आज मिला था बर्फ का देश ; जिसकी खूबसूरती की दुनिया है कायल

अचानक दूर-बहुत दूर तक भूरी सी पहाड़ी नजर आयी। ऊपर मस्तूल पर बैठे ग्लाबिनों ने चीख-चीख कर यह जानकारी दी। वह अब भी हाथ हिला- हिलाकर नाच रहा था कि वास्तव में धरती के आखिरी छोर पर पहुँच गए हैं। मौत के चंगुल में पहुँच चुके सभी लोगों के लिये यह एक नया जीवन था, परम आनंद की अनुभूति का क्षण था।

रामकृष्ण वाजपेयी

क्या आप जानते हैं कि आज ही के दिन लगभग 200 साल पहले समुद्र में भटक गए एक जहाज नाविक ने सबसे पहले बर्फ का देश खोज निकाला था। उस समय इसे दुनिया का अंत मान लिया गया था। दम तोड़ने के करीब पहुंच चुके जहाज पर सवार सभी लोगों में इस खोज ने नए जीवन का संचार कर दिया था और वह इस खोज से मस्त होकर नाचने लगे थे।

बर्फ का देश यानी अंटार्कटिका की खोज मूल रूप से एक अंग्रेज नाविक विलियम्स स्मिथ ने 16 फरवरी 1820 मंथ की थी। इस जगह की खूबसूरती से अभिभूत स्मिथ ने तत्काल अपनी डायरी में लिखा, ‘‘सब कुछ आश्चर्यजनक रूप से शांत था, न हवा थी, न ही समुद्र में लहरों की उथल-पुथल। आसमान किसी चित्र की तरह गहरा नीला था एवं धूप इतनी चमकदार कि मीलों तक साफ-साफ देखा जा सकता था। अचानक दूर-बहुत दूर तक भूरी सी पहाड़ी नजर आयी। ऊपर मस्तूल पर बैठे ग्लाबिनों ने चीख-चीख कर यह जानकारी दी। वह अब भी हाथ हिला- हिलाकर नाच रहा था कि वास्तव में धरती के आखिरी छोर पर पहुँच गए हैं। मौत के चंगुल में पहुँच चुके सभी लोगों के लिये यह एक नया जीवन था, परम आनंद की अनुभूति का क्षण था।”

एक दुर्घटना से हुई खोज

इस संबंध में एसके सिंहा ने इंडिया वाटर पोर्टल पर विस्तृत जानकारी दी है। वास्तव में स्मिथ व्यापारिक यात्रा पर रवाना हुआ था लेकिन मौसम खराब हो जाने के कारण उनका जहाज भटक कर दक्षिण शेरलैण्ड द्वीप तक पहुँच गया। यह खोज महत्त्वपूर्ण थी लेकिन अंटार्कटिका रहस्य अभी बरकरार था। लेकिन उसका यह अनुभव इस खोज को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त था। उसके अनुभव की जानकारी जब वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंची तो उन्होंने दक्षिणी समुद्र के रहस्यों की तलाश में स्मिथ को एक बार फिर खोज अभियान के लिए रवाना किया। लेकिन इस बार नेतृत्व रॉयल नेवी के एडवर्ड ब्रेंसीफील्ड को सौंपा गया।

दूसरा अभियान काफी हद तक सफल रहा और स्मिथ के लगभग साथ-साथ ही नोस्तोल एवं मिरनी नामक दो रूसी दलों के लीडर थेडिसियस नान विलिंग्सलेसन ने अंटार्कटिका महाद्वीप के एक भाग को देखने में सफलता प्राप्त कर ली। यह पहला अवसर था जब बर्फ का देश पर मनुष्य के कदम पड़े। इन तमाम सफलताओं के बावजूद अंटार्कटिका का अस्तित्व अभी तक संदिग्ध था।

पक्की मोहर दो दशक बाद लगी

इसके लगभग दो दशक बाद जनवरी, 1840 में अमरीकी खोज, अभियान दल के नेता चार्ल्स बिल्कीस ने अंटार्कटिका के समुद्र तट में मोटी बर्फ की तह भी देखी। उसकी खोज ने इस अवधारणा पर पक्की मुहर लगा दी कि अंटार्कटिका एक महाद्वीप है। उन्नीसवीं सदी में फ्रांस, इटली एवं जर्मनी द्वारा अनेक नाविक दलों की सहायता से अंटार्कटिका की खोज के अभियान चलाए गए।

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कल्पना की जा सकती है कि छोटी-छोटी नौकाओं एवं पोतों में सवार होकर खोजी दस्तों ने अठारवीं-उन्नीसवीं शताब्दी में अंटार्कटिका के भयानक समुद्र में यात्राएँ कैसे और कितनी दुर्गम की होंगी, वह भी बिना किसी आधुनिक संचार व्यवस्था के। जबकि आज भी विज्ञान, की पर्याप्त प्रगति एवं साधनों के विकास के बावजूद अंटार्कटिका तक पहुँचना सरल नहीं है।

पहले भारतीय गिरिराज सिरोही

अंटार्कटिका पर पहुँचने वाले प्रथम भारतीय नागरिक गिरिराज सिरोही थे। श्री सिरोही एक प्लांट फिजियोलॉजिस्ट थे। एवं वे एक अमरीकी अभियान दल के सदस्य के रूप में वर्ष 1960 में अंटार्कटिका पहुँचे। सिरोही ने दक्षिणी ध्रुव पर पृथ्वी के लगभग ने घूमने की स्थिति में कॉकरोच जैसे जीवों पर ‘बायलॉजिकल कंपास’ का अध्ययन किया। सिरोही के सम्मान में ही अंटार्कटिका के ब्रेडमोर ग्लेशियर के स्थान का नाम ‘सिरोही प्वांइट’ रखा गया।

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रहस्य आज भी

फरवरी, 1819 तक तो लोग यह मानने को तैयार ही नहीं थे कि दक्षिणी समुद्र में धुव्रीय क्षेत्र में कोई बड़ा भू-भाग है। अंटार्कटिका की धरती को देखकर उस समय अंग्रेज नाविक कितने चकित हुए थे, अंटार्कटिका जाने वाला प्रत्येक व्यक्ति अभी भी देखकर उतना ही चकित होता है। अभी भी धरती का यह सबसे रहस्यमय, सबसे निर्जन, सबसे खतरनाक महाद्वीप मानव के लिए उतना ही चुनौतीपूर्ण है जितना तब था।