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अतिक्रमण अभियान के तहत कानून का पालन अनिवार्य: हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि मास्टर प्लान के तहत सड़क चौड़ीकरण योजना में ध्वस्तीकरण अभियान के तहत बिना सूचना व आपत्ति पर विचार किये अवैध निर्माण या अतिक्रमण नहीं हटाया जा सकता। कोर्ट ने कहा है कि हिन्दी-अंग्रेजी दो दैनिक प्रसार वाले अखबारों में सूचना प्रकाशित करने के बाद नियमानुसार आपत्ति तय कर ही कार्यवाही की जा सकती है।

Aditya Mishra

Aditya MishraBy Aditya Mishra

Published on 14 Feb 2019 2:05 PM GMT

अतिक्रमण अभियान के तहत कानून का पालन अनिवार्य: हाईकोर्ट
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प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि मास्टर प्लान के तहत सड़क चौड़ीकरण योजना में ध्वस्तीकरण अभियान के तहत बिना सूचना व आपत्ति पर विचार किये अवैध निर्माण या अतिक्रमण नहीं हटाया जा सकता। कोर्ट ने कहा है कि हिन्दी-अंग्रेजी दो दैनिक प्रसार वाले अखबारों में सूचना प्रकाशित करने के बाद नियमानुसार आपत्ति तय कर ही कार्यवाही की जा सकती है।

कोर्ट ने कहा है कि अवैध निर्माण सरकारी जमीन पर है या प्राइवेट जमीन पर, निर्धारण करने के बाद कार्यवाही की जा सकती है। यदि निर्माण अवैध नहीं है तो सरकार अधिग्रहीत कर मुआवजा देकर ही भवन का ध्वस्तीकरण कर सकती है। सरकार शासनादेश जारी कर किसी की जमीन नहीं ले सकती।

अनुच्छेद 300 (ए) के तहत किसी भी नागरिक को सम्पत्ति के अधिकार से कानूनी प्रक्रिया बगैर वंचित नहीं किया जा सकता। इसी के साथ कोर्ट ने अमलानगर, लहरतारा, वाराणसी के डी.65/462 आराजी सं.61, 62 व 63 में बने भवन को सड़क चौड़ीकरण की जद में आने पर याची की आपत्ति सुनकर नियमानुसार कार्यवाही करने का निर्देश दिया है। याची का कहना है कि भवन उसकी जमीन पर है। अतिक्रमण नहीं किया गया है, इस पर विचार किया जाए और कानून के तहत ही अतिक्रमण हटाया जाए।

यह आदेश न्यायमूर्ति पी.के.एस.बघेल तथा न्यायमूर्ति बी.पी.वैश की खण्डपीठ ने लहरतारा, वाराणसी के राय अजय कुमार व 15 अन्य की याचिका पर दिया है। याची का कहना है कि वे 60 से 80 साल से मकान बनाकर निवास कर रहे है। 1910 में तत्कालीन जमींदार राम शिवप्रसाद व राम शंभूप्रसाद व जिलाधिकारी व अन्य विभागों के बीच जी.टी.रोड चौड़ीकरण के समय सहमति बनी थी। अब 1992 में अतिक्रमण दस्ते ने पुनः कार्यवाही शुरू की। 10 अक्टूबर 1911 के शासनादेश के साथ हुए समझौते के अनुसार कोई अतिक्रमण नहीं है। लहरतारा से राजघाट तक अतिक्रमण हटाओ अभियान चलाया गया।

इसकी कोई सूचना नहीं दी गयी और कोई मुआवजा भी नहीं दिया जा रहा है। पुलिस फोर्स लगाकर ध्वस्तीकरण किया जा रहा है। इस कार्यवाही को चुनौती दी गयी। कोर्ट ने न्यायिक निर्णयों पर विचार करते हुए कहा कि कानून के तहत ही सरकार किसी की सम्पत्ति ले सकती है। शासनादेश से ऐसा नहीं हो सकता। सरकार को बिना कानूनी अधिकार को किसी की सम्पत्ति पर हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है और कानूनी प्रक्रिया में नोटिस देकर तय कर नियमानुसार ही जमीन अधिग्रहीत करने का अधिकार है।

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