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प्रदेश में सियासी बयार बदलने के बाद नौकरशाहों की पलटी फितरत, नए CM पर टिकी सबकी निगाहें

उत्तर प्रदेश की सियासी बयार बदलने के साथ ही नौकरशाहों ने अपनी फितरत के अनुरूप रंग बदलने शुरू कर दिए हैं। ब्यूरोक्रेसी में अहम पदों पर तैनाती के लिए जोर आजमाइश की जा रही है।

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tiwarishaliniBy tiwarishalini

Published on 17 March 2017 8:31 AM GMT

प्रदेश में सियासी बयार बदलने के बाद नौकरशाहों की पलटी फितरत, नए CM पर टिकी सबकी निगाहें
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राजकुमार उपाध्याय

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की सियासी बयार बदलने के साथ ही नौकरशाहों ने अपनी फितरत के अनुरूप रंग बदलने शुरू कर दिए हैं। ब्यूरोक्रेसी में अहम पदों पर तैनाती के लिए जोर आजमाइश की जा रही है। सियासी संतुलन साधने के लिए अफसर संभावित सत्ता शीर्ष के सियासी शक्ति केंद्रों से सेटिंग में जुटे हैं। दूसरी ओर पिछली सरकार में महत्वहीन पदों पर तैनात रहे अफसर भी दांव लगा रहे हैं। कई अफसर सरकार के नए मुखिया का नाम तय होने के इंतजार में हैं ताकि सही जगह निशाना लगाया जा सके। करीब हर पार्टी के चहेते अफसरों को आसानी से पहचाना जा सकता है।

चुनाव नतीजे आने के पहले यह अधिकारी अपने-अपने सजातीय नेता को मुख्यमंत्री के तौर पर देखने लगे थे। कई अफसर बड़े नेताओं के करीबी नौकरशाहों के घर हाजिरी देने लगे थे। जब सभी अफसर जोर-जुगाड़ में लगे हों तो काम काज क्या होगा सो दफ्तरों-सचिवालय में फाइलें इंतजार में ही पड़ी हैं और काम काज ठप सा है।

चीफ सेक्रेट्री और डीजीपी पद के लिए लगा रहे कटिया

चुनाव के दौरान बीजेपी के नेताओं ने निर्वाचन आयोग से मुख्य सचिव राहुल भटनागर और पुलिस महानिदेशक जावीद अहमद को हटाने की पुरजोर मांग की थी। पर आयोग ने उनकी एक न सुनी। अब भाजपा को पूर्ण बहुमत का जनादेश मिलने के बाद इन दोनों ही टॉप अफसरों को बदला जाना तो तय ही है।

जिस तरह उत्तर प्रदेश में राजनीति और अफसरशाही एक दूसरे में घुल मिल गए हैं सो सरकार बदलने की आहट नौकरशाह पहले ही भांप लेते हैं। तभी तो चुनावों के बीच में ही उन स्मारकों की साफ-सफाई शुरू करा दी गई जो बसपा शासन में बनाए गए थे। नौकरशाहों को बसपा के आने की आहट सुनाई दे रही थी लेकिन यह आहट गलत निकली।

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बताया जा रहा है कि उसी बीच राहुल भटनागर ने भी बसपा खेमे के एक मजबूत अफसर से मेल-जोल बढ़ाया था। यह समीकरण गलत निकलने पर अब भगवा दल के साथ नजदीकी बढ़ाई जा रही है। कहा जा रहा है कि यदि भाजपा पिछड़े वर्ग से मुख्यमंत्री बनाएगी तो मुख्य सचिव के पद पर अगड़ी जाति के अधिकारी को मौका दिया जाएगा। इसी समीकरण में संजय अग्रवाल और दीपक सिंघल कुछ आशा संजोए हुए हैं।

असल में अग्रवाल के एक भाई अनिल गुजरात काडर में आईपीएस अफसर हैं। इसी समीकरण के आधार पर ब्यूरोक्रेसी में कहा जा रहा है कि अनूप पांडेय भी भाजपा सरकार के पंसदीदा अफसरों में शुमार हो सकते हैं। सदाकांत कल्याण सिंह के प्रिय रहे हैं जबकि अनूप पांडेय कल्याण सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में सूचना निदेशक थे।बाद में उमा भारती के निजी सचिव भी रहे हैं। हालांकि सदाकांत के विरोधी गुट के अफसर केंद्र में उनकी तैनाती से जुड़े विवादों को हवा दे रहे हैं। इससे मामला संशय में है।

अलोक रंजन ने अपने पद से दिया इस्तीफा

-पूर्व मुख्य सचिव व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के मुख्य सलाहकार आलोक रंजन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।

