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सिनेमा व समाज दोनों एक दूजे के लिये: सुभाष घई

स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि आजकल परिवारों में कारों का काफिला बढ़ता चला जा रहा है, कारों के नये नये मॉडल आ रहे है लेकिन संस्कारों का सिलसिला थमता जा रहा है।

Aditya Mishra

Aditya MishraBy Aditya Mishra

Published on 13 Feb 2019 3:02 PM GMT

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आशीष पाण्डेय

कुम्भ नगर: परमार्थ निकेतन शिविर अरैल क्षेत्र सेक्टर 18 प्रयागराज में संस्कृति विद्वत कुम्भ के दूसरे दिन सिनेमा और सोसाइटी सत्र में सुभाष घई, कमलेश पाण्डेय, विनोद अनुपम, अजय ब्रह्मात्मज द्वारा सिनेमा किस प्रकार समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है तथा समाज को जागरूक करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है पर विचार विमर्श किया। आज एक शार्ट फिल्म जो कुम्भ के उपर बनी है फिलासफी और कुम्भ का लोकार्पण किया गया। डॉ. के हरि और हेमा हरि द्वारा फिल्म का प्रजेंटेशन दिया गया।

मीडिया की नैतिक जिम्मेदारी के विषय में रोहित सरदाना, शेफाली वैद्य और गौरव प्रधान द्वारा किया गया। अगले सत्र में स्त्री विमर्श का बदलता स्वरूप विषय पर डॉ साध्वी भगवती सरस्वती , ऋचा अनिरूद्ध, साक्षी तँवर, लुबना सलीम, नलिनी, ज़मीन छोड़ती परम्पराओं पर डॉ. सच्चिदानन्द जोशी, यशेन्द्र राय, सलीम आरिफ तथा कला परम्पराओं की सामाजिक जिम्मेदारी विषय पर वामन केंद्रे, शारोदी सैकिया, श्याम शर्मा ने अपने विचार व्यक्त किये।

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स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि आजकल परिवारों में कारों का काफिला बढ़ता चला जा रहा है, कारों के नये नये मॉडल आ रहे है लेकिन संस्कारों का सिलसिला थमता जा रहा है। बच्चा जब रोता है तो हम उसे उपहार दे देते है वह थोडी देर के लिये प्रसन्न हो जाता है लेकिन जब हम उन्हें संस्कर देते है तो पूरी जिन्दगी वह प्रसन्न रहता है। मुझे लगता है संस्कारों का उपहार हम उन्हें दे यह बहुत जरूरी है। संस्कार भारती की यह श्रेष्ठ कोशिश है कि संस्कारों की गंगा हमेशा बहती रहे।

यह हमारे देश के संस्कार ही है जिन्होने हमें बांधे रखा है, जोड़े रखा है। हमारी संस्कृति में सभी का समावेश है मुझे लगता है श्रद्धा और आस्था की ये कड़िया मजबूत होती है। घर के आंगन में घर के प्रांगण से। सिनेमा बच्चों को कुछ ऐसा परोसे कि उन्हें लगे कि यह है हमारे संस्कार। लेखक और कहानीकार कमलेश पाण्डेय ने कहा कि पहले का सिनेमा बहुत आध्यात्मिक हुआ करता था। आम आदमी सिनेमा से ही जीना सीखता है। उन्होने कहा कि भरत मुनि ने नाटक लिखने आरम्भ किया तब से सिनेमा की यात्रा आरम्भ हुयी। सिनेमा हमारी पुरानी संस्कृति को आज भी उजागर करता है। फिल्मकार सुभाष घई ने समाज के निर्माण के लिये सिनेमा का योगदान विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुये कहा कि भारत को विश्व गुरू और वसुधैव कुटुम्बकम् का संदेश प्रसारित करना है तो हमें सभी संस्कृतियों को आत्मसात करना होगा।

सिनेमा और समाज के साथ बहुत बड़ा सम्बंध है। सिनेमा, समाज का एक दृश्य दिखाता है, सिनेमा से जो संदेश जाते है वह सीधे समाज तक

पहंचते है। अनेक समस्याओं का समाधान आपको सिनेमा में मिलता है। सिनेमा बना है समाज के लिये और समाज बना है सिनेमा के लिये।

अभिनव कश्यप ने कहा कि जीवन सिर्फ कथनी पर नहीं चलता, अतः दृश्य और संवाद दोनों का होना बहुत जरूरी है। आज की युवा पीढ़ी देखकर सीखती है इसलिये दिखाना जरूरी है।

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स्पेन से आये फिल्म निर्देशक ने कहा कि सिनेमा पूरे विश्व के लिये महत्वपूर्ण है। हम सिनेमा के माध्यम से ऐसे अनेक विषयों को देख पाते है जहां तक हम पहुंच भी नहीं पाते। हम समाज में व्याप्त नये विषयों को देख सकते है। हम सिनेमा के माध्यम से सामाजिक मुद्दों को जान सकते है। सिनेमा, समाज में परिवर्तन लाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

जीवा की अन्तर्राष्ट्रीय महासचिव साध्वी भगवती सरस्वती ने कहा कि मैं 23 वर्ष पूर्व भारत आकर स्वामी चिदानन्द सरस्वती के सान्निध्य मे रहने लगी तब मैने देखा की यहां पर नदियों को भी माँ माना जाता है। भगवान के नाम भी हम पहले माता से शुरू करते है। नौ दिन नवरात्र के माता के होते है। इस सब से मैं बहुत प्रभावित हुयी। मां, मां होती है और वह अपने बच्चों को हर हाल में खुश देखना चाहती है।

उधर परमार्थ निकेतन शिविर अरैल घाट संगम के तट पर एक शाम संगीत के नाम कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

जिसमें विख्यात गायिका मालिनी अवस्थी एवं विख्यात गायक रूप कुमार राठौर ने मधुर भजन और गीत प्रस्तुत किये। विश्व के 37 देशों से आये श्रद्धालुओं ने संगम आरती में सहभाग कर आरती और भजन का आनन्द लिया। संगम के तट पर संगीत की शाम बेहद मधुर थी एक ओर साइबेरिया से आये प्रवासी पक्षियों का दल अपना संगीत सुना रहा है और दूसरी ओर भारत के संगीत जगत के विख्यात गायक संगम का संगीत गा रहे है सचमुच यह अद्भुत दृश्य है।

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