शौरी जीः काजल की कोठरी में कैसे हू सयानो जाय…

पर यह बताइये कि पाँच सितारा होटल की ज़मीन 45 रूपये वर्ग फ़ीट बेची ख़रीदी जा रही हो तो किसी पत्रकार के लिए कितनी बड़ी खबर हो सकती है। लेकिन वहीं पत्रकार जब नेता हो जाता है तो उसे यह नज़र नहीं आता? वह ईमानदार हैं। पर सिस्टम के चंगुल की बेईमानी रोकने में उनकी ईमानदारी काम नहीं आ पायी।

arun shourie

अरुण शौरी पर 18 साल बाद मुकदमे का आदेश

योगेश मिश्र

कभी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ने वाले वीर योद्धा को कोई जाँच एजेंसी चौथेपन में भ्रष्टाचार के आरोप में फँसाती दिखे तो बेलाग लपेट के यह कहा जाना चाहिए कि यह साज़िश है। वह भी वीर योद्धा पत्रकार रहा हो। नामचीन पत्रकार रहा हो। पत्रकारों का रोल मॉडल रहा हो। जो खुद यह मानता हो कि उसने दो प्रधानमंत्री बनाये। दोनों प्रधानमंत्री बनाने में उनसे गलती हो गयी। यह भी पश्चात जग ज़ाहिर उनने खुद किया हो।

दो गलतियां स्वीकारीं

अक्टूबर,2017 में ख़ुशवंत सिंह साहित्य समारोह में शौरी ने कहा-वी पी सिंह की सरकार को समर्थन देना मेरी पहली गलती थी। नरेंद्र मोदी की सरकार को समर्थन देना दूसरी गलती। यही नहीं, वह वीर योद्धा 1982 में मैगसेसेय पुरस्कार पाया हो। 1990 में पद्म भूषण से अलंकृत हुआ हो। राजनीतिक दल ज्वाइन कर राज्य सभा पहुँच गया हो। मंत्री भी रहा हो।

आप समझ रहे होंगे कि बात किसकी की जानी है। नहीं समझे तो लीजिये बात, अरूण शौरी जी की है। अठारह साल बाद इन पर उदयपुर के फ़तेहपुर सागर झील के किनारे एक पहाड़ की चोटी पर बने पाँच सितारा लक्ष्मी विलास पैलेस को निजी हाथों में देने के मामले में 120 बी और 420 के तहत मुक़दमा लिखने का आदेश दिया गया है।

क्या है मामला

यह डील साल 2002 में इंडियन टूरिज़्म डेवलपमेंट कारपोरेशन के होटल से संबंधित है। इस होटल के पास २९ एकड़ ज़मीन थी। सरकार ने मात्र 7.52 करोड़ रुपये में इसे भारत होटल्स लिमिटेड को बेचा था। हालाँकि इसके मूल्य को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट में भी चुनौती दी गयी थी, कोर्ट ने आरोप को बेबुनियाद बताया।

सीबीआई ने यह कहते हुए 13 अगस्त,2019 को तीसरी क्लोज़र रिपोर्ट फाइल की थी कि अभियुक्त के ख़िलाफ़ अभियोग लगाने के पर्याप्त सुबूत नहीं है। पर सीबीआई के जज पूरन कुमार शर्मा ने दोबारा जाँच के आदेश दे दिये। क्योंकि इस मामले में 15 सितंबर, 2020 को हुई सुनवाई में सीबीआई ने यह कहा कि होटल की संपत्ति असल में 252 करोड़ रुपये की है।

मेसर्स कांति करमसी एंड कंपनी ने होटल की संपत्ति का मूल्यांकन 45 रुपये प्रति वर्ग फुट की दर से किया था। इस बारे में जज ने कहा कि ‘होटल का एक चम्मच भी इससे महंगा होगा।’ कोर्ट ने होटल को राज्य सरकार को सौंपने का आदेश भी दिया।

