BSP के 30 साल: वक्त गुजरने के साथ घटता गया बहुजन का कारवां

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Abhay Raj

लखनऊ: एक-एक करके बीएसपी के वफादार नेताओं का मायावती से मोहभंग हो रहा है। पार्टी के कद्दावर नेता और नेता विरोधी दल स्वामी प्रसाद मौर्य की विदाई के बाद से अब यह यक्ष प्रश्न दलित समाज और बीएसपी को परेशान किए हुए हैं कि कौन वफादार है और कौन गद्दार। बीते 30 साल में जैसे-जैसे बीएसपी बहुजन से सर्वजन में तब्दील होती गई, वैसे-वैसे पार्टी के वफादार गद्दारी के आरोप में पार्टी से एक-एक कर निकाले गए। बहुजन से सर्वजन में बदलने का यह असर रहा कि बीएसपी तेजी से जमीन गंवा रही है। आखिर क्या कारण है कि दलित स्वाभिमान को लेकर पैदा हुई बीएसपी के प्रति दलित समाज का लगाव कम क्यों हो रहा है। आखिर पार्टी की सुप्रीमो मायावती को यह सफाई क्यों देनी पड़ रही है कि दलित आज भी पार्टी के साथ है। बीएसपी के 30 के राजनीतिक सफर की पड़ताल कर रहे हैं अभय राज।

1984 से पहले कांशीराम जी ने बामसेफ और डीएस 4 के जरिए दलितों, पिछड़े और मुस्लिम समाज को एकजुट करने के लिए यूपी एक-एक इंच की पद और साइकिल से यात्रा की। इस यात्रा के जरिए कांशीराम जी ने दलितों, पिछड़े और मुस्लिम समाज का गहराई से मर्म समझा। समाज के उपेक्षित और पीड़ित इन वर्गों में से कुछ लोगों को अपने साथ जोड़ा। कांशीराम जी की संघर्ष यात्रा में तमाम दलितों, पिछड़े और मुस्लिम समाज के नेताओं को संगठन से लेकर 1992 की सपा-बीएसपी की गठजोड़ सरकार में मंत्री तक बनाया। 2006 में कांशीराम जी के निधन के बाद एक-एक करके पार्टी के वफादार नेता निकाले गए।

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मोती की माला की तरह बिखरी कांशीराम की बिग्रेड
बीएसपी संस्थापक कांशीराम जी के कंधे से कंधा मिलकर चले वाले पार्टी के पहले प्रदेश अध्यक्ष जंग बहादुर पटेल, राम लखन वर्मा, सोने लाल पटेल, बरखूराम वर्मा, आर.के. चौधरी, श्रीराम यादव, कैप्टन सिंकदर रिजवी, दीनानाथ भास्कर, राजबहादुर, बलिहारी बाबू, ईसम सिंह, रामरती बिन्द, सरदेश अम्बेडकर, अहमद मसूद, मोहम्मद अरशद, दद्दू प्रसाद, राम प्रसाद, प्रमोद कुरील, जगन्नाथ राही, अशोक वर्मा, प्रमोद कुरील, आर.के. पटेल, मायावती (माया प्रसाद) निकाल दिए गए थे। इनमें से आर.के. चौधरी, दीनानाथ भास्कर की बीएसपी में वापसी हो पाई है, लेकिन ये नेता आज भी अपना वजूद बनाए रखने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। जबकि अब स्वामी प्रसाद मौर्य ने बसपा को छोड़ दिया है।

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आयतित नेताओं के कारनामों से बीएसपी सरकार हुई बदनाम
2007 में दूसरे दलों के काफी संख्या में नेता बीएसपी से जुड़े। रंगनाथ मिश्र, बादशाह सिंह, अवधपाल सिंह यादव, राजेश त्रिपाठी, अशोक सिंह दोहरे, सुधीर गोयल, रघुनाथ प्रसाद शंखवार, जमुना निषाद (दिवंगत), आनंद सेन, मित्रसेन, विद्याराजभर, चंद्रदेव यादव, डी.पी. यादव, अंगद यादव, उमाकांत यादव, राकेशधर त्रिपाठी, नंद गोपाल नंदी, फतेह बहादुर सिंह, रतन लाल, अहिरवार बाबू सिंह कुशवाहा, नटवर सिंह, अरविन्द नेताम, आरिफ मोहम्मद खान, अखिलेश दास, शफीकुर्ररहमान बर्क, जुगुल किशोर किसी न किसी रूप में बीएसपी के लिए विवादों का कारण बने। इससे जहां बीएसपी सरकार की जनता में छवि जमकर धूमिल हुई। वहीं दलित समाज खुद को ठगा महसूस करने लगा था।

