्यालय के अंतरिम कुलपति बन बैठे। डॉ. राय की ओर से तर्क दिया गया, कि सारी कवायद इसलिए की गयी क्येांकि 26 जून 2017 को विश्वविद्यालय ने करीब दौ सौ भर्तियां निकाली, जिनकी नियुक्ति प्रकिया प्रारंभ होते ही विश्वविद्यालय के पीठ पीछे सारी कवायद शुरू कर दी गयी। ताकि, बतौर अंतरिम कुलपति सारी शक्ति अपने हाथ में लेकर मंत्री राजभर के कहे अनुसार मनचाहे तरीके से भर्तियां की जायें।

‘रिकार्ड देखकर ही बहस सुन ली जाए’
सुनवायी के दौरान राज्य सरकार की ओर से संक्षिप्त प्रति शपथपत्र दाखिल किया गया। कोर्ट के कहने पर भी विस्तृत प्रति शपथपत्र दाखिल करने से महाधिवक्ता ने इंकार कर दिया। उन्होंने कोर्ट से कहा, कि वह रिकार्ड कोर्ट में पेश कर रहें है और रिकार्ड देखकर ही बहस सुन ली जाए।

बिना मस्तिष्क का प्रयोग किए लिया फैसला
रिकार्ड देखकर कोर्ट ने पाया, कि गवर्निंग कॉउंसिल की अर्जेंट बैठक बुलाने का कोई कारण नहीं दर्शाया गया था और न ही कॉउंसिल के 22 सदस्यों को प्रारम्भिक जांच रिपोर्ट ही प्रेषित की गई थी। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि जब कॉउंसिल के सदस्यों के सामने पूरी जांच रिपोर्ट थी ही नहीं, तो वह किस प्रकार मान बैठै कि डॉ. राय के खिलाफ आगे जांच का आधार है। कोर्ट ने डॉ. राय के वकीलों के इस तर्क में बल पाया कि 22 में से मौजूदा समय में कॉउंसिल में केवल 15 सदस्य हैं, जिनमें से अधिकतर सरकारी पदों पर बैठे लोग हैं। ऐेसे में बिना डॉ. राय के खिलाफ जांच आगे बढ़ाने का जो निर्णय कॉउंसिल ने लिया है वह बिना मस्तिष्क का प्रयोग किए लिया गया है।