ज़मीन की क़ीमत 151 करोड़ रुपये आंकी गयी है। यह सही है कि अगस्त, 2014 को दर्ज प्राथमिकी में अरुण शौरी का नाम नहीं था।

प्रदीप बैजल का दावा

विनिवेश महकमे के सचिव प्रदीप बैजल ने अपनी किताब “द कंप्लीट स्टोरी ऑफ इंडियन रिफार्म्स : टू जी, पावर एंड प्राइवेट इंटर प्राइज्” में दावा किया है कि सीबीआई चाहती थी कि वह अरूण शौरी व रतन टाटा के ख़िलाफ़ बयान दें।

शौरी 1998 में भाजपा में शामिल हुए। राज्यसभा सदस्य बने। विनिवेश मंत्री बने। विनिवेश के माध्यम से 5114 करोड़ रुपये की आमदनी अटल सरकार की करायी।

अरुण शौरी का कहना है कि सीबीआई इस मामले को पहले ही बंद कर चुकी है क्योंकि उन्हें कोई सबूत नहीं मिले। एफ़आईआर में मेरा नाम भी नहीं था।होटल की कीमत का हिसाब करने वालों का चयन सरकार द्वारा अप्रूव्ड लिस्ट से किया गया था। होटल के विनिवेश के फ़ैसले के बारह साल बाद एक अनाम व्यक्ति की मौखिक शिकायत के आधार पर सीबीआई ने ये जांच करने का फ़ैसला किया है।

2002 में हिंदुस्तान जिंक का निजीकरण हुआ जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने मामला खारिज कर दिया। लेकिन लक्ष्मी विलास होटल के संदर्भ में भी वही पैटर्न था। ये होटल 2002 में बेचा गया था।

जांच पर सवाल

जब अधिकारी मेरे पास आए तो मैंने उनसे पूछा कि किस आधार पर जांच शुरू की गई है।

उन्होंने बताया कि उनके पास कुछ भी लिखित रूप में नहीं है, ये मौखिक शिकायत के आधार पर था। उस समय विनिवेश पर बनी कैबिनेट समिति में अरुण जेटली शामिल थे, जो उस वक्त क़ानून मंत्री थे और उनके मंत्रालय ने तीन बार फाइल क्लीयर की थी। मंत्री के तौर पर मैं पूरी प्रक्रिया का गवाह रहा था। मुझे इस बात पर कोई शक नहीं कि विनिवेश के दौरान जो लेनदेन हुआ वो पूरी तरह प्रक्रिया के तहत हुआ था।

सोशल मीडिया पर सनसनी होना लाज़िमी था। कहा गया प्रतिशोध की भावना से किया जा रहा है। मैं भी अरूण शौरी जी की ईमानदारी पर सवाल नहीं उठा रहा। शायद देश में कोई न उठा पाये। जो उठायेगा वह ज़रूर प्रतिशोध की आग में जल रहा होगा।

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सरकार यह सब इसलिए कर रही है क्योंकि नोट बंदी को पैसों की सबसे बड़ी धांधली उन्होंने कहा था। इसे काला पैसा सफ़ेद करने का सबसे बड़ा अवसर कहा था। उन्होंने मोदी सरकार में अल्पसंख्यक तनाव में हैं, यह बयान भी दिया। राफ़ेल डील में मुक़दमा करने वालों में एक शौरी भी थे। सीबीआई से शिकायत भी की थी।

पर यह बताइये कि पाँच सितारा होटल की ज़मीन 45 रूपये वर्ग फ़ीट बेची ख़रीदी जा रही हो तो किसी पत्रकार के लिए कितनी बड़ी खबर हो सकती है। लेकिन वहीं पत्रकार जब नेता हो जाता है तो उसे यह नज़र नहीं आता? वह ईमानदार हैं। पर सिस्टम के चंगुल की बेईमानी रोकने में उनकी ईमानदारी काम नहीं आ पायी।

