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सीएम योगी व नृत्यगोपालदास के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की याचिका खारिज

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sudhanshuBy sudhanshu

Published on 20 Jun 2018 1:34 PM GMT

सीएम योगी व नृत्यगोपालदास के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की याचिका खारिज
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इलाहाबाद: हाईकोर्ट ने दारागंज स्थित गंगा भवन को गिराए जाने के मामले में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ व महंत नृत्य गोपालदास सहित अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग को लेकर दाखिल याचिका बुधवार को ख़ारिज कर दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति बीके नारायण एवं न्यायमूर्ति राजीव गुप्ता की खंडपीठ ने याची लल्लू लाल चौधरी व उनके बेटे के वकील और अपर शासकीय अधिवक्ता प्रथम एके संड को सुनकर दिया। एजीए एके संड के अनुसार याची गंगा भवन में वर्षों से बतौर किराएदार रह रहा है। उसका कहना था कि भवन के मालिक गंगाधर राव जोशी ने अस्सी के दशक में भवन का उसके कब्जे वाला हिस्सा 60 हजार रुपये में यह कहकर मारगेज रखा कि तीन साल में रकम न लौटाने पर वह मालिक हो जाएगा। उसके बाद 1998 में दीवानी मुकदमा दाखिल किया कि वह गंगा भवन के दूसरे तल पर वर्षों से बतौर किराएदार रह रहा है। उसे बेदखल न किया जाए। लेकिन इस मुकदमे में मारगेज का कोई जिक्र नहीं किया। जबकि 2013 में एक अन्य मुकदमा दाखिल कर मारगेज की शर्त के मुताबिक खुद को मालिक बताया। इस मुकदमे में उसने यह कहा कि आर्थिक तंगी के कारण वह बिजली कनेक्शन नहीं ले पा रहा है।और अब आरोप लगा रहा है कि महंत धर्मदास व अन्य गत दो जून को कब्जा करने की नीयत से आए और 50 हजार रुपये नकद, दरवाजे-खिड़कियों सहित 10 लाख का सामान ले गए। महंत धर्मदास का संबंध नृत्य गोपाल दास और योगी आदित्यनाथ से बताते हुए सभी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और सीबीआई से जांच कराने की मांग वाली याचिका का विरोध करते हुए एजीए एके संड ने कहा कि याची ने एफआईआर के लिए अधीनस्थ अदालत में भी सीआरपीसी की धारा 156 (3) के तहत अर्जी दी है। साथ ही जिस व्यक्ति के पास बिजली कनेक्शन के लिए पैसे नहीं थे, उसके यहां से 50 हजार नकद सहित 10 लाख का सामान ले जाने का आरोप पूरी तरह झूठा है। इस पर कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए याची से अधीनस्थ अदालत के समक्ष अपनी बात रखने को कहा।

कोर्ट की अन्‍य खबरें

हाईकोर्ट का गोहत्या का मुकदमा रद्द करने से इन्कार

इलाहाबाद: हाईकोर्ट ने बरेली के भोजीपुरा के शकील उर्फ़ पोला व् अन्य के खिलाफ गो हत्या के आरोप में दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने से इंकार कर दिया है और कहा है कि प्राथमिकी से अपराध बनता है।कोर्ट ने 7 साल से कम सजा वाले अपराधों में गिरफ्तारी न करने के कानून का पालन करने का निर्देश दिया है।किंतु स्प्ष्ट किया है कि यह संरक्षण पुलिस रिपोर्ट पेश होने के बाद जारी नही रहेगा।यह आदेश न्यायमूर्ति बी के नारायण तथा न्यायमूर्ति राजीव गुप्ता की खंण्डपीठ ने दिया है।गो हत्या के आरोप में दर्ज मामले की विवेचना चल रही है।

शराब पीने से हुई मौत पर कदाचार मान इन्सपेक्टर का निलम्बन गलत

इलाहाबाद: हाईकोर्ट ने कहा है कि जहरीली शराब पीने से चार लोगो की मौत घटना को कदाचार मानते हुए पुलिस इंस्पेक्टर का निलम्बन उचित नही है।सेवाजन्य कोई अनुचित कार्य करने या कर्तव्य न निभाने या अपराध में लिप्त होने की दशा में विभागीय जाच के दौरान ही निलंबित किया जा सकता है।कोर्ट ने कहा है कि वैसे भी पुलिस नियमावली के तहत संभावित जाच या प्रारम्भिक जाँच लम्बित होने पर निलम्बन नही किया जा सकता।एस एस पी गाजियाबाद ने शराब पीने से 4 लोगो की मौत की घटना की सी ओ से प्रारम्भिक जाँच कर एक हफ्ते में रिपोर्ट मांगी और याची को लापरवाही बरतने के कारण निलंबित कर दिया।जिसे चुनौती दी गयी थी।कोर्ट ने निलम्बन आदेश 13 मार्च 2018 को रद्द कर दिया है।

यह आदेश न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल तथा न्यायमूर्ति आई ए खान की खंण्डपीठ ने ध्रुव भूषण दुबे की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है।याचिका पर अधिवक्ता विजय गौतम ने बहस की।इनका तर्क था कि शराब पीने से 4 लोगो की मौत के लिए याची को कदाचार का दोषी नही माना जा सकता। पुलिस नियमावली के नियम 17 (1)(ए) के तहत इसे सेवा जनित कदाचार नही माना जा सकता।ऐसे में निलम्बन अवैध है।दूसरे बिना विभागीय जांच शुरू किये किसी कर्मचारी को निलंबित नही किया जा सकता।केवल प्रारम्भिक जाच रिपोर्ट मांगने के आधार पर निलम्बन विधि विरुद्ध है।श्री गौतम ने कहा कि हालांकि निलम्बन कोई दण्ड नही है। नियम 17 के तहत विभागीय जांच लम्बित रहने या आपराधिक केस की विवेचना ,जाँच या ट्रायल या जेल में बन्द होने के दौरान ही निलम्बन किया जा सकता है।याची पर ऐसी स्थिति नही लागू होती।प्रारम्भिक जाच के लम्बित रहते कर्मी को निलंबित नही किया जा सकता।ऐसा आदेश वैध नही माना जा सकता।उन्होंने अपने पक्ष में सुप्रीम कोर्ट की नजीर भी पेश की।कोर्ट ने निलंबन आदेश रद्द कर दिया।

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