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भारतीय धर्म ने कभी उपासना को बन्धन नहीं बनाया: सीएम योगी आदित्यनाथ

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sudhanshuBy sudhanshu

Published on 23 Sep 2018 1:01 PM GMT

भारतीय धर्म ने कभी उपासना को बन्धन नहीं बनाया: सीएम योगी आदित्यनाथ
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गोरखपुर: गोरखनाथ मन्दिर, गोरखपुर में युगपुरुष ब्रह्मलीन महन्त दिग्विजयनाथ महाराज की 49वीं एवं राष्ट्रसन्त महन्त अवेद्यनाथ महाराज की चतुर्थ पुण्यतिथि के अवसर पर रविवार से प्रारम्भ विविध समसामयिक विषयों पर सम्मेलन के अन्तर्गत ‘लोक-कल्याण भारतीय संस्कृति की विशेषता है’ विषय पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोरक्षपीठाधीश्वर महन्त योगी आदित्यनाथ महाराज ने कहा कि भारतीय संस्कृति के मूल मंत्र लोक - मंगल एंव लोक-कल्याण भगवान शिवावतारी महायोगी गोरक्षनाथ की तपस्थली श्री गोरक्षपीठ का भी वैचारिक अधिष्ठान है।

गोरक्षपीठाधीश्वर महन्त दिग्विजयनाथ महाराज एवं गोरक्षपीठाधीश्वर महन्त अवेद्यनाथ महाराज का पूरा जीवन लोक-कल्याण एवं लोक - मंगल को ही समर्पित था। भारतीय संस्कृति के अनेकानेक विशेषताओं में लोक-कल्याण एक महत्वपूर्ण विशेषता है यदि भारतीय संस्कृति का हम निचोड़ कर देखें तो वह परोपकार है। परोपकार लोक-कल्याण का ही पर्याय है।

स्‍वयं के स्‍वार्थ को जगह नहीं

सीएम योगी ने कहा कि भारतीय जीवन मूल्य में स्वयं के स्वार्थ को जगह नहीं है। वही जीवन श्रेष्ठ है जो दूसरों के कल्याण के लिए समर्पित हो। भारतीय संस्कृति की इसी लोक कल्याणकारी भावना से धर्म की वह शास्वत व्यवस्था प्रतिष्ठित हुई जो परोपकार का मार्ग दिखाता है, जो सदाचार की राह का अनुगामी बनाता है, जो कर्तव्यों का भान कराता है और नैतिक मूल्यों के प्रति आग्रही बनाता है। भारत ने इसी धर्म की व्यापक अवधारणा को स्वीकारा है। हमारे धर्म में कहीं नहीं कहा गया कि हम किसकी पूजा करें, किसकी न करें। यह कभी नहीं कहा गया कि हिन्दू का अर्थ मन्दिर में जाये, टिका लगाये। भारतीय संस्कृति के अन्तर्गत भारतीय धर्म ने कभी उपासना को बन्धन नहीं बनाया और इसीलिए हमारी संस्कृति ने उद्घोष किया उदार चरितानाम ‘वसुधैवकुटुम्बकम’। इस मंत्र ने भी लोक-कल्याण का वैश्विक मार्ग प्रशस्त किया। भारत की सनातन संस्कृति में सदैव दूसरों के लिए जीवन जीने को महत्वपूर्ण माना गया। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया’ का मंत्र भारतीय संस्कृति में ही गूंजा जो लोक-कल्याण की ही प्रेरणा देता है। भारत के ऋषि परम्परा ने लोक-कल्याण एवं लोक - मंगल के लिए ही भारत की ऋषि परम्परा सदैव समर्पित रही। संकीर्णता के दायरे से बाहर निकलकर मुक्त चिन्तन के आग्रही संतो के गुरूकुलों से लोक-कल्याण और लोक - मंगल का ही मंत्र गूंजा। आज भी सरकार से अधिक धर्म स्थानो एवं धर्मार्थ संस्थानों द्वारा सेवा के परकल्प चलाये जा रहें हैं।

