जब भूमिगत होना पड़ा दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिन्दुस्तान हमारा है… के गीतकार को

गीत के बोल ब्रिटानिया हुकूमत के कानों तक भी पहुंचे और कुछ चापलूसों ने जब हुक्मरान को गीत का अर्थ बताया तो हुकूमत की त्योरी चढ़ गई। तत्काल गीतकार की गिरफ्तारी के आदेश हो गए। और इस रचनाकार को भूमिगत होना पड़ा। ये रचनाकार और कोई नहीं कवि प्रदीप थे।

रामकृष्ण वाजपेयी

लखनऊ: बात 1943 की है। उस साल एक फिल्म रिलीज हुई थी किस्मत जिसने अपनी गोल्डेन जुबली मनाई थी। इस फिल्म में एक गीत था दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिन्दुस्तान हमारा है… फिल्म आयी और यह गीत सुपरहिट हुआ। उस समय देश आजाद नहीं हुआ था गीत के बोल ब्रिटानिया हुकूमत के कानों तक भी पहुंचे और कुछ चापलूसों ने जब हुक्मरान को गीत का अर्थ बताया तो हुकूमत की त्योरी चढ़ गई। तत्काल गीतकार की गिरफ्तारी के आदेश हो गए। और इस रचनाकार को भूमिगत होना पड़ा। ये रचनाकार और कोई नहीं कवि प्रदीप थे। जिनका पूरा नाम रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी था।

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गीत सुनकर जवाहरलाल नेहरू के आंख भर आई

देश भक्ति के गीतों के इस रचनाकार ने ही बाद में ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बनी जैसे कालजयी गीत की रचना की। इस गीत को कवि प्रदीप ने 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान शहीद हुए सैनिकों की श्रद्धांजलि में लिखा था।

लता मंगेशकर द्वारा गाए इस गीत का तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की उपस्थिति में 26 जनवरी 1963 को दिल्ली के रामलीला मैदान में सीधा प्रसारण किया गया। गीत सुनकर जवाहरलाल नेहरू के आंख भर आई। लेकिन कवि की उदारता देखिये कवि प्रदीप ने इस गीत का राजस्व युद्ध विधवा कोष में जमा करने की अपील की।

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इसी तरह 1943 में ‘क़िस्मत’ फिल्म का ये गीत बहुत प्रसिद्ध हुआ –

‘आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है।
दूर हटो… दूर हटो ऐ दुनियावालों हिंदोस्तान हमारा है॥’

कवि प्रदीप का जन्म 6 फरवरी 1915 को मध्यप्रदेश के छोटे से शहर बडनगर (उज्जैन) में एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। इनका वास्तविक नाम रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी था। प्रदीप को बचपन से ही हिन्दी कविता लिखने में रूचि थी।
कवि प्रदीप का लखनऊ से भी नाता था। उन्होंने 1939 में लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक तक की पढ़ाई करने के बाद शिक्षक बनने का प्रयास किया लेकिन कामयाबी नहीं मिली क्योंकि किस्मत ने तो कुछ और सोच रखा था।

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कवि प्रदीप जितना अच्छा लिखते थे गायक भी उतने ही कमाल के थे

इसी समय प्रदीप को मुंबई में हो रहे एक कवि सम्मेलन का निमंत्रण मिला। इस छोटी सी कवि गोष्ठी ने प्रदीप को सिनेजगत का गीतकार बना दिया। उनकी पहली फिल्म कंगन हिट रही। उनके द्वारा बंधन फिल्म में रचित गीत, ‘चल चल रे नौजवान चलो संग चले हम, राष्ट्रीय गीत बन गया। इस गीत ने आजादी के दीवानों में एक नया जोश भर दिया था।

सिंध और पंजाब की विधानसभा ने इस गीत को राष्ट्रीय गीत की मान्यता दी और ये गीत वहां की विधानसभा में गाया जाने लगा बहुत कम लोगों को यह जानकारी होगी कि कवि प्रदीप जितना अच्छा लिखते थे गायक भी उतने ही कमाल के थे। फ़िल्म ‘जागृति’ के मशहूर गीत ‘आओ बच्चों तुम्हे दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की’ गीत के गायक भी कवि प्रदीप ही थे।

चल अकेला चल अकेला चल अकेला..

आज भी जब हम इन गानों ‘दे दी हमें आज़ादी बिना खडग बिना ढाल साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल’ या ‘हम लाएं हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चो संभाल के’ सुनते हैं तो गीत के बोलों में डूब जाते हैं।
पिंजरे के पंछी रे…, या चल अकेला चल अकेला चल अकेला.. चलो चलें मन सपनों के गांव में… समेत तमाम कालजयी गाने लिखने वाले प्रदीप को हम वह सम्मान नहीं दे पाए जिसके वह हकदार थे। दुर्भाग्यपूर्ण बात ये हैं कि 71 फ़िल्मों और 1700 गाने देने वाले कवि प्रदीप को आज तक पद्म भूषण, पद्मश्री या भारत रत्न जैसी कोई उपाधि नहीं मिली है।

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11 दिसम्बर 1998 को आज ही के दिन 83 वर्ष के उम्र में यह महान कवि मुम्बई में चिरनिद्रा में सो गया। कवि प्रदीप की दो बेटिया सरगम ठाकर और मितुल प्रदीप है। उनकी बेटियों ने बाद में कवि प्रदीप फाउंडेशन की स्थापना की। यह फाउंडेशन कवि प्रदीप की याद में एक अवार्ड “कवि प्रदीप सम्मान” भी देता है।