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इस वक्त पूरा देश कोरोना वायरस की महामारी के मुश्किल वक्त से गुजर रहा है। इस बीच बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन ने कोरोना वॉरियर्स और इंसानियत को एक कविता समर्पित की है।

देश में कोरोना वायरस के मामले बढ़ते जा रहे हैं। इससे निपटने के लिए देशव्यापी लॉकडाउन किया गया है जिसकी दोहरी मार सबसे ज्यादा पुलिसकर्मियों पर पड़ी है।

भारत में अब तक 74 कोरोना के मरीजों की पुष्टि हो चुकी है। इसके अलावा कोरोना वायरस के एक मरीज की मौत भी हो चुकी है। मृतक कर्नाटक का रहने वाला था और उसकी उम्र 76 साल थी। बॉलीवुड में भी कोरोना का असर देखने को मिलने लगा है। अधिकतर फिल्मों की रिलीज डेट कैंसिल हो गई है। लोग सिनेमाघरों से दूरी बना लिए है।

ये चंद लाइन नारी के संपूर्णता को तो बयां कर देते है, लेकिन इससे नारी के पूरे अस्तित्व को नहीं आंका जा सकता है। किसी भी पुरुष की जिंदगी में पत्नी, बिटिया और मां से ज्यादा खूबसूरत और अहम महिला नहीं हो सकती, क्योंकि वो ना सिर्फ उसकी सारी जरूरतें पूरी करती हैं, बल्कि किसी भी हाल में उनका साथ नहीं छोड़ती। कहते भी है है कि पुरुष की सफलता के पीछे कोई न कोई महिला जरुर होती है।

बजट भाषण के दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक कविता से मोदी सरकार की तुलना की और सरकार काम गिनाए जिसपर हंगामा मच गया। निर्मला सीतारमण की कविता पर विपक्षलाल हो गया और सदन में हंगामा होने लगा।

लखनऊ: सोशल मीडिया पर एक कविता काफी तेजी से वायरल हो रही है। इस कविता को लोग काफी पसंद कर रहे हैं। मगर किसी को भी ये नहीं मालूम कि इसको लिखा किसने हैं। सबसे पहले उस कविता पर नजर डालते हैं, जिसने सोशल मीडिया पर काफी धूम मचा रखी है। यह भी पढ़ें: संन्यास लेने …

नकली था हिटलर सा दिखने वाला स्वभाव, पापा मेरे संग बच्चे थे, मम्मी से भी मेरे पापा अच्छे हैं, पापा आप बहुत सच्चे हैं।।

ये बचपन भी थोड़ा अजीब है कंधों पर किताबों का नहीं जीवन का बोझ है। ना कोई उल्लास है ना कोई रोमांच है, आंखों में नींद नहीं, पेट में अजब सी आग है हाथों में खिलौने हैं ना आंखों में खेलने  की ललक इन्हें तो अपने समान ही बच्चों को खिलाने का काम है। बाल …

रात भर जाग कर ख्वाहिशें लिख रहे हैं… रात भर जाग कर, ख्वाहिशें लिख रहे हैं, जाने किस ख्याल में, क्या और कैसे लिख रहे हैं! जैसे आसमान पर जमीन की दास्ताँ, और जमींन पर आसमान की, सरहदें लिख रहे हैं! नींद की गोद में, सिर रख कर जाग रहीं हैं आँखें, उनपर ख्वाब की …

मुद्दतें हुईं खिडक़ी से बाहर झांके। अब तो लोग ही मुझे बारिश की खबर देते हैं। मैं तो भीतर ही भीतर भीगती रहती हूँ तुम संग, तुम्हारी रंगीन यादों में। बन्द रखती हूं अक्सर खिडक़ी दरवाजेे। तुम्हारी यादों से लबरेज, कब कौन सा लम्हा, इन दीवारों की गिरफ्त से निकल भागे। कितना सम्भाल कर रक्खा …