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जब अफ्रीका में चली थी आज़ादी की लहर

1960 के घटनाक्रम दूसरे विश्व युद्ध के बाद के लंबे प्रोसेस का नतीजा था। विश्व युद्ध के बाद अफ्रीकी देशों में स्वतन्त्रता आंदोलनों का सिलसिला शुरू हुआ।

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NewstrackBy Newstrack

Published on 12 July 2020 12:47 PM GMT

जब अफ्रीका में चली थी आज़ादी की लहर
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नीलमणि लाल

लखनऊ: आज से 60 साल पहले यानी वर्ष 1960 में अफ्रीका में आज़ादी की लहर चली थी। इस लहर में जनवरी से दिसंबर 1960 के बीच 17 देशों ने यूरोपियन औपनिवेशिक ताकतों से आज़ादी पायी थी। इन 17 देशों में से 14 पूर्व फ्रेंच कॉलोनी थीं।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अफ्रीकी देशों में स्वतन्त्रता आंदोलनों का सिलसिला हुआ शुरू

1960 के घटनाक्रम दरअसल दूसरे विश्व युद्ध की उथलपुथल के बाद के लंबे प्रोसेस का नतीजा था। विश्व युद्ध के बाद अफ्रीकी देशों में स्वतन्त्रता आंदोलनों का सिलसिला शुरू हो गया। जनता औपनिवेशिक ताकतों को याद दिला रही कि अफ्रीकियों से युद्ध में समर्थन के बदले में किए गए वादों को अब पूरा किया जाए। युद्ध से फ्रांस, ब्रिटेन आदि देश पस्त हो चुके थे और अमेरिका का दबाव भी था सो यूरोपियन देशों ने अपने साम्राज्य को समेटना शुरू कर दिया।

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1944 में कोंगो की राजधानी ब्राजाविले में फ्रांस के जनरल चार्ल्स डि गौल ने सुझाव दिया था कि फ्रांस के लिए अब वो समय आ गया कि तह नए युग के रास्ते पर चलना शुरू करे। दो साल बाद फ्रांस का औपनिवेशिक साम्राज्य समाप्त हो गया और फ्रेंच यूनियन का जन्म हुआ। आगे चल कर 1958 में ये फ्रेंच कम्यूनिटी नाम से जाना गया। इसके बाद एक के बाद एक, मोरक्को, टूनीसिया, घाना और गिनी आज़ाद हो गए। जबकि अल्जीरिया में आंतरिक संघर्ष जारी रहा जिनसे फ्रांस को थका डाला और उसकी प्रतिष्ठा को काफी नुकसान पहुंचाया।

कैमरुन- 1 जनवरी 1960

कैमरुन एक पूर्व जर्मन कॉलोनी था जो 1918 में फ्रांस और यूनाइटेड किंग्डम के बीच आधा-आधा बंट गया। कैमरुन को आज़ादी सस्ते में नहीं मिली। बल्कि इसके लिए यहां सशस्त्र संघर्ष चला। 1 जनवरी 1960 को फ्रेंच कैमरुन ने फ्रांस से आज़ादी पायी और 5 मई 1960 को अहमदौ अहिडजो देश के पहले प्रेसिडेंट चुने गए। 1 अक्तूबर 1961 को ब्रिटिश कब्जे वाले दक्षिण कैमरुन ने आज़ादी हासिल की। इसके बाद दोनों हिस्सों का विलय हो गया।

टोगो- 27 अप्रैल 1960

टोगो 1905 से जर्मन उपनिवेश या कॉलोनी था। पहले विश्व युद्ध के बाद ये फ्रेंच और ब्रिटिश ताकतों के अधीन आ गया। 1956 में एक जनमत संग्रह के तहत फ्रांस के कब्जे वाला टोगो एक स्वायत्त्शासी घोषित कर दिया गया। दो साल बाद फरवरी 1958 में यहाँ हुये असेंबली के चुनाव में टोगोलीज़ यूनिटी कमेटी द्वारा विजय हासिल करने के बाद पूर्ण स्वतन्त्रता का रास्ता खुल गया।

