कैदियों की रंगदारी से दहशत में डॉक्टर, जेल में बंद बदमाश कर रहे ऐश

Published by Published: July 14, 2017 | 3:43 pm

पूर्णिमा श्रीवास्तव
गोरखपुर: मंडलीय कारागार वैसे तो पहले से अपराधियों के मौज-मस्ती की जगह के रूप में कुख्यात रहा है। जेल में बंद अपराधियों के हौसले, लगता है और भी बुलंद हो गए हैं। तभी तो जिस डॉक्टर के नर्सिंग होम का बीते दिनों मुख्यमंत्री ने खुद लोकार्पण किया था, उसी से जेल में बंद अपराधी 20 लाख रुपए की रंगदारी मांग रहा है। सीएम के करीबी डॉक्टर का मामला होने से जेल के आला अफसर दोषियों को चिन्हित कर कार्रवाई कर रहे हैं, लेकिन इन सब कवायद के बाद भी पुलिस के जिम्मेदार डॉक्टर्स को सुरक्षा का भरोसा देने में कामयाब नहीं दिख रहे हैं।

बीते सप्ताह जेल में बंद अपराधी संजय यादव ने योगी आदित्यनाथ के करीबी डाक्टर शिवशंकर शाही से फोन पर 20 लाख की रंगदारी मांगी। मामला सुर्ख़ियों में आने के बाद सरकार ने एसएसपी को तत्काल हटाकर एसटीएफ के एसपी अमित पाठक को अपराधियों से निपटने की जिम्मेदारी दी। लेकिन पाठक ने कार्यभार ग्रहण करने से इनकार कर दिया। अब सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज को गोरखपुर की कमान सौंपी गई है। इधर, पुलिस जेल में बंद अपराधियों पर कार्रवाई का दावा कर रही है, उधर दहशत में दिन-रात गुजार रहे डॉक्टर्स ने योगी से मिलकर अपना दर्द साझा किया है।

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योगी अभी सुरक्षा का भरोसा ही दे रहे थे कि एक और डॉक्टर से रंगदारी मांगने का मामला प्रकाश में आने के बाद सनसनी फैल गई। बदायूं जेल में बंद कुख्यात अपराधी चंदन सिंह ने शहर के प्रतिष्ठित डॉ. शशिकांत दीक्षित से 20 लाख की रंगदारी मांग कर यह साबित कर दिया कि जेल से उसका सिक्का बदस्तूर चल रहा है। सीएम शनिवार को शहर में थे। इसीदिन अपराधियों ने इंटरनेशनल कॉल के जरिए उरूवा के सर्राफ से 5 लाख रुपए की रंगदारी मांगी। सप्ताह भर के अंदर रंगदारी के तीन मामलों से साफ हो चुका है कि गोरखपुर के डॉक्टर और व्यापारी एक बार फिर अपराधियों के साफ्ट टॉरगेट पर हैं।

बहरहाल, जेल प्रशासन ने रंगदारी मांगने के आरोपी अपराधियों के साथ दोषी जेल कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की है। अपराधी संजय यादव को तन्हाई बैरक में डाल दिया गया है। वहीं डीआईजी जेल यादवेंद्र शुक्ल ने रंगदारी मांगने वाले बदमाश संजय यादव की बैरक के पास ड्यूटी करने वाले तीन बंदीरक्षकों को सस्पेंड करने के साथ ही जेलर रामकुबेर सिंह, डिप्टी जेलर देव दर्शन सिंह, रणंजय सिंह और प्रधान बंदी रक्षक चंद्रभान पांडेय व दर्शन प्रसाद के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के लिए लिखा है। दरअसल, गोरखपुर मंडलीय कारागार अपराधियों से लिए ऐशगाह से कम नहीं है। जैमर से लैस होने के दावे के बाद भी जेल में बंद बदमाश मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर रहे हैं। रंगदारी का मामला उजागर होने के बाद अफसरों के छापेमारी में बैरक के बाद मोबाइल फोन बरामद हुए हैं। शनिवार को मुख्यमंत्री शहर में थे, उसी दिन पुलिस को खबर मिली कि मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में जेल में सजा काट रहे पूर्व मंत्री अमर मणि त्रिपाठी मिलेनियम बैरक में मोबाइल से बात कर रहे है। छापा तो पड़ा लेकिन प्रशासनिक अफसरों को कुछ नहीं मिला। क्राइम ब्रांच की टीम ने बंदायू जेल में बंद चंदन सिंह के गुर्गों से भी पूछताछ की।

