इस देश में भी है अयोध्या और सरयू नदी, जानिए इसका इतिहास

भारत में अयोध्या हैं ये तो सभी को पता है। दक्षिण पूर्व एशिया स्थित देश थाईलैंड भी प्रभु श्रीराम के जीवन से प्रेरित है। थाईलैंड के प्रमुख पर्यटन स्थलों में आता है प्राचीन शहर अयोध्या। अयोध्या इतिहास में स्याम राज्य की राजधानी के तौर पर किया गया है।

Published by suman Published: August 4, 2020 | 7:34 pm
Modified: August 4, 2020 | 7:43 pm

लखनऊ : भारत में अयोध्या हैं ये तो सभी को पता है। दक्षिण पूर्व एशिया स्थित देश थाईलैंड भी प्रभु श्रीराम के जीवन से प्रेरित है। थाईलैंड के प्रमुख पर्यटन स्थलों में आता है प्राचीन शहर अयोध्या। अयोध्या इतिहास में स्याम राज्य की राजधानी के तौर पर किया गया है। अयोध्या नगरी की स्थापना एवं इसके इतिहास में यहां के आस-पड़ोस की जगहों का काफी महत्व और योगदान है। छोप्रया, पालाक एवं लोबपुरी नदियों के संगम पर बसा द्वीपनुमा शहर अयोध्या व्यापार, संस्कृति के साथ-साथ आध्यात्मिक अवधारणाओं का भी गढ़ रहा है। पीएम नरेंद्र मोदी राम मंदिर का भूमि पूजन कल  करेंगे।

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  थाइलैंड की अयोध्या 

इस बीच  थाइलैंड की अयोध्या  का जिक्र हो रहा है। अयोध्या का मतलब है अपराजय। अयोध्या से इस शहर का नाम जोडऩे की वजह यह  है कि ईसा पूर्व द्वितीय सदी में इस क्षेत्र में हिंदुओं का वर्चस्व काफी ज्यादा था। पुरुषोत्तम राम के जीवन चरित पर भारत में भगवान वाल्मीकि द्वारा लिखी गई रामायण थाईलैंड में महाकाव्य के रूप में प्रचलित है। लिखित साक्ष्यों के आधार पर माना गया है कि इसे दक्षिण एशिया में पहुंचाने वाले भारतीय तमिल व्यापारी और विद्वान थे। पहली सदी के अंत तक रामायण थाईलैंड के लोगों तक पहुंच चुकी थी। वर्ष 1360 में राजा रमाथीबोधी ने तर्वदा बौद्ध धर्म को अयोध्या शहर का शासकीय धर्म बना दिया था, जिसे मानना नागरिकों के लिए अनिवार्य था लेकिन फिर इसी राजा को हिन्दू धर्म का प्राचीन दस्तावेज  ही लगा, जिससे प्रभावित होकर इसने हिन्दू धर्म को ही यहां का आधिकारिक धर्म बना दिया, जो अब से एक शताब्दी पहले तक वैध था।  15वीं सदी में थाइलैंड की राजधानी ‘अयुत्थया’ शहर था, जो स्थानीय भाषा में अयोध्या का समानार्थी है बाद में बर्मीज सेना के आक्रमण के दौरान पूरा शहर तबाह हो गया, साथ ही मंदिर की मूर्तियां भी नष्ट कर दी गई थीं।

चक्री वंश

दक्षिण पूर्व एशिया के देश थाइलैंड में एक वक्त पर राम का ही राज था। माना जाता है कि वहां चक्री वंश के पहले राजा की उपाधि ही राम प्रथम थी। थाईलैंड में आज भी यही राजवंश है। जब बर्मा की सेना यहां से चली गई तो देश में अपनी सांस्कृतिक जड़ों को खोजने की मुहिम चली। इसी दौरान रामायण को यहां दोबारा प्रतिष्ठा मिलनी शुरू हुई।

रामायण का जो संस्करण आज यहां प्रचलित है वो राम प्रथम के संरक्षण में रामलीला के रूप में 1797 से 1807 के बीच विकसित हुआ था। राम प्रथम ने इसके कुछ अंशों को दोबारा लिखा भी है। महाकाव्य राम कियेन में ये बातें कही गई हैं, जो स्थानीय भाषा में रामायण का ही नाम है।थाईलैंड में राजा सहित तकरीबन पूरी आबादी रामकेईन के 18वीं शताब्दी में अस्तित्व में आए संस्करण को राष्ट्रीय ग्रंथ की तरह मानती है।

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शहर का पुर्ननिर्माण

थाईलैंड में लोकतंत्र की स्थापना 1932 में हुई थी। इसके बाद 1976 में थाईलैंड की सरकार ने इस शहर के पुर्ननिर्माण पर ध्‍यान दिया।यहां के जंगलों को साफ कर शहर में मौजूद अवशेषों की मरम्‍मत कराई गई। शहर के बीचों-बीच एक प्राचीन पार्क मौजूद है।इसमें बिना शिखर वाले खंभे, दीवारें, सीढ़ियां और बुद्ध की सिरकटी प्रतिमा मौजूद है।इस पार्क में एक बुद्ध का सैंडस्‍टोन का बना सिर पीपल के वृक्ष की जड़ों में जकड़ा हुआ है। यह पेड़ अयोध्‍या में वट महाथाट यानी 14वीं शताब्‍दी के प्राचीन साम्राज्‍य के स्‍मृति चिह्नों वाले मंदिरों के अवशेषों में मौजूद है।

 

साल 2018 में थाईलैंड में एक भव्‍य राम मंदिर का निर्माण करने की घोषणा की। इसकी शुरुआत भी हो चुकी है। यह राममंदिर शहर के किनारे प्रसिद्ध सोराय नदी (भारत में अयोध्‍या की सरयू नदी के किनारे बसी हुई है) के तट पर बनाया जा रहा है। बता दें कि थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक को महेंद्र अयोध्या भी कहते है।लोगों का मानना है कि यह इंद्र की बनाई महान अयोध्या है।

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इस तरह हो रही इसकी दशा

अयोध्या का सबसे महत्वपूर्ण भवन है तीन छेदी, जिसमें तीन राजाओं की खाक मिली है। यह जगह खास लोगों को समर्पित की गई है। यहां पूजा-अर्चना की जाती थी और समारोह आयोजित होते थे। विहार फ्रा मोंग खोन बोफिट एक बड़ा प्रार्थना स्थल है। यहां बुद्ध की एक बड़ी प्रतिमा है। यह पहले 1538 में बनाई गई थी लेकिन बर्मा द्वारा अयोध्या पर चढ़ाई के दौरान नष्ट हो गई थी। यह प्रतिमा पहले सभागार के बाहर हुआ करती थी, बाद में इसे विहार के अंदर स्थापित किया गया। जब विहार की छत टूट गई, तब एक बार फिर प्रतिमा को काफी नुक्सान पहुंचा और राजा राम षष्ठम ने लगभग 200 वर्षों बाद इसे वहां से हटवा कर संग्रहालय में रखवा दिया। 1957 में फाइन आट्रस विभाग ने पुराने विहार को फिर से बनवाया और सुनहरे पत्तों से ढंक कर बुद्ध की प्रतिमा को फिर से पुरानी जगह पर रखवाया। फ्रा भेदी सी सूर्योथाई स्मारक रानी सूर्योथाई के सम्मान में बनवाया गया था।

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