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27 अप्रैल 1960 को टोगोलीज़ रिपब्लिक एक आज़ाद मुल्क घोषित कर दिया गया। सिल्वानस ओलिंपिओ देश के पहले चुनाव में 100 फीसदी वोट पा कर प्रेसिडेंट बने। उधर ब्रिटेन के कब्जे वाले पश्चिमी टोगो ने घाना में विलय करने का फैसला किया।

मैडागास्कर- 26 जून 1960

फ़्रांस ने 1883 में इस देश में जड़ें जमाना शुरू किया था। कई हमलों के बाद 1896 में फ्रांस ने इसे अपने अधीन कर लिया। 1946 तक यही स्थिति रही। 1947 में मैडागास्कर में आज़ादी का संघर्ष शुरू हुआ।

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1956 में फ्रांस ने तमाम सुधार लागू किए और 14 अक्तूबर 1958 को मैडागास्कर फ्रांस के अंतर्गत एक स्वायत्तशासी क्षेत्र घोषित किया गया। 1959 में यहाँ संविधान लागू किया गया और 26 जून 1960 को अंततः मैडागास्कर एक आज़ाद देश घोषित कर दिया गया।

डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कोंगो - 30 जून 1960

जो क्षेत्र आज कोंगो के नाम से जाना जाता है वह उसके बारे में प्रमाण मिले हैं कि वह 90 हजार वर्ष पूर्व भी आबाद था। 1870 से बेल्जियम की राजा द्वारा यहां खोजी दल भेजे गए और 1885 में राजा लिओपोल्ड ने इस क्षेत्र को अपनी निजी संपत्ति घोषित कर दिया। उसने अपने नाम से यहां राजधानी बसाई जिसे लिओपोल्डविले के नाम से जाना गया। आज इसका नाम किंशासा है। लिओपोल्ड ने यहां बहुत जुल्म ढाए और नतीजनत आधी आबादी मार डाली गई।

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1908 में अंतर्राष्ट्रीय, खासकर ब्रिटेन के दबाव में बेल्जियन संसद ने राजा लिओपोल्ड से कोंगो को अपने अधीन कर लिया। विश्व युद्धों में कोंगो ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और इसके इनाम स्वरूप कोंगो आज़ादी के रास्ते पर चल निकला। जनवरी 1959 में यहाँ बड़े पैमाने पर दंगे भड़क उठे। इसके बाद बेल्जियम ने यहाँ से अपना कब्जा खत्म करने का फैसला किया। 24 जून 1960 को अंततः कोंगो आज़ाद देश घोषित कर दिया गया। 1971 में इस देश का नाम जाइरे कर दिया गया था लेकिन 1997 में फिर इसे कोंगो नाम दे दिया गया।

सोमालिया- 1 जुलाई 1960

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सोमालिया एक समय में इटली का उपनिवेश था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन ने इटली के कब्जे वाले सोमालिया को भी अपने कब्जे में ले लिया। 1960 में सोमालिया के दोनों हिस्से एक में मिला लिए गए और सोमाली रिपब्लिक की स्थापना कर दी गई।

बेनिन- 1 अगस्त 1960

इस पश्चिमी अफ्रीकी देश का नाम पहले दहोमी साम्राज्य था। 1472 में पुर्तगाली व्यापारियों के साथ किए गए व्यपराइल करार के तहत यहाँ गुलामों का व्यापार बड़े पैमाने पर फला फूला। अनुमान है कि 1750 के दशक में दहोमी का राजा हर साल ढाई लाख पाउंड गुलाम व्यापार से कमाता था। 1892 में फ्रांस ने यहाँ की सत्ता पर अपना कंट्रोल कर लिया था। 1958 में फ्रांस ने दहोमी रिपब्लिक को स्वायत्ता दे दी और 1 अगस्त 1960 को इसे आज़ाद घोषित कर दिया गया।

नाइजर- 3 अगस्त 1960

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1899 से नाइजर फ्रांस का उपनिवेश था। विश्व युद्ध के बाद फ्रांस ने अपनी कॉलोनियों को धीरे धीरे छोड़ना शुरू कर दिया और 1958 में यहां जनमत संग्रह कराया गया जिसमें हमनी दियोरी को देश का पहला प्रेसिडेंट चुना गया। 18 दिसंबर को रिपब्लिक ऑफ नाइज़र की स्थापना की घोषणा की गयी। लेकिन पूर्ण आज़ादी मिली 3 अगस्त 1960 को।

