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जलवायु परिवर्तन का असर अब धरती पर दिखाई देने लगा है। प्राकृतिक आपातकाल जारी है और हमारी धरती बड़े खतरे में हैं। क्योंकि आर्कटिक में मौजूद सबसे पुराना और सबसे स्थिर आइसबर्ग तेजी से पिघल रहा है। 130 देशों के 11 हजार वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है।

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि भारतीय स्पेस स्टेशन में 15-20 दिन के लिए कुछ अंतरिक्ष यात्रियों के ठहरने की व्यवस्था होगी। अगर इसरो 5 से 7 साल में अपना स्पेस स्टेशन बना लेगा तो वह दुनिया का चौथा देश होगा, जिसका खुद का स्पेस स्टेशन होगा। इससे पहले रूस, अमेरिका और चीन अपना स्पेस स्टेशन बना चुके हैं।

दरअसल, नासा के लूनर रिकॉनिसंस ऑर्बिटर (एलआरओ) अंतरिक्षयान ने 17 सितंबर को चंद्रमा के अनछुए दक्षिणी ध्रुव के पास से गुजरने के दौरान उस जगह की कई तस्वीरें अपने कैमरा मे कैद की है, जहां विक्रम ने सॉफ्ट लैंडिग के जरिए उतरने का प्रयास किया था लेकिन एलआरओसी की टीम लैंडर के

पहली बार विश्व ओजोन दिवस साल 1995 में मनाया गया था। यह दिवस जनता के बारे में पर्यावरण के महत्व तथा इसे सुरक्षित रखने के अहम साधनों के बारे में शिक्षित करता है। इसे मनाने का उद्देश्य धरती पर ओजोन की परत का संरक्षण करना है।

क्या तेजी से चांद से टकराने की वजह से लैंडर को कोई नुकसान पहुंचा है, इस सवाल पर सिवन ने कहा है कि वे अभी इस बात को नहीं जानते हैं। प्रयास किया जा रहा है कि जल्द ही इसका पता चले।

इस कविता को आपने बचपन में सुना ही होगा, कभी छोटे बच्चों के मामा, कभी इश्क में महबूबा का चांद बना, कभी चलनी से चांद का दिदार हुआ, कभी ईद के चांद की बेसब्री....... आखिर चांद है क्या...

पहले ही इस बात की आशंका जताई जा रही थी कि लैंडर विक्रम के चांद की सहत पर पहुंचे से पहले के 15 मिनट काफी अहम होंगे। बता दें कि इसरो चंद्रयान-2 चांद का धरती से महज 2.1 किलोमीटर की दूरी पर आकर अपना रास्ता भटक गया। 

'मिशन का सिर्फ पांच प्रतिशत -लैंडर विक्रम और प्रज्ञान रोवर- नुकसान हुआ है, जबकि बाकी 95 प्रतिशत -चंद्रयान-2 ऑर्बिटर- अभी भी चंद्रमा का सफलतापूर्वक चक्कर काट रहा है।'

आज हम बात करते हैं चंद्रमा की, क्या आप को मालूम है चांद की धरती में छिपा हो सकता है ढेर सारा खज़ाना! यह बात अभी तक रहस्य बनी हुई है। क्या इसी लिए सभी चांद पर जाने की तैयारी कर रहे हैं, क्या अभी भी वहां समुद्र मंथन के प्राप्त मूल्यवान धातु या खज़ाना मौजूद है?

आप सभी जानते होंगे कि अमेरिका की नासा ने 16 जुलाई, 1969 को मिशन 'अपोलो 11’ के तहत चंद्रमा पर पहली बार नील आर्मस्ट्रांग और एडविन एल्ड्रिन को भेजा गया था। जब इंसान ने चांद पर कदम रखा, तो इस कामयाबी के संदर्भ में पृथ्वी के सभी देश काफी खुश नजर आये।