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दारुल उलूम देवबंद ने लगाया बैन, मदरसे में अब नेताओं की NO ENTRY

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AdminBy Admin

Published on 11 Feb 2016 3:54 AM GMT

दारुल उलूम देवबंद ने लगाया बैन, मदरसे में अब नेताओं की NO ENTRY
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Yogesh Tayagi Yogesh Tayagi

सहारनपुर: इस्लामिक शिक्षण संस्था दारुल उलूम, देवबंद में नेताओं के आने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। यहां के वाइस चांसलर मुफ्ती अबुल काशिम नोमानी ने कहा, '' यहां तालीम पाने वाले छात्रों को राजनीति से दूर रहना चाहिए। दारुल उलूम, देवबंद के अपने कायदे-कानून हैं। हम नहीं चाहते की किसी भी बात को लेकर हमें राजनीति से जोड़ा जाए। हम केवल बच्चों को अच्छी तालीम देना चाहते हैं। ताकि वो सच्चाई के रास्ते पर चलें। हम सिर्फ दुनिया को धर्म और भाईचारा का पैगाम देना चाहते हैं, जिससे अमन और सुकून बना रहे। सभी धर्मों के लोग एक-दूसरे के साथ प्यार से रहें। यही वजह है कि देवबंद मदरसा बोर्ड ने राजनीतिक लोगों के आने पर पाबंदी लगा दी है।

देवबंद में अभी करीब पांच हजार छात्र तालीम ले रहें हैं। इनमें से ज्यादातर भारतीय हैं। बोर्ड मदरसे की देखरेख के साथ-साथ छात्रों की सहूलियत का भी हर ख्याल रखता है। इस मदरसे का सालाना फंड करीब 10 करोड़ के करीब है, जो चंदे के जरिए ही आता है। बता दें कि इससे पहले भी मार्च, 2014 में देवबंद ने नेताओं के मदरसे में आने पर रोक लगाई थी, लेकिन ये रोक केवल लोकसभा चुनाव तक ही थी। चुनाव के बाद कई नेता वहां आते-जाते रहे हैं।

ये भी हैं प्रतिबंध

- दारुल उलूम परिसर में कैमरा और मोबाइल से फोटो लेने पर पहले से ही प्रतिबंध है।

- मदरसे की बाहर से भी फोटो खींचना मना है।

- इसके लिए गेट पर एक नोट भी चिपकाया गया है।

कब रखी गई थी देवबंद की नींव ?

21 मई, 1866 में दारुल उलूम, देवबंद की नींव मोलाना कासिम नानोतवी ने रखी थी। यहां कभी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मीटिंग होती थी। देश को गुलामी की जंजीरों से आजाद कराने का मास्टर प्लान तैयार किया जाता था। कहा जाता है कि जब स्टूडेंट्स को दारुल उलूम में भेजा जाता था तो कोड वर्ड होता था, ‘50 किताबें पढ़ने के लिए आईं हैं, पढ़ लेना।‘ इसका मतलब ये था कि 50 मुजाहिद आए हैं। इन्हें जंग-ए-आजादी के लिए तैयार करना है। दारुल उलूम के पहले छात्र मौलाना महमूद हसन थे, जिन्हें बाद में शैख़-उल-हिंद के ख़िताब से भी नवाज़ा गया।

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