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क्यों मनाई जाती है बकरीद, जानिए मिथ्स-फैक्ट्स और पूरा किस्सा

Rishi

RishiBy Rishi

Published on 20 Aug 2018 11:47 AM GMT

क्यों मनाई जाती है बकरीद, जानिए मिथ्स-फैक्ट्स और पूरा किस्सा
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लखनऊ : ईद-उल-अज़हा इस्लाम धर्म का खास त्यौहार है जो बकरीद अथवा ईद-उल-कबीर के नाम से भी जाना जाता है। ईद उल फित्र के 70 दिनों बाद इस्लामी कैलेंडर का आखिरी महीना 10 ‘जुल हज्जा’ को ईद-उल-अजहा का त्यौहार मनाया जाता है। यह त्यौहार बलिदान अथवा कुर्बानी का प्रतीक है।

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इस्लाम धर्म में बकरे की कुर्बानी देकर मनाया जाने वाला ईद उल अजहा का यह त्यौहार हमेशा दूसरे धर्मों के लोगों के लिए चर्चा का विषय बना रहा है जिन लोगों को इस धर्म का पूर्ण ज्ञान नहीं है, वे नहीं जानते कि आख़िरकार कुर्बानी का वास्तविक सार और उसका महत्व क्या है।

प्यार का दूसरा नाम बलिदान है। ईश्वर, इस्लाम धर्म के पैगंबर हजरत इब्राहिम के विश्वास, उनकी निष्काम भक्ति, प्रेम और समर्पण का परिक्षण करना चाहते थे। मान्यता है कि इब्राहिम ने एक सपना देखा जिसमें उन्हें ईश्वर की और से हुक्म आया कि वह अपनी सबसे बहुमूल्य संपत्ति का बलिदान दें।

इब्राहिम के लिए सबसे अनमोल चीज़ उनके एकलौते पुत्र इस्माइल थे। इब्राहिम ने कई रातें ईश्वर की उपासना में गुजारी। जब कुर्बानी का समय करीब आया तो उन्होंने इस्माइल को ईश्वर के आदेश के विषय में बताया, तो वे तत्काल हॅसते-हॅसते कुर्बान होने के लिए तैयार हो गए। लेकिन ईश्वर भी दयालू व कृपालु है और वह अपने बंदे के दिल के हाल को बखूबी जानता है। इब्राहिम ने जैसे ही छुरी उठाई आकाश में एक रौशनी दिखाई पड़ी और उस दिव्य प्रकाश ने इब्राहिम से बात की की और कहा कि तुम्हारा बलिदान पूरा हो चुका। ईश्वर तुमसे प्रसन्न हुए है और तुम्हारे प्रिय पुत्र को जीवनदान दिया है। जब उन्होंने आंखें खोलीं तो पुत्र को खड़ा देखा और पुत्र के स्थान पर दुंबा यानी एक भेड़ की गर्दन कटी हुई थी। इस प्रकार वह ईश्वर के इम्तेहान में सफल हुए। लिहाजा तब से लेकर आज तक इब्राहिम के त्याग और बलिदान को याद कर यह त्यौहार मनाया जाता है।

यहां ये समझना बहुत ज़रूरी है कि जानवरों की कुर्बानी के रूप में दिया गया बलिदान न तो हमारे पिछले गुनाहों को खत्म कर सकता है और न ही हमारे प्राश्चित का ज़रिया बन सकता है। कुरआन कहता है कि: “न ही उनका मांस और न ही उनका खून है जो रब तक पहुँचता है यह तुम्हारी भक्ति और तक़वा है जो उस तक पहुँचती है”।

जानवरों की कुर्बानी देना सिर्फ एक अनुष्ठान और पवित्र धार्मिक परंपरा है। जबकि इस प्रथा का सार और इसकी भावना साधारण मनुष्य की समझ से परे है।

कुर्बानी का वास्तविक अर्थ यहां ऐसे बलिदान से है जो दूसरों के लिए किया गया हो। इस दिन किसी बकरे या जानवर की कुर्बानी तो महज़ एक उदाहरण है। असल में कुर्बानी तो हर व्यक्ति और औरत को जीवन भर करनी होती है।

ज़रा खुद सोचिये कि ईश्वर को हमारे बलिदान और त्याग की क्या ज़रुरत? वह हमसे सिर्फ सच्चाई और ईमानदारी की अपेक्षा करता है। यह त्यौहार इस लिए मनाया जाता है ताकि हम अपने दोस्तों के साथ अपने संबंधों को मज़बूत कर सकें, जो लोग ज़रूरत में हैं उनकी मदद कर सकें, परोपकार व अच्छे कर्म कर सकें। यह त्यौहार हमें बताता है की कैसे मानवता की सेवा और ईश्वर की इच्छा के प्रति सवयं को समर्पित करें।

