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बहुत धुंधली, पर लिपिबद्ध करने की कोशिश, बचपन की यादों के वियोगीजी...

suman

sumanBy suman

Published on 5 July 2017 7:20 AM GMT

बहुत धुंधली, पर लिपिबद्ध करने की कोशिश, बचपन की यादों के वियोगीजी...
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आनंद वी ओझा

लखनऊ: मोहनलाल महतो 'वियोगी'जी के नामोल्लेख के साथ ही मैं बचपन की यादों में खो जाता हूँ। इतने छुटपन की यादें जो विस्तृति के कगार पर खड़ी हैं। यह निर्णय करना भी कठिन है कि स्मृति का कौन-सा छोर कहाँ से पकड़ूँ, लेखन की शुरूआत कहाँ से करूँ। यादें समय की अनेक परतों के पीछे जा छुपी हैं और बहुत धुँधली हैं। फिर भी, मेरी लिखने की ज़िद के कारण तो हैं ही और मैं चाहता हूँ कि उन्हें लिपिबद्ध करूँ। ऐसे लेखन में काल-क्रम का निर्धारण यथोचित नहीं हो पाता। लिहाजा, एक अनिवार्य विवरण से इस स्मृति-लेखन का प्रारंभ करना होगा मुझे।

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तब पटना के आई.टी. गोलम्बर के समीप और पटना उच्च न्यायालय के पीछे बने एम.एल.सी या किसी एम.एल.ए. फ्लैट में पिताजी रहते थे। उस भवन में वह क्यों, कैसे और किस की सदाशयता से थे, यह तो मैं नहीं जानता; लेकिन इसमें मोहनलाल महतो 'वियोगी'जी का प्रत्यक्ष या परोक्ष सहयोग जरूर था--ऐसा मेरे विस्मरण में भी कौंधता है। उन दिनों वह राज्यपाल द्वारा मनोनीत बिहार विधान परिषद् के सम्मानित सदस्य थे।

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एम.एल.ए. फ्लैट से आर ब्लाॅक के चौराहे तक पहुँचकर वहाँ से मुड़नेवाले किसी मार्ग पर पिताजी हम सबों को रिक्शे से वियोगीजी के घर ले जाते थे। बड़े-से अहाते में उनका छोटा-सा घर था। प्रवेश-द्वार पर मालती की लताएँ थीं, जिनसे झरते थे भीनी सुगंधवाले गुलाबी फूल! वियोगीजी के घर पहुँचते ही, चरण-स्पर्श के बाद, हम भाई-बहन द्वार के उन फूलों को एकत्रित करने में जुट जाते थे और उन फूलों की ढेरी बना लेते थे, फिर उनसे घर-गली-चौबारे बनाने में मशगूूूल हो जाते थे। घर के अंदर, बैठक में, पिताजी और वियोगीजी की ठीक-ठीक समझ में न आनेवाली प्रियवार्ता होती थी तथा अंतःपुर मेंं मेरी माताजी महिलाओं के साथ चर्चा-निमग्न रहती थीं। हम घर में तब प्रविष्ट होते थे, जब बैठक में खाद्य पदार्थों की प्लेटें सज जाती थीं और हमें पुकारा जाता था।

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जब शाम का अंधकार घना हो जाता, हमें घर के बाहरी दालान में बुला लिया जाता था, जहाँ चौकी और आरामकुर्सियाँ पड़ी होती थीं। वियोगीजी हम बच्चों की जिद पर कहानियाँ सुनाते, कई कहानियाँ तो बहुत दिलचस्प और भयप्रद होतीं, जिनका ख़याल भी बाद की रातों में हमें सिहरन देता था। उनकी सुनायी हुई एक कथा की बहुत धुँधली-सी स्मृति मेरे मन में आज भी यथावत् है। उस कथा की दिवंगता नायिका देवी-स्वरूपा थीं और उन्हीं के परिवार की सदस्या थीं। वह सर्वांग सुंदर थीं और स्मरण करने पर रत्नाभूषण से सज्जित, घने-काले-घुँघराले केश खोले सशरीर उपस्थित हो जाती थीं एवं कथा में भयभीत कर देनेवाला हस्तक्षेेेप करती थीं। वियोगीजी की चामत्कारिक कथाओं का अंत नहीं था कहीं।... शाम का घनान्धकार, मालती के फूलों की भीनी सुगंध और मंद-मंद बहती पुरवा हवाओं में वियोगीजी की कथा हमारे बाल-मन पर जादुई असर करती। हम विस्मित, विमुग्ध, अवाक् और भयाकुल रहते--ठगे हुए-से। और, कई बार तो मुँह खोले कथा-रस में आकण्ठ डूबे रहते।