अरुण शौरी क्या कहते हैं

किसी पत्रकार मीडिया हाउस को सरकार बनाना गिराना क्यों चाहिए? फिर पछताना क्यों चाहिए? उसकी खबर से सरकार गिर जाये उसकी बला से।
समय व प्रसंग धीरूभाई अंबानी लेक्चर में अरुण शौरी को सुनने का है- ‘मुझे उनके (धीरुभाई अम्बानी के) बारे में पहली बार मेरे सहकर्मी एस गुरुमूर्ति के लेखों के जरिये पता चला।

अधिकांश लेखों का कहना यह था कि रिलायंस को जिस मात्रा का लाइसेंस मिला उसने उससे कहीं ज्यादा कुछ कर लिया है। वह उस क्षमता से ज्यादा प्रोडक्शन कर रहा है। ज्यादातर लोग कहेंगे कि पहली बात तो यह है कि वे बंदिशें और शर्तें होनें ही नहीं चाहिए थीं।

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यह भी लोग कहेंगे कि यही चीजें देश को पीछे किये हुए हैं। और यह कि धीरुभाई को एक बार नहीं, दो बार धन्यवाद देना चाहिए कि उन्होंने उन नियमों के बावजूद विश्वस्तरीय कम्पनियाँ और कारखाने स्थापित किये। और ग्रोथ की नींव रखी जिसके लिए आज हम सब क्रेडिट लेते हैं।

दूसरी बात यह कि सीमाओं की उन बंदिशों को लांघने से उन बंदिशों को खत्म करने की शुरुआत हो गयी। उससे सुधारों के पक्ष में माहौल बनने में मदद मिली।

धीरू भाई का फोन आना

जब रिलायंस ने इंडियन पेट्रोकेमिकल्स कारपोरेशन लिमिटेड (आईपीसीएल) की विनिवेश प्रक्रिया की बोली जीत ली तो उसके शेयर का दाम 100 या 200 रुपये था। धीरुभाई ने 231 रूपये प्रति शेयर की बोली लगाई। उनकी बोली निकटतम प्रतिद्वंद्वी इंडियन आयल से करीब करीब दोगुना ज्यादा थी। जैसा कि देश सरकार और समय बताएगा, देश को जबरदस्त तात्कालिक लाभ हुआ।

रिलायंस को बाहर रखने के लिए बहुत दबाव था। सरकार में यह मत था कि बोली में क्वालिफिकेशन और डिसक्वालिफिकेशन के दिशा निर्देश तय हो चुके हैं। यदि रिलायंस दिशानिर्देशों का पालन नहीं करती है तो चाहे जो हो, उसे डिसक्वालीफाई कर दिया जाना चाहिए।

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अगर वो दिशा निर्देशों का पालन करती है तो चाहे जो हो उसे बोली लगाने देना चाहिए। लेकिन यह याद रखना चाहिए कि अगर कोई चीज सिंपल है तो उसका यह मतलब नहीं कि वो आसान होगी. दबाव इतने ज्यादा थे कि न सिर्फ ये लेनदेन बल्कि विनिवेश का पूरा प्रोग्राम रुक गया।

आईपीसीएल विनिवेश प्रक्रिया के दौरान धीरुभाई मुझसे तो नहीं मिले लेकिन उनको पता था कि कहाँ क्या चल रहा है ? क्योंकि उनके सूत्र ऐसी ऐसी जगहों पर थे जिनके बारे मुझे एक पत्रकार होने के नाते भी नहीं पता था। जब रिलायंस ने आईपीसीएल की बोली जीत ली तो धीरुभाई ने मुझे फोन किया। उनकी आवाज भावनाओं से भरी हुई थी। मुझे नहीं पता था कि ये प्रतिस्पर्धा उनके लिए इतनी महत्वपूर्ण थी। मैं तो सिर्फ सरकार की नीतियों को क्रियान्वित कर रहा था।

( लेखक न्यूज़ ट्रैक/अपना भारत के संपादक हैं )

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