सीएम योगी ने प्रदेश के लिए छोड़ी सुख-सुविधाएं

इस सम्मेलन के मुख्य वक्ता भारत सरकार के मानव संसाधन के विकास राज्य मंत्री डॉ सत्यपाल सिंह ने कहा कि गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वरों ने सदैव लोक-कल्याण और लोक - मंगल के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित किया और आज भी गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर महन्त योगी आदित्यनाथ जी ने देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की जनता की सुख सुविधाओं के लिए दिन-रात एक कर अपनी सुख सुविधाओ की तिलांजलि देकर इस पीठ के लोक-कल्याण के पथ पर अग्रसर हैं। वास्तव में मनुष्य के तीन शत्रु है- अज्ञान, अन्याय और अभाव बिना इनके समाधान के लोक-कल्याण का मार्ग प्रशस्त नहीं हो सकता। वास्तव में लोक-कल्याण का अर्थ इन्हीं तीन मानव शत्रुओं के विरूद्ध संघर्ष है। गोरक्षपीठ ने शिक्षा संस्थाओं के माध्यम से अज्ञान के विरूद्ध संघर्ष छेड़ रखा है।

अन्याय के विरूद्ध समाज को जागृति करने एवं वर्तमान में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में महन्त योगी आदित्यनाथ ने अन्यायियों-अत्याचारियों के अन्त का शंखनाद कर रखा है। सेवा और विकास के बल पर अभाव के विरूद्ध जंग जारी है। इस पीठ की यही लोक-कल्याणकारी अज्ञान का देश प्रसंशक है। वास्तव में यह युद्ध सम्पूर्ण मानव जाती का युद्ध है। भारत के ऋषि परम्परा सदैव मानव कल्याण हेतु अज्ञान, अन्याय और अभाव के विरूद्ध लड़ती रही है। भारतीय संस्कृति के मूल मंत्र लोक-कल्याण की प्रतिष्ठा हेतु हमें निर्णायक संघर्ष छेड़ना ही होगा। लोक-कल्याण ही रामराज का मूल मंत्र था, यही आज का भी मूल मंत्र है।

संस्‍कृति से ही भारत की पहचान

विशिष्ट अतिथि राष्ट्रीय स्वयं सेवक मुकेश खण्डेकर ने कहा कि भारत की पहचान उसकी संस्कृति से है। भारतीय संस्कृति ऋषियों की तपस्या का प्रतिफल है। भारत देवभूमि है, पुण्य भूमि है, मातृभूमि है। इसका निर्माण ईश्वर ने लोक-कल्याण के लिए ही किया है। परिणामतः भारतीय संस्कृति लोक-कल्याण पर ही केन्द्रित है। 1948 में जब दो हजार वर्षो से भटकते इजरायल वाशियों ने इजरायल की स्थापना की तो उन्होने घोषित किया 107 देशों में वे भटकते रहे और उनमें से एक मात्र भारत ऐसा देश है जिसने हमें भ्रातृत्व भाव से स्वीकारा। भारतीय संस्कृति सर्व समावेशी है, समरसता की प्रतीक है। इस संस्कृति में ही यह घोषित किया की परोपकार ही पुण्य है और दूसरों को पीड़ा देना ही पाप है। मातृवत् परदारेषु का उद्घोष भारतीय ऋषि परम्परा का ही है। आत्मावत सर्वभूतेषु एवं पराया धन मिट्टी के समान है मानने वाली भारतीय संस्कृति ने लोक-कल्याण, लोक - मंगल एवं सभी जीवों में ईश्वर का वास है जैसे मानवतावादी उन सिद्धान्तों को जन्म दिया जो शास्वत हैं।

रामकोट अयोध्या से पधारे जगद्गुरू राघवाचार्य महाराज ने कहा कि दोनों ब्रह्मलीन गोरक्षपीठाधीश्वर को वास्तविक श्रद्धांजलि यही है कि उन्होंने जिन जीवन मूल्यों के लिए अपना जीवन समर्पित किया उसे पूरा करने में अपनी सम्पूर्ण क्रियाशक्ति लगा दें।

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