इमरजेंसी

प्रधानमंत्री ने टाइम्स ऑफ़ इण्डिया के चेयरमैन अशोक जैन को खुद आदेश दिया कि काबीना के इस निर्णय के तहत पिताजी को सवेतन वापस लिया जाय। अतः टाइम्स ऑफ़ इण्डिया जो आम तौर पर भारत के श्रम कानून की खिल्ली उड़ाता रहता है, को मानना पड़ा। वह केन्द्रीय सरकार के निर्णय की अवहेलना करने से सहमा और तब पिताजी लखनऊ में संवाददाता के रूप में कार्यरत हो गये (फरवरी 1978)। हमारें परिवार की यह गाथा है।

उनको ये बात खराब लगने की वजह यह थी कि देश के विभाजन के बाद आए शरणार्थियों को उनहोंने पं. जवाहर लाल नेहरू के विरोध को दरकिनार कर हरिद्वार में बसाया था। देश की आजादी से पहले क्रांति की अलख जगाने में जुटे रहने के कारण घर की तमाम बार कुर्की हुई। अनगिनत बार जेल गए।