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पहचान मे मोहताज हैं बीएसपी से निकाले गए नेता
बीएसपी के चाणक्य माने जाने वाले सतीश चंद्र मिश्र की स्वामी प्रसाद मौर्य और जुगुल किशोर प्रकरण में अहम भूमिका थी। बाबू सिंह कुशवाहा के निकाले जाने के बाद सतीश चंद्र मिश्र जुगुल किशोर के संरक्षणदाता बने थे। यही वजह है कि 2012 के विधानसभा चुनाव में बीएसपी को मिली 112 सीटों पर करारी हार के जिम्मेदार जुगुल किशोर के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो पाई। 2014 के आम चुनाव में इस गठजोड़ का पूरी तरह से खुलासा हो गया। मायावती ने जुगुल किशोर का कद पूरी तरह से कम कर दिया। साथ ही पार्टी की किसी भी गतिविधियों में शामिल होने पर रोक लगा दी थी।

15 जनवरी को पार्टी कार्यालय में बीएसपी सुप्रीमो मायावती के जन्मदिन पर हुई प्रेसवार्ता के बाद पार्टी के चाणक्य सतीश चंद्र मिश्र मीडिया के अपने कुछ ‘खास’ पत्रकारों को कह रहे थे कि उन्होंने जुगुल किशोर के बारे में बहनजी को सब कुछ बता दिया था। तब कोई कार्रवाई नहीं हुई थी। इधर जुगुल किशोर ने बीजेपी के कुछ नेताओं के साथ अपना राजनीतिक करियर तलाशना शुरू कर दिया था। इस जानकारी के बाद जुगुल किशोर का कद पूरी तरह से कम कर दिया गया है। बहनजी जुगुल किशोर को निकालने जा रही थीं।

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मैंने सलाह दी कि अभी निकाल देने से फायदा नहीं होगा। इससे राज्यसभा की सदस्यता बरकरार रहेगी। उन्होंने कहा कि बीएसपी के इतिहास को देखने से साफ हो जाता है कि जितने भी लोगों ने पार्टी से गद्दारी की, वे आज अपने राजनीतिक वजूद को भी नहीं बचा पाए हैं। अपने विषय में कहा कि वे तो वकील थे, बहनजी ही उनको राजनीति में लेके आई, उनको इतना मान सम्मान दिया। इस वजह से वे किसी पार्टी में जाने के लिए सपने में भी नहीं सोचते हैं।

मिशन से भटकी बीएसपी
बीएसपी संस्थापक मान्यवर कांशीराम जी के सहयोगी रहे पूर्व राज्य सभा सांसद बलिहारी बाबू ने कहा कि पार्टी मिशन से भटक गई है। कांशीराम जी ने बाबा साहब के मिशन को आगे बढ़ाने के लिए अपना सबकुछ दलित समाज के लिए न्योछावर कर दिया। कांशीराम जी की कोई व्यक्तिगत राजनीतिक इच्छा नहीं थी। अगर उनकी कोई राजनीतिक इच्छा होती, तो वे काफी पहले ही राष्ट्रपति या फिर यूपी के सीएम बन चुके होते। बाबा और साहब के मिशन को बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने खत्म कर दिया है। वर्ष 2006 से पार्टी की कमान मायावती के हाथ आने और अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा को पूरी करने के लिए पार्टी के काडर नेताओं को एक-एक करके निकाल दिया है। जिससे बीएसपी का मिशन अब बदल कर कमीशन हो गया है।

कम्पनी में बदली बसपा
कांशीराम जी और मायावती के सहयोगी रहे पूर्व राज्य सभा सांसद प्रमोद कुरील ने कहा कि बीएसपी का अब तेजी से पतन हो रहा है। इसकी असल वजह मूल एजेंडे से हटना है। जब तक कांशीराम जी जीवित थे, तब तक बीएसपी मिशनरी पार्टी की तरह रही और अब पूरी तरह से कम्पनी में तब्दील हो गई है। जो लाभ-हानि की तर्ज पर काम कर रही है। इसी कारण दलित समाज का बीएसपी से तेजी से मोहभंग हो रहा है। देश के अन्य राज्यों में बीएसपी का अस्तित्व खतरे में है।

नम्बर दो की लड़ाई में जीते नसीमुद्दीन सिद्दीकी
पार्टी सूत्रों का कहना है कि बीएसपी में नम्बर दो के कद के लिए कभी बाबू सिंह कुशवाहा बनाम नसीमुद्दीन सिद्दीकी के बीच अघोषित तौर पर छद्म युद्ध चलता था, लेकिन बीते दो साल से सियासी वर्चस्व की यह जंग नसीमुद्दीन बनाम स्वामी प्रसाद में छिड़ी हुई थी। इसकी वजह यह है कि स्वामी प्रयाद मौर्य अपने व्यवहार और कार्यशैली से बीएसपी के काडर नेताओं में लोकप्रिय हैं। नसीमुद्दीन की कार्यप्रणाली को लेकर पार्टी के काडर नेताओं में जबरदस्त रोष है। बीएसपी के अधिकतर नेताओं का कहना है कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी भले ही बहनजी के विश्वसनीय लोगों में शामिल हों, लेकिन जनाधारविहीन इस नेता ने अपनी महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए बीएसपी को काफी नुकसान पहुंचाया है। अब स्वामी प्रसाद मौर्य के इस्तीफा देने के बाद वर्चस्व की लड़ाई में काबीना मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी जीत गए हैं।