हजरत मुहम्मद साहब ने स्वयं फरमाया कि “कोई व्यक्ति जिस भी परिवार, समाज, शहर या मुल्क में रहने वाला है, उस व्यक्ति का फर्ज है कि वह उस देश, समाज, परिवार की रक्षा के लिए हर कुर्बानी देने को तैयार रहे”।

इस्लामी धर्म ग्रंथों में गौवध-निषेध

अक्सर गौहत्या को मुसलमानों से जोड़कर देखा जाता है तथा यह भ्रांति फैलाई जाती है कि धार्मिक कार्यों के तहत गौमाता को मारना, किसी जानवर का मांस खाना या मांसाहारी होना वाजिब (ज़रूरी या फ़र्ज़) के नज़दीक है। हालांकि यह धारणा बिल्कुल गलत है। किसी मुसलमान के लिए मांसाहारी होना अनिवार्य नहीं। एक शाकाहारी मुसलमान भी सच्चा और धार्मिक मुसलमान हो सकता है।

जबकि तथ्य यह है कि गाय के संबंध में इस्लाम का दृष्टिकोण सदा से ही उदार रहा है। इस्लाम ऐसे किसी पशु को मारने का हुक्म नहीं देता, जो मानव जाति के रोजमर्रा के काम के लिए लाभप्रद हो। इस्लाम धर्म के पैगम्बर मुहम्मद (सलल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपनी उम्मत को मांस का अधिक सेवन करने से मना फ़रमाया और साथ ही उनको गाय के मांस से परहेज़ करने की सलाह भी दी है।

उन्होंने हदीस में फ़रमाया कि, 'गाय का दूध और घी लाभकारी है, परन्तु इसके मांस में बीमारियां है।'

इसका दूध, घी और मक्खन मनुष्य को स्वस्थ रखते हैं। दही (मट्ठा और मक्खन) बहुत सी बीमारियों में औषधि के रूप में काम आता है। सिर्फ उसका मांस ही एक ऐसी वस्तु है, जिसे सहस्रों रोगों की पोटली कहा जा सकता है। ऐसी एक भी हदीस नहीं, जिसमें ज्ञात हो सके कि स्वयं मुहम्मद सलल्लाहु अलैहि वसल्लम ने अपने जीवन काल में गाय और बैल का सेवन किया हो। इसके अतिरिक्त ऐसी कई प्रमाणित हदीसें (सहीह हदीस) मौजूद हैं, जो हमें बताती हैं कि उन्हें कद्दू जैसी सब्जियों का शौक था।

क़ुरान मुसलमान को मांसाहारी भोजन खाने की केवल अनुमति देता है, लेकिन इसके अधिक सेवन करनी की निंदा भी करता है। इसका अधिक सेवन इस्लाम में ‘मकरूह’ यानी नापसंदीदा है। कुरान शरीफ में स्पष्ट लिखा है कि, ‘‘बेशक तुम्हारे लिए चौपायों में भी सीख है। उनके (गाय के) पेट की चीजों में से गोबर और खून के बीच से बना साफ दूध जो पीने वालों के लिए स्वाद वाला है, हम तुम्हें पिलाते हैं।” (कुरान 5:1)

ख्वाजा गरीब नवाज़ मोइउद्दीन चिश्ती और हज़रत हमीदुद्दीन नागौरी जैसे सूफी संतों ने अपने जीवनकाल में शाकाहार को अपनाया। आज भी बीफ खाने के पश्चात किसी व्यक्ति का दरगाह में प्रवेश करना अनुचित समझा जाता है।

15 वीं सदी के संत कबीर ने भी लगातार मांस खाने की निंदा की तथा शाकाहार के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने कहा कि काम, क्रोध, लोभ और अहंकार जैसे विकारों पर नियंत्रण केवल मांसाहार के त्याग से ही संभव है।

पिछली शताब्दी के प्रसिद्ध सूफी संत जैसे बावा मोहिउद्दीन और सूफी इनायत खान ने भी पशु-पक्षियों के प्रति सहानुभूति एवं दया को सूफीवाद का एक अहम अंग बताया।

गत 800 वर्षों से लेकर आज तक ख्वाजा मोइउद्दीन चिश्ती और हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाहों के लंगर में केवल शाकाहारी भोजन ही परोसा जाता है क्योंकि इन मज़ारों में ज़्यादा शिरकत करने वाले गैर मुस्लिम होते हैं।