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वियोगीजी की कथाएँ बेपर की लंबी उड़ान भरतीं तो पिताजी वर्जना देते हुए कहते--'अब रहने भी दो। बच्चे डरेंगे भाई!' लेकिन वियोगीजी पिताजी की अनसुनी करके कथा पूरी सुनाकर ही विराम लेते। पिताजी की वर्जना का प्रत्युत्तर देते हुए वियोगीजी मुस्कराते हए कहते--'तुम नाहक परीशान हो। देखो तो, बच्चे कथा में कैसे रमे हुए हैं, कितनी तल्लीनता से सुन रहे हैं कहानी।'...

वियोगीजी सरल, सहृदय, कल्पनाशील और मस्तमौला व्यक्ति थे। उम्र में पिताजी से आठ वर्ष बड़े (जन्म-वर्ष : 1902) थे, कहा जाता है कि वियोगीजी का जन्म आज ही की तारीख को 1902 में हुआ था, पर इसकी स्पष्ट जानकारी नहीं । वियोगी जा और पिताजी की मित्रता घनिष्ठ और पुरानी थी। दोनों समान तल पर 'तुम-ताम' में बातें करते है।थे। वियोगीजी की किसी आधारहीन प्रगल्भता पर पिताजी से उनकी खुली बहसें भी होती थीं, जो नोंक-झोंक की हद तक जा पहुँचती थीं, किन्तु दोनों मित्रों के बीच कभी मनोमालिन्य नहीं उपजा। वे जब कभी मिलते, जिस मोड़ से विलग हुए थे, वहीं से एकसाथ चल पड़ते। यह उस युग के लोगों की अद्भुत-सी बात थी, जबकि हमारा बाल-मन डरा-सहमा-सा हो जाता था।

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वे 1958-59 के दिन ही थे (ऐसा साधिकार कहने का प्रमाण मुझेे पिछले दिनों पटना में मिला है)। तब मैं 7 साल का बालक था और प्रायः वियोगीजी के घर जाने का हठ किया करता था। इसके दो प्रमुख कारण थे--एक तो उनके घर का सुस्वादु मीठा खाद्य पदार्थ (शुद्ध घी में सराबोर हलवा), दूसरा उनकी आश्चर्यजनक अलौकिक कहानियों का आकर्षण! गरमी की दोपहरी में मैं प्रायः घर से निकल भागता और इमली के वृक्षों तथा अमराइयों में विचरण करता रहता। पिताजी दफ़्तर में होते, माता का मुझ पर वश न चलता। मैं निर्द्वंद्व आखेट करता। लू की तपिश से बार-बार मुझे ज्वर हो आता। एक बार बातों-बातों में माँ ने वियोगीजी से मेेेेरे दिवा-भ्रमण की कथा सुनाकर कहा--'इन्हें कोई ऐसी कथा सुनाइये कि गर्म दोपहरी में अकारण भटकने से ये बाज आ जायें। मेरी तो कुछ सुनते नहीं।'

मेरी माताजी के अनुरोध की रक्षा करते हुए वियोगीजी ने मुझे 'लकड़सुंघवा' की एक ऐसी रोमांकारी और काल्पनिक कथा सुनाई, जिसका आतंक मेरे मन-प्राण पर छाया रहा और भर गर्मी मेरे पाँव घर की सीमा-रेखा में बँधे रहे। आज उस कथा को मैं काल्पनिक कह रहा हूँ, लेकिन जब सुनी थी, परम सत्य-सी प्रतीत हुई थी वह।... तंत्र-मंत्र की शक्ति रखनेवाला 'लकड़सुंघवा' ऐसा प्राणी था, जो छोटे बच्चों के सिर पर लकड़ी का एक टुकड़ा घुमाकर उन्हें हतसंज्ञ कर देता था, फिर बोरी में बाँधकर उन्हें उठा ले जाता था। वियोगीजी की इस कथा में विचित्र सम्मोहन तो था ही, भय से आकण्ठ भर देनेवाला तत्त्व भी था। बेशक, कमाल की थी उनकी किस्सागोई।

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