संविधान पर गर्व लेकिन, जरूरी है इन सवालों के जवाब जानना भी

एक ऐसे समय जब हम सारे लोग संविधान को लेकर गौरव से फूले नहीं समा रहे हैं। ऐसे में तमाम उन सवालों का उठना लाजमी हो जाता है जिनके उत्तर कि अपेक्षा में हमारे तमाम नागरिक वर्षों से खड़े हैं। जिन सवालों का जवाब संविधान सभा के सदस्यों ने भी पूरी बहस में कहीं नहीं दिया है।

योगेश मिश्र

लखनऊ: हर देश के बाशिंदों को अपने संविधान पर गर्व होना चाहिए। हमें भी है। संविधान वह शक्ति है जिससे कोई भी लोकतांत्रिक देश संचालित होता है। बहुत सालों बाद हम लोगों ने भी जिस दिन संविधान को अंगीकृत किया था उस दिन को उत्सव की तरह इस साल मनाया है। देश की कई विधानसभाओं और संसद में भी संविधान को अंगीकृत करने वाले दिन विशेष चर्चा और सत्र हुए।

एक ऐसे समय जब हम सारे लोग संविधान को लेकर गौरव से फूले नहीं समा रहे हैं। ऐसे में तमाम उन सवालों का उठना लाजमी हो जाता है जिनके उत्तर कि अपेक्षा में हमारे तमाम नागरिक वर्षों से खड़े हैं। जिन सवालों का जवाब संविधान सभा के सदस्यों ने भी पूरी बहस में कहीं नहीं दिया है।

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न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक समीक्षा अमेरिकी संविधान से प्रेरित

सवाल यह है कि आखिर जिस ‘गवर्मेंट ऑफ इंडिया एक्ट-1935’ को गुलामी का चार्टर कहा गया था। उसी से 250 अनुछेद हू-ब-हू या थोड़े बहुत शाब्दिक बदलाव के साथ संविधान के 395 अनुच्छेदों में जोड़ लिये गये। संविधान की प्रस्तावना अमेरिका से ली गई। हमारे संविधान की शुरूआत होती है-हम भारत के लोग…। अमेरिकी संविधान की शुरूआत भी ऐसी ही है- हम संयुक्त राज्य के लोग…। मूलभूत अधिकार, न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक समीक्षा अमेरिकी संविधान से प्रेरित है।

दो वर्ष 11 माह 18 दिन के कालखंड में 114 बैठकें

नीति निर्धारक सिद्धांत आयरलैंड से लिये गये हैं। केंद्रीयकृत संघात्मक ढांचा कनाडा की देन है। समवर्ती सूची की अवधारणा आस्ट्रेलिया से ली गई है। जबकि संसदीय प्रणाली एवं विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के बीच कार्य विभाजन ब्रिटेन से लिया गया है। यह सब तब है जब कि 296 सदस्यों ने दो वर्ष 11 माह 18 दिन के कालखंड में 114 बैठकें करके संविधान तैयार किया। बैठकों की शुरूआत 27 अक्टूबर, 1946 से हुई। जो 13 फरवरी, 1948 तक जारी रही। संविधान सभा में 96 सदस्य सामंती रियासतों के राजाओं और नवाबों द्वारा मनोनीत थे।

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डॉ.भीमराव अम्बेडकर प्रारूप समिति के अध्यक्ष रहे

भारत के पहले राष्ट्रपति हुए डॉ. राजेन्द्र प्रसाद संविधान सभा के स्थाई अध्यक्ष बने। सच्चिदानंद सिन्हा अस्थाई अध्यक्ष थे। श्री सिन्हा का योगदान बिहार को बंगाल से अलग कराने में प्रमुख रहा। वह पत्रकार, शिक्षाविद, सांसद, अधिवक्ता थे। जबकि डॉ.भीमराव अम्बेडकर प्रारूप समिति के अध्यक्ष रहे। शुरूआती दौर की संविधान सभा में डॉ. अम्बेडकर नामित ही नहीं हो पाये थे। बाद में देवेन्द्र मंडल ने डॉ. अम्बेडकर को पश्चिम बंगाल के इलाके से जितवाकर संविधान सभा में भेजा। लेकिन जिस इलाके से वह जीतकर आये थे, वह हिन्दू बाहुल्य तो था, पर बंटवारे में पाकिस्तान के हिस्से में चला गया।