-पर यूपीएसआईडीसी और फिल्म एंड टीवी इंस्टीट्यूट के पदों पर बने हुए हैं।

-वह वर्ष 2001 में भाजपा सरकार में मुख्यमंत्री के सचिव पद पर तैनात रहे हैं।

-साथ ही उनके पास राज्य सम्पत्ति व सूचना विभाग का भी प्रभार रहा है।

-कहा जा रहा है कि पुराने ताल्लुकातों के चलते वह नयी सरकार से तालमेल बनाने में कामयाब हो सकते हैं।

-सत्ताधारी दल के साथ तालमेल ही मलाईदार पद की गारंटी होती है।

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यूपी वापस लौट सकते हैं कई अफसर

अफसरों और नेताओं के गठजोड़ का ही नतीजा है कि सत्ता बदलते ही तमाम अफसर केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर चले जाते हैं। कुछ माकूल माहौल मिलने पर यही लोग प्रतिनियुक्ति बीच में ही छोडक़र वापस लौट आते हैं। इस बार भी ऐसा ही कुछ होगा यह तय है।

वर्ष 1981 बैच के राजीव कुमार-प्रथम, वर्ष 1982 बैच के जेएस दीपक, नीरज गुप्ता, प्रभाष झा, वर्ष 1984 बैच के दुर्गा शंकर मिश्रा, वर्ष 1986 बैच के प्रभात कुमार सारंगी, वर्ष 1987 बैच के अरुण सिंघल, जीवेश नन्दन, वर्ष 1988 बैच के आलोक कुमार-प्रथम, वर्ष 1989 बैच के शशि प्रकाश गोयल समेत दर्जन भर अफसरों की वापसी हो सकती है।

इसके अलावा अखिलेश यादव के कार्यकाल में जाति विशेष के आईएएस और आईपीएस अफसर प्रतिनियुक्ति पर आ गये थे, अब गुजरात काडर के जो अफसर यूपी से ताल्लुक रखते हैं, उन्हें अपने गृहराज्य में आने का मौका मिलना तय माना जा रहा है।

वहीं अखिलेश सरकार में मुख्यमंत्री के खास अफसरों में गिने जाने वाले आमोद कुमार, पार्थ सारथी सेन शर्मा, पंधारी यादव, अमित गुप्ता, जीएस नवीन कुमार, अरविंद सिंह देव, अरविंद कुमार, राजीव कुमार-द्वितीय, रमारमण, प्रांजल यादव, कामरान रिजवी व संजय अग्रवाल उन अफसरों में शामिल हैं जिनकी उम्मीदें दम तोड़ चुकी हैं। इनमें से कई अफसर प्रतिनियुक्ति पर केंद्र में जाने की जुगाड़ में हैं।

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नए मुख्यमंत्री के समक्ष रखेंगे लेखा-जोखा

-अखिलेश सरकार ने उप्र अधीनस्थ सेवा चयन आयोग का गठन किया था। आयोग से भॢतयों के ढेरों विज्ञापन निकले। कई विभागों में तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के पदों पर भर्तियाँ भी हुईं। पर चुनावी अधिसूचना जारी होने के बाद से ही भर्तियों की प्रक्रिया मंद है। वर्तमान में कई विभागों के हजारों पदों पर नियुक्ति लंबित है। बताया जा रहा है कि अब आयोग आगामी व लंबित भर्तियों का लेखा-जोखा नये मुख्यमंत्री के समक्ष रखने की तैयारी कर रहा है और उन्हीं के निर्देशानुसार आयोग अपने कार्यवाही की ‘गति’ तय करेगा।

माया सरकार के अफसरों ने बांट लिए थे पद

कहा जा रहा था कि यदि मायावती की सरकार बनी तो दलित अफसरों में फतेहबहादुर का मुख्य सचिव बनना तय है। इतना ही नहीं अनिल सागर, कुमार कमलेश, दिनेश चंद्र, एस.एम. बोबड़े, सुधीर गर्ग और डीएस मिश्रा की पोस्टिंग को लेकर चर्चा शुरू हो गई थी। कुछ नौकरशाहों ने तो अब पद भी बांट लिए थे। माया सरकार के खास अफसरों में शामिल रहे सेवानिवृत अफसर नेतराम भी पद प्रतिष्ठा पाने के लिए आशान्वित थे।

अमिताभ ठाकुर ने प्रत्यावेदन वापस लिया

पिछली सरकार के पूरे कार्यकाल में ‘सताए’ रहे आईपीएस अमिताभ ठाकुर ने सरकार बदलते ही अपना कैडर बदलने कराने का प्रत्यावेदन वापस ले लिया है। अपनी फेसबुक वाल पर उन्होंने लिखा है कि ‘अचानक से इसकी जरूरत खत्म हो गई। दिसंबर 2016 में केंद्र सरकार के आदेश पर मुझे दो सरकारी सुरक्षाकर्मी मिले थे। अचानक हालात बदल गए और अब जरूरत नहीं दिख रही है, सो आज मैंने उन्हें वापस कर दिया।’

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Excellent communication and writing skills on various topics. Presently working as Sub-editor at newstrack.com. Ability to work in team and as well as individual.

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