हॉकी का जादूगर मेजर ध्यानचंद, ठुकरा दिया था हिटलर का ये प्रस्ताव

मेजर ध्यानचंद हॉकी के ऐसे खिलाड़ी रहे हैं जिन्होंने अपने शानदार खेल से पूरी दुनिया को हैरान कर दिया था। मेजर ध्यानचंद को हॉकी का जादूगर कहा जाता है।

मेजर ध्यानचंद

मेजर ध्यानचंद (file pic )

लखनऊ: मेजर ध्यानचंद हॉकी के ऐसे खिलाड़ी रहे हैं जिन्होंने अपने शानदार खेल से पूरी दुनिया को हैरान कर दिया था। मेजर ध्यानचंद को हॉकी का जादूगर कहा जाता है। हॉकी की स्टिक से वे ऐसे कमाल दिखाया करते थे कि उनका खेल देखने वाला देखता ही रह जाता था।

1979 में आज ही के दिन हॉकी के इस जादूगर का निधन हुआ था। मेजर ध्यानचंद के शानदार खेल की बदौलत भारत ने तीन बार लगातार 1928, 1932 और 1936 में हॉकी का ओलंपिक गोल्ड मेडल जीतने में कामयाबी हासिल की थी। उनके दौर को भारतीय हाकी का स्वर्ण काल कहा जाता है।

इस कारण नहीं हो सकी ज्यादा पढ़ाई-लिखाई

मेजर ध्यानचंद का जन्म 1905 में 29 अगस्त को इलाहाबाद में हुआ था। बाद में उनका परिवार झांसी रहने लगा था। ध्यानचंद के पिता का नाम कामेश्वर सिंह था और वे आर्मी में थे। उनके पिता का हमेशा तबादला होता रहता था और इस कारण ध्यानचंद की ज्यादा पढ़ाई लिखाई नहीं हो सकी। वे केवल छठवीं कक्षा तक ही पढ़े थे।

आर्मी में भर्ती होने के बाद हॉकी में दिलचस्पी

बचपन के दिनों में ध्यानचंद को पहलवानी पसंद थी और 16 वर्ष की आयु में वे आर्मी में भर्ती हो गए। इसके बाद उन्होंने हॉकी खेलना शुरू किया। ध्यानचंद को हॉकी का ऐसा जुनून था कि वे काफी देर तक प्रैक्टिस किया करते थे। कहा जाता है कि वे चांद निकलने तक हॉकी का अभ्यास करते रहते थे और इसी वजह से उनके साथी खिलाड़ी उन्हें चांद कहकर पुकारा करते थे।

बॉल पर होता था गजब का नियंत्रण

हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद बॉल पर नियंत्रण रखने की कला में महारथी थे। खेल के दौरान बॉल हमेशा उनकी हॉकी स्टिक के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती थी और इसी कारण समय कहा जाता था कि उनकी स्टिक में ऐसा चुंबक लगा है कि गेंद हमेशा उसी में चिपकी रहती है।

भारत को ओलंपिक में तीन गोल्ड मेडल जिताने के बाद उन्होंने 1948 में हॉकी से रिटायरमेंट लेने की घोषणा की थी। विश्व युद्ध के कारण 1940 और 1944 के ओलंपिक खेल नहीं हो सके थे।

लोगों का कहना था कि अगर ये खेल हुए होते तो ध्यानचंद के शानदार खेल की बदौलत इन दो ओलंपिक के दौरान भी भारत ही चैंपियन बनता।

भारत रत्न देने की उठ चुकी है मांग

केंद्र सरकार की ओर से उन्हें 1956 में पद्मभूषण देने की घोषणा की गई थी। हालांकि बाद के दिनों में लगातार उन्हें भारत रत्न देने की मांग भी उठती रही मगर अभी तक भारत सरकार की ओर से इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है। सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न दिए जाने के बाद इस मांग ने काफी जोर पकड़ा था मगर अभी तक यह मांग पूरी नहीं हो सकी है।

उनके जन्म दिवस 29 अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है और इस दिन राष्ट्रपति की ओर से खिलाड़ियों व कोच को राजीव गांधी खेल रत्न अवॉर्ड, अर्जुन अवॉर्ड और द्रोणाचार्य अवार्ड से सम्मानित किया जाता है।

बर्लिन में हॉकी स्टिक देखने के लिए जुटी भीड़

1936 के बर्लिन ओलंपिक के दौरान भारत के पहले मैच के बाद ध्यानचंद की हॉकी स्टिक देखने के लिए मैदान पर लोगों की काफी भीड़ जुट गई थी। तब जर्मनी के अखबार ने खबर प्रकाशित की थी जिसकी हेडिंग थी- ओलंपिक कैंपस में अब एक जादू का शो है।

अगले दिन बर्लिन की दीवारों पर पोस्टर लग गए जिन पर लिखा हुआ था- हॉकी स्टेडियम जाओ और भारतीय जादूगर का जादू देखो।

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ठुकरा दिया था हिटलर का प्रस्ताव

जर्मनी के खिलाफ ध्यानचंद का खेल देखकर एक बार हिटलर इतना ज्यादा प्रभावित हो गए थे कि उन्होंने ध्यानचंद के सामने इस बात का प्रस्ताव रखा था कि वह जर्मनी में ही बस जाएं।

हिटलर ने ध्यानचंद को सेना में कर्नल का रैंक देने का भी प्रस्ताव रखा था मगर ध्यानचंद को अपने देश से प्यार था और उन्होंने मुस्कुराते हुए हिटलर के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था।

भाई के साथ दिखाया शानदार खेल

1932 के ओलंपिक खेलों में भारत ने अमेरिका को 24-1 और जापान को 11-2 से हराया था। भारत की ओर से किए गए 35 गोलों में से 12 गोल ध्यानचंद ने किए थे जबकि उनके भाई रूप सिंह ने 13 गोल किए थे। इस ओलंपिक खेल के बाद दोनों भाइयों को हॉकी ट्विंस तक कहा जाने लगा था

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डॉन ब्रेडमैन ने कही थी ये बात

जब 1935 में भारत की हॉकी टीम ऑस्ट्रेलिया गई थी तब ध्यानचंद की मुलाकात क्रिकेट के महानतम खिलाड़ी डॉन ब्रेडमैन से भी हुई थी। मेजर ध्यानचंद का खेल देखने के बाद डॉन ब्रेडमैन ने कहा था कि वे हॉकी से उसी तरह गोल करते हैं जैसे क्रिकेट में रन बनाए जाते हैं।

विपक्षी टीम को हमेशा ध्यानचंद के शानदार खेल का डर सताए रहता था। नीदरलैंड में ध्यानचंद की हॉकी स्टिक के अंदर चुंबक होने की संभावना जताई गई थी। इसी कारण अधिकारियों ने ध्यानचंद की हॉकी स्टिक को तोड़ दिया था मगर उसके बावजूद ध्यानचंद ने शानदार खेल दिखाते हुए सबका दिल जीत लिया था।

अंशुमान तिवारी

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