डॉ. अम्बेडकर को पाकिस्तान की संविधान सभा का सदस्य होना गंवारा नहीं था।  नतीजतन, उन्होंने इस्तीफा दे दिया। कहा तो यह भी जाता है कि डॉ.अम्बेडकर ने खुद को संविधान सभा में न रखे जाने पर नाराजगी जताते हुए यहां तक कहा था कि वे संविधान को स्वीकार नहीं करेंगे। आंदोलन चलायेंगे। इसे मुद्दा बनायेंगे। बाद में महाराष्ट्र से संविधान सभा के सदस्य बने एम.आर. जयकर के इस्तीफे से खाली हुई जगह पर डॉ.अम्बेडकर को भेजा गया।

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सर बी.एन. राव एवं एस.एन. मुखर्जी ने संविधान का प्रारूप पहले से किया था तैयार

संविधान निर्माण के लिए गठित प्रारूप कमेटी ने 27 अक्टूबर, 1946 से काम शुरू कर दिया था। इंडियन सिविल सर्विसेज के दो नौकरशाहों सर बी.एन. राव एवं एस.एन. मुखर्जी ने संविधान का प्रारूप पहले से तैयार कर रखा था। इस सच्चाई को डॉ.अम्बेडकर ने भी प्रारूप कमेटी के अध्यक्ष की हैसियत से 25 नवम्बर, 1947 में दिये भाषण में स्वीकार किया है। संविधान सभा में अनुसूचित वर्ग के 30 से ज्यादा सदस्य थे।

मूलप्रति को प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने लिखा

हमारा संविधान न तो टाइप हुआ है और न ही इसकी प्रिटिंग हुई। इसे कैलिग्राफ किया गया है। हिन्दी, अंग्रेजी दोनों भाषाओं में मूलप्रति को प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने लिखा है। इनका खानदानी पेशा कैलिग्राफी का था। इसे हाथ से लिखने के लिए रायजादा ने 254 पेन होल्डर निब का इस्तेमाल किया। उन्हें संविधान को हाथ से लिखने में छह महीने लगे। संविधान को चित्रों से आचार्य नंदलाल बोस से सजाया है। जबकि प्रस्तावना के पृष्ठ को सजाने का काम राम मनोहर सिन्हा ने किया है।

संविधान की मूल प्रति संसद लाईब्रेरी में हिलियम से भरे केस में रखी गयी है। संविधान में अब तक १०१ संशोधन हो चुके हैं। आखिरी संविधान संशोधन जीएसटी विधेयक का था। एक ऐसे दिन जब महाराष्ट्र में सत्ता सरकार, अदालत सबके सब संविधान की कसौटी पर थे। तब जो हुआ उसे संविधान की विजय कहा जाना चाहिए।

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अटल बिहारी वाजपेयी संविधान समीक्षा आयोग का किया था गठन

अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधानमंत्री थे। तो उन्होंने संविधान समीक्षा आयोग का गठन किया था। जिसने कई सालों तक काम भी किया। लेकिन यह नहीं पता चल पाया कि इस आयोग ने संविधान के किन अंशों को कितना तब्दील करने या नये अंश जोडऩे के लिए क्या कुछ कहा था। इस आयोग की रिपोर्ट न जाने कहां नेपथ्य में खो गई।

एक ऐसे समय जब हम संविधान पर इतरा रहे हैं। तब यह अनिवार्य हो जाता है कि हम इसकी जांच-पड़ताल करें कि आखिर यह रिपोर्ट है कहां। इसमें दिये गये सुझाव हमारे लिए कितने मुफीद हैं। इनको लागू करके हम अपने संविधान को और कितना मजबूत बना सकते हैं। संविधान संप्रभुता का एहसास कराता है। ऐसे में यह कार्य और अनिवार्य हो जाता है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं