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Politics: फिर निकला नोएडा का 'जिन्न', क्या राजनीति पर भारी पड़ेगा अंधविश्वास

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shaliniBy shalini

Published on 1 Jun 2018 9:37 AM GMT

Politics: फिर निकला नोएडा का जिन्न, क्या राजनीति पर भारी पड़ेगा अंधविश्वास
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लखनऊ: कैराना की हार के बाद सीएम योगी आदित्यनाथ पर भी अंगुलियां उठने लगी हैं। शंशय के बादलों के बीच कई सवाल उमड़-घुमड़ रहे हैं। इसी बीच नोएडा के जिन्न की भी चर्चा आम है, जहां जाने के बाद कोई भी मुख्यमंत्री यूपी में अपनी कुर्सी बचा नहीं पाया। लेकिन अबकी खुद एक संयासी हैं, जो धर्म-मंत्र, सिद्धि, पूजा सबसे वाकिफ हैं जो किसी भी काले साये के प्रभाव को कम या ख़त्म कर सकता है। इन्हीं कयासों की पड़ताल करती एक स्टोरी:

इसलिए उठे सवाल

बीते दिसंबर में सीएम योगी ने नोएडा का दौरा किया और पीएम ने भी उनके इस साहसिक कदम पर खूब प्रसंशा की।नोएडा के मिथक को चुनौती देकर योगी आदित्यनाथ ने खुद लीक से हटकर चलने वाला साबित किया। लेकिन उसके बाद हुए यूपी में चार उपचुनाव में बीजेपी हार गयी। यही हार उस डर की कहानी बयान करती है जो नोएडा के साथ जुडी हुई है। तो क्या सच में नोएडा के मनहूस साये ने सीएम योगी का पीछा करना शुरू कर दिया है? बीजेपी के अपने ही विधायक ने सीएम की कार्यप्रणाली पर सार्वजनिक रूप से अंगुली उठाकर इस डर को और पुख्ता कर दिया है।

ये हैं नोएडा के शिकार

राजनीतिक रूप से इसका पहला शिकार वीर बहादुर सिंह थे जिन्हे नोएडा से लौटने के तुरंत बाद पार्टी ने उन्हें हटा दिया। तब से यह एक ऐसा सच बन गया की बाद के कई मुख्यमंत्रियों ने नोएडा के दौरे से दूरी बनाये रखी। अखिलेश यादव तो इसके हालिया शिकार हैं जबकि वे नोएडा गए नहीं लेकिन अपने आवास से ही वहां के कुछ प्रोजेक्ट का उद्घाटन भर किया था। इससे पहले 2011 में मेट्रो का उद्घाटन मायावती को नोएडा खींच ले गया लेकिन एक साल बाद ही उनकी सत्ता चली गई।

इन जगहों से भी जुड़े हैं अन्धविश्वास

उज्जैन: रात को नहीं रुकते सीएम

उज्जैन के राजा स्वंय महाकाल हैं इसलिए एक जगह पर दो राजा नहीं रह सकते। यही कारण है कि एमपी का सिंधिया राजपरिवार यहां कभी रात को नहीं रुकता। यह भी माना जाता है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री और मंत्री भी इसी वजह से यहां रात में नहीं रुकते हैं. वर्तमान सीएम शिवराज सिंह चौहान भी उज्जैन कुंभ के दौरान दिनभर यहां रहे लेकिन रात को वापस चले गए।

इछावर मुख्यालय, मध्य प्रदेश

मध्यप्रदेश के इछावर मुख्यालय से यह मिथक जुड़ा है कि यहां जो जाता है उसकी सीएम की कुर्सी चली जाती है। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. कैलाश नाथ काटजू 1962 में, पंडिता द्वारका प्रसाद मिश्र 1967 में, कैलाश जोशी 1977 में, वीरेंद्र कुमार सकलेचा 1979 में इछावर पहुंचे थे, जिसके बाद उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी से हाथ धोना पड़ा था। इसी डर 12 साल पहले बने इस मुख्यालय का उद्घाटन करने सीएम आज तक नहीं पहुंचे।

तंजौर का मंदिर

तमिलनाडु स्थित तंजौर के मंदिर से ऐसा अन्धविश्वास जुड़ा है कि यहां पहुंचने वाला राजनेता निकट भविष्य में मर जाता है। 1984 में इंदिरा गांधी तंजौर के बृहदेश्वर मंदिर गयीं थीं जिसके बाद उनकी मौत हो गयी। फिर सीएम एमजी रामचंद्रन की मृत्यु को भी मंदिर जाने से ही जोड़ा गया।

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