संविधान को आम लोगों के जीवन से जोड़कर अर्थपूर्ण बनाएं : कोविंद

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने रविवार को कहा कि संविधान एक ‘अमूर्त विचार’ नहीं है और इसे सामान्य लोगों के लिए दैनिक जीवन और जरूरतों के साथ जोड़कर अर्थपूर्ण बनाना चाहिए।

नई दिल्ली : राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने रविवार को कहा कि संविधान एक ‘अमूर्त विचार’ नहीं है और इसे सामान्य लोगों के लिए दैनिक जीवन और जरूरतों के साथ जोड़कर अर्थपूर्ण बनाना चाहिए। संविधान दिवस के मौके पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम के अपने उद्घाटन संबोधन में राष्ट्रपति ने कहा, “संविधान लोगों को जितना सशक्त बनाता है, उतना ही लोग भी संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखकर संविधान को सशक्त बनाते हैं।”

कोविंद ने कहा कि कार्यकारिणी, विधायिका और न्यायपालिका को एक-दूसरे के कार्यक्षेत्रों का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने कहा कि संविधान का दिल ‘विश्वास’ है, विश्वास एक-दूसरे पर। यह ऐसा विश्वास है जो संविधान में निहित है। राष्ट्रपति ने इस अवसर पर दो पुस्तकों ‘संविधान एट 67’ और ‘भारतीय न्यायपालिका-वार्षिक रिपोर्ट, 2016-2017’ का विमोचन किया।

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भारत के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय संवैधानिक संप्रभुता और एकमात्र धर्म में विश्वास करता है, जिसका पालन हम सभी को करना चाहिए, वह है ‘संवैधानिक धर्म’।

उन्होंने कहा, “हमें संवैधानिक संप्रभुता को स्वीकार करना चाहिए और हमें इसके आगे समर्पण करना होगा।” उन्होंने कहा, “नागरिक अधिकार सबसे पहले होने चाहिए, मौलिक अधिकारों से कोई समझौता नहीं किया जा सकता है।”

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि कोई मौलिक अधिकार असीम नहीं है, लेकिन इसमें किसी तरह की रुकावट से पहले जांच की जानी चाहिए। केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि जनहित याचिका शासन के लिए एक विकल्प नहीं बननी चाहिए। शासन का हक लोगों के साथ रहनी चाहिए, जिन्हें शासन के लिए चुना गया है।

न्यायपालिका की सक्रियता पर उन्होंने कहा कि संविधान के संस्थापक ने जनता द्वारा चुने गए लोगों को कानून बनाने और नीतियों को तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी है, जिसे उन्हीं पर छोड़ा जाना चाहिए।

अपने संविधान दिवस व्याख्यान में, भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर.सी. लाहोटी ने कहा कि न्यायपालिका को आत्मसंयम बनाए रखना चाहिए और विधायिका और कार्यपालिका के क्षेत्र में अतिक्रमण से बचना चाहिए।

उन्होंने कहा, “न्यायाधीशों को खुद को सुपर विधायिका या सुपर कार्यपालिका नहीं समझना चाहिए।” पूर्व प्रधान न्यायाधीश ने कहा, “तीन अंगों के बीच तनाव ‘अपरिहार्य’ है और इसका ‘स्वागत’ है। बिना अनुशासन के लोकतंत्र भविष्यहीन है।”

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अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने जनहित याचिका को ‘वरदान’ के रूप में वर्णित किया, जिसने अब जीवन के हर क्षेत्र तक अपनी पहुंच बनाई है। वेणुगोपाल ने सामूहिक प्रयास पर जोर देते हुए कहा कि निर्णय देना एक बात है लेकिन इसे लागू करना और परिणाम हासिल करना एक अलग बात है।

उन्होंने यह भी कहा कि शीर्ष न्यायालय उन शक्तियों को लागू करने के लिए अनुच्छेद 142 का सहारा नहीं ले सकता जिसके लिए संविधान में विचार नहीं किया गया है।

–आईएएनएस