मांस का सेवन इस्लाम में अनिवार्य नहीं है। प्राचीन समय में केवल वे लोग मांस खाते थे, जो अमीर होते थे। मध्यम वर्गीय व्यक्ति तो सप्ताह में केवल एक बार इसका सेवन करता और गरीब केवल ईद के मौके पर।

इस्लाम में शाकाहार हलाल है। मांस का सेवन अनिवार्य नहीं है। इस्लाम में किसी भी भोजन की अनुमति है, बशर्ते वह हानिकारक न हो। हर प्रकार का हलाल भोजन खाने के लिए मुसलमान पूरी तरह से सवतंत्र हैं”।

पवित्र कुरान का कहना है: “ऐ लोगों! धरती में जो हलाल और अच्छी-सुथरी चीज़ें हैं उन्हें खाओ” (कुरान- 2:168)

फतवा-ए-हुमायुनी से लेकर दुर्रुल मुख़्तार में बार बार दोहराया गया है कि गाय की कुर्बानी इस्लाम में अनिवार्य नहीं है। बकरीद पर भेड़ और बकरी के बलिदान को गोहत्या से बेहतर माना जाता है। पवित्र कुरान और अरब परंपरा दोनों ही गाय की कुर्बानी की अनुमति नहीं देते। इसलिए घोड़ा हलाल होने पर भी अरब के लोग उसको नहीं मारते थे।

सबसे बड़ा तथ्य तो यह है कि अरब देशों में जहां इस्लाम का जन्म हुआ वहां गाय होती ही नहीं थी, फिर गाय की कुर्बानी को कैसे आवश्यक बताया जा सकता है?

बहादुर शाह ज़फर भारत के अंतिम मुगल सम्राट थे, जिनके नेतृत्व में भारत में आज़ादी की पहली लड़ाई 1857 में शुरू हुई थी, ने फरमान जारी किया कि, जिस किसी ने गाय, बैल या बछड़े की खुले आम या व्यर्थ ही हत्या की तो उसे मृत्यु दंड दिया जाएगा।

अकबर ने शासनकाल में गोहत्या पर पाबंदी लगाई।

इसके अतिरिक्त भारत में ही अनेक मुसलमान बादशाहों ने राजाज्ञा द्वारा गो-वध बंद करा दिया था। यदि मुसलमानों के लिए गोवध धार्मिक दृष्टि से अनिवार्य होता तो वे ऐसा कदापि नहीं करते। स्वर्गीय हकीम अजमल खां, सर सैयद अहमद, डॉ सैयद महमूद, अब्दुल बारी आदि कितने ही गण्यमान्य मुस्लिम नेताओं ने गो-रक्षा का समर्थन किया है।

कुर्बानी के लिए चुनें स्वस्थ जानवर

कुर्बानी का अर्थ है अपनी सबसे प्यारी चीज को अल्लाह के लिए कुर्बान करना। इसलिए बेहतर यह है कि कुर्बानी के लिए ऐसे जानवर को चुना जाए जो पूर्ण रूप से स्वस्थ हो और उस जानवर को कुर्बानी करने वाले ने अपने हाथों से पाला हो।

बिक्री के पैसों का न करें इस्तेमाल

कुर्बान किए गए जानवर के किसी हिस्से को बेचकर उसका रुपया उपयोग में लाना ठीक नहीं है। खाल और हड्डी की बिक्री से आने वाले पैसों को जरूरतमंदों को दिया जा सकता है। कुर्बानी केवल उस औरत और मर्द पर लाजिम है, जिस पर अपना माल हो। गरीब व कर्जदार पर कुर्बानी वाजिब नहीं है।

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आशीष शर्मा ऋषि वेब और न्यूज चैनल के मंझे हुए पत्रकार हैं। आशीष को 13 साल का अनुभव है। ऋषि ने टोटल टीवी से अपनी पत्रकारीय पारी की शुरुआत की। इसके बाद वे साधना टीवी, टीवी 100 जैसे टीवी संस्थानों में रहे। इसके बाद वे न्यूज़ पोर्टल पर्दाफाश, द न्यूज़ में स्टेट हेड के पद पर कार्यरत थे। निर्मल बाबा, राधे मां और गोपाल कांडा पर की गई इनकी स्टोरीज ने काफी चर्चा बटोरी। यूपी में बसपा सरकार के दौरान हुए पैकफेड, ओटी घोटाला को ब्रेक कर चुके हैं। अफ़्रीकी खूनी हीरों से जुडी बड़ी खबर भी आम आदमी के सामने लाए हैं। यूपी की जेलों में चलने वाले माफिया गिरोहों पर की गयी उनकी ख़बर को काफी सराहा गया। कापी एडिटिंग और रिपोर्टिंग में दक्ष ऋषि अपनी विशेष शैली के लिए जाने जाते हैं।

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