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रंगदारी के लिए साफ्ट टॉरगेट रहे हैं डॉक्टर
गोरखपुर के डॉक्टर पिछले दो दशक से अपराधियों के साफ्ट टॉरगेट पर रहे हैं। दो दशक पहले तक डॉक्टरों के लिए अमित मोहन वर्मा और रामायण उपाध्याय खौफ का पर्याय रहे हैं। तब दर्जनों डॉक्टरों ने इन दोनों ने खूब रंगदारी वसूली थी। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. जेपी सिंह से भी उन्होंने रंगदारी मांगी थी लेकिन जब डॉ. जेपी सिंह ने पैसा देने से इनकार कर दिया तो दोनों ने उनके घर पास 2004 में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी। इस सनसनीखेज वारदात से शहर के डॉक्टरों में पहली बार खौफ पैदा हुआ था। यही नहीं जब डॉ. जेपी सिंह का राजघाट में राप्ती तट पर अन्तिम संस्कार किया जा रहा था उस दौरान भी अमित ने दो डॉक्टरों के पास फोन कर रंगदारी मांगी थी। तब हालात यह थे कि कोई डॉक्टर अनजान कॉल रिसीव नहीं करता था। यहां के डॉक्टरों ने तभी से प्राइवेट गार्ड रखना शुरू कर दिया था।

खैर, 2004 में 50-50 हजार के इनामी हो चुके दोनों बदमाशों को पुलिस ने इनकाउंटर में मार गिराया। पिछले पांच वर्षों से कुख्यात चंदन सिंह यहां के डॉक्टरों के लिए खौफ का पर्याय बन चुका है। तमाम ऐसे डॉक्टर हैं जो खौफ के चलते चंदन को रंगदारी दे चुके हैं। डॉ. एसबी मौर्या ने रंगदारी के खिलाफ पुलिस में शिकायत की तो चंदन के गुर्गों ने उनके क्लीनिक पर गोलियां तड़तड़ाई थीं। चंदन गिरोह के 17 चिन्हित गुर्गों का असल धंधा रंगदारी वसूलना ही है। आईएमए के अध्यक्ष डॉ. बीबी गुप्ता का कहना है कि डॉक्टर खुद को असुरक्षित महसूस करेगा तो लोगों को इलाज कैसे देगा। मुख्यमंत्री को पूरे प्रकरण से अवगत करा दिया गया है। वह पहले भी हमारी सुरक्षा को लेकर सडक़ों पर आंदोलन कर चुके हैं।

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हर छापेमारी में मिला मोबाइल
जब भी जेल से रंगदारी और आपत्तिजनक गतिविधियों की शिकायत मिलती है, अफसर छापेमारी की रस्म करते हैं। पिछले तीन सालों में 20 से अधिक छापेमारी में जेल के अंदर से 150 से अधिक मोबाइल व आपत्तिजनक सामान मिले हैं। जेल में डिश टीवी, पेन ड्राइव, शराब की बोतल आदि मिलना आम बात है। जेल में बंद चॢचत अमर मणि त्रिपाठी जेल में ही जगराता का आयोजन भी कर चुके हैं। जेल से ही अमरमणि ने बेटे अमनमणि का चुनाव अभियान मैनेज किया और जीत भी दिला दी। जेल के अंदर कैदियों की बादशाहत चलती है।

जब भी इनपर अंकुश की कोशिश होती है स्थितियां विस्फोटक हो जाती है। बीते वर्ष अक्टूबर माह में कैदी साथी की मौत के बाद गुस्साएं बंदियों ने जमकर उत्पात मचाया था। कैदियों ने बातचीत करने पहुंचे डीआईजी जेल यादवेंद्र शुक्ल और वरिष्ठ जेल अधीक्षक एसके शर्मा को बंधक बना लिया। अधिकारियों को छुड़ाने के लिए बंदीरक्षकों ने फायरिंग की तो बंदियों ने भी मोर्चा खोल लिया। चार बंदियों ने टावर पर चढक़र भागने की कोशिश भी की।

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