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दिवाली में ज्यादातर लोग बाहर ना जाकर घर में रहकर लक्ष्मी का स्वागत करते हैं।क्योंकि दिवाली पूरे परिवार के साथ मनाना एक अच्छा लगता हैं। लेकिन अग अपने परिवार के साथ ही ऐसी जगह पर जाए जहां का दिवाली सेलेब्रेशन बहुत ख़ास होता हैं और सभी को पसंद है तो घूमने वालों के लिए दिवाली का समय भी भक्तिमय व यादगार बनेगा।

हर साल की तरह इस साल भी दीपावली को लेकर लोगों में उत्साह बरकरार है। घ का साज-सजा से लेकर तरह तरह के नए-नए समान खरीदने की तैयारी हर कोई कर लेता है। दिवाली से पहले धनतेरस मनाया जाता है, परंपरा के अनुसार इस दिन घर के जरूरी सामानों की खरीद करते हैं। धन तेरस के दिन नए बर्तन या कोई भी नयी वस्तु आदि की खरीददारी कर घर लाना फलदायक है। 

हर व्यक्ति के जीवन में उसकी नाक का बहुत महत्व है। चाहे जो हो जाए लोगो अपनी नाक की साख बचाने के लिए कोई भी कदम उठा लेते हैं। जैसे इंसान के हाथ की लकीरों से उसके बारे में जानते है। उसी तरह नाक की बनावट से इंसान का स्वभाव जानते हैं। सामुद्रिक शास्त्र में शारीरिक संरचना से उनके स्वभाव से जुड़ी जानकारी पता चलता हैं।  

दीपों का त्योहार दीवाली  अंधकार को दूर करता है। और प्रकाश की तरफ ले जाता है। इस दिन सभी ओर दीपों की रोशनी  जगमगाती रहती है। कहते है कि जब रामचंद्र जी लंका पर विजय पाकर और 14 वर्ष का वनवास काट कर अयोध्या लौटे तो उस दिन पूरे नगर में दीप जलाए गए थे।

मां दुर्गा की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघंटा है। मां चंद्रघंटा 9 रूपों में से एक है। ये तीसरा स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र बना हुआ है। इसी कारण से इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है। नवरात्रि का तीसरा दिन अत्यधिक महत्व का माना जाता है।

वार सोमवार माह आश्विन, तिथि नवमी – 18:39:17 तक पक्ष कृष्ण, नक्षत्र आर्द्रा, सूर्योदय 06:09, सूर्यास्त 18:17,राहुकाल 07:40:38 से 09:11:35 । आज मातृ नवमी है इस दिन  माताओं व किसी भी मृत महिला का श्राद्ध  किया जाता है।

अभी पितृपक्ष चल रहा है । इसमें श्राद्ध कर्म किए जाते है । लेकिन किसी कारणवश किसी ने अब तक श्राद्ध के नियमों का पालन नहीं किया है तो उसके लिए आश्विन माह में कृष्ण पक्ष एकादशी है इस दिन व्रत कर नियम का पालन करें ते पितरों को मुक्ति मिलती है। इसे इंदिरा एकादशी कहते हैं।

जब हमारे अपने हमारा साथ छोड़कर चले जाते है तो हमें उनकी कमी हमेशा खलती है। कोई चाहकर भी इस कमी को पूरा नहीं कर पाता है। 15 दिनों के पितृपक्ष में हम खुद को अपने पूर्वजों के निकट पाते है वो दूर रहकर भी आत्मा से हमसे जुड़ जाते है।

बच्चे जिद्दी और गुस्सैल स्वभाव के आजकल होते जा रहे हैं। जिसके कारण माता-पिता को काफी मानसिक और आर्थिक परेशानियों का सामना भी करना पड़ता है। शास्त्रों के ज्ञाता मानते हैं कि इस समस्या का समाधान संकट मोचक भगवान हनुमान की आराधना से संभव हो सकता है।

श्रृंगार में  महिलाओं को पहली पसंद ज्वेलरी होती है। सोने व चांदी की ज्वेलरी अधिकतर महिलाओं के पास देखने को मिल जाएगी। शादी के बाद सोलह श्रृंगार सोने की ज्वेलरी पहनना हर औरत की पहली पंसद होती है।