बुर्किना फासो- 5 अगस्त 1960

1890 से ब्रिटिश, फ्रेंच और जर्मन सेनाओं ने इस क्षेत्र को अपने कब्जे में लेने की कोशिशें शुरू कर दी थीं। अंततः 1896 में ये क्षेत्र फ्रांस का उपनिवेश हो गया। 1915 से यहाँ आज़ादी के शस्त्र आंदोलन शुरू हो गए।

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11 दिसंबर 1958 को रिपब्लिक ऑफ अपर वोल्टा की स्थापना की गई लेकिन पूरी आज़ादी 5 अगस्त 1960 को ही मिल पायी। थॉमस संकारा जब प्रेसिडेंट बने तब 1984 में इसका नाम बुर्किना फासो कर दिया गया।

आइवरी कोस्ट- 7 अगस्त 1960

1880 में फ्रांस ने आइवरी कोस्ट के तटीय इलाकों पर कब्जा जमा लिया था। 1889 में ब्रिटेन ने यहाँ फ्रांस की सत्ता स्वीकार कर ली थी। 1893 में आएवरी कोस्ट पूरी तरह फ्रांस के अधीन हो गया। 1958 के जनमत संग्रह के बाद आइवरी कोस्ट को एक स्वायत्तशासी क्षेत्रा बना दिया गया। जून 1960 में आइवरी कोस्ट को पूर्ण स्वतन्त्रता दे दी गई।

चाड- 11 अगस्त 1960

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1920 में फ्रांस ने चाड पर पूर्ण नियंत्रण कर लिया था। विश्व युद्ध के बाद फ्रांस ने चाड पर अपनी पकड़ ढीली की और कई प्रशासनिक सुधार लागू किए। 11 अगस्त 1960 को चाड को पूर्ण स्वतन्त्रता दे दे गई।

सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक- 13 अगस्त 1960

1894 से उबांगी चारी फ्रांस के कंट्रोल में था। 1928 में यहाँ विद्रोह की चिंगारी भड़की जो आगे चल कर देश की आज़ादी का सबब बनी। 1 दिसंबर 1958 को इसे सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक का नाम दिया गया। 13 अगस्त 1960 को इसे आज़ाद घोषित कर दिया गया।

गबोन- 17 अगस्त 1960

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1910 में गबोन फ्रांस के अधीन आ गया था। ये व्यवस्था 1959 तक चली। दूसरे विश्व युद्ध में यहाँ भी लड़ाई लड़ी गई। 17 अगस्त 1960 को गबोन भी फ्रांस के चंगुल से मुक्त हो गया।

सेनेगल- 20 अगस्त

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1677 से ही फ्रांस ने यहाँ जड़ें जमाना शुरू कर दिया था। 1914 के बास से यहाँ फ्रेंच शासन के खिलाफ आंदोलन शुरू हुये। 4 अप्रैल 1959 को सेनेगल और फ्रेंच सूडान के विलय के बाद माली फेडरेशन का जन्म हुआ। 20 जून 1960 को माली फेडरेशन स्वतंत्र घोषित कर दिया गया। 20 अगस्त 1960 को फेडरेशन टूट गया और सेनेगल का जन्म हुआ।

नाइजीरिया- 1 अक्तूबर 1960

1851 से ब्रिटेन ने नाइजीरिया में कब्जे की शुरुआत कर दी थी। विश्व युद्ध के बाद नाइजीरिया में आज़ादी की मांग ने जोर पकड़ा और अंततः 1 अक्तूबर 1960 को नाइजीरिया आज़ाद घोषित हुआ।

मौरिटानिया- 28 नवंबर 1960

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19वीं सदी में फ्रांस ने इस क्षेत्र पर आधिपत्य जमा लिया था। 1920 में ये फ्रनसे का पूर्ण उपनिवेश घोषित हो चुका था। जब फ्रांस ने यहाँ से हटने का फैसला किया तब मोरक्को और अरब लीग ने इस क्षेत्र पर अपना दावा ठोंक दिया। लेकिन 28 नवंबर 1960 को मौरिटानिया आज़ाद देश घोषित कर दिया गया।

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