सरकारी व निजी कंपनी के कर्मचारियों के पीएफ की रकम में लूट

Published by seema Published: November 29, 2019 | 12:01 pm
Modified: November 29, 2019 | 12:02 pm

सरकारी व निजी कंपनी के कर्मचारियों के पीएफ की रकम में लूट

पूर्णिमा श्रीवास्तव
गोरखपुर। सरकारी, निजी कंपनी या फिर ठेकेदारों के अधीन काम करने वाला कर्मचारियों के पीएफ और ईपीएफ को लेकर तमाम उम्मीदें होती हैं। सपने होते हैं। कोई बेटी के हाथ पीले करने के लिए रकम को सुरक्षित रखता है तो सिर पर छत के लिए। कोई बीमारी के लिए इसे सुरक्षित रखता है तो कई के लिए यह रकम बुढ़ापे में सांस की डोर की तरह होती है। दुर्भाग्य ही है कि बिजली निगम, नगर निगम, शिक्षा विभाग, स्वास्थ्य विभाग से लेकर असंगठित क्षेत्र के कर्मचारियों की जिंदगी के फंड से जिम्मेदार फ्राड कर रहे हैं। इस फ्राड के शिकार बिजली निगम के आला अफसरों से लेकर सफाई कर्मचारी तक सभी हैं।

चिंता बढ़ाने वाली है जमीनी हकीकत
प्रदेश सरकार की पहल पर उत्तर प्रदेश पॉवर कारर्पोरेशन ने दीवान हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड में बिजली कार्मिकों के फंसे 2268 करोड़ रुपये की गारंटी को लेकर भले ही नोटिफिकेशन जारी कर दिया हो, लेकिन जमीनी हकीकत चिंता बढ़ाने वाली है। सरकार के नुमाइंदे भले ही ऑल इज वेल का नारा लगाएं,लेकिन गोरखपुर के जॉन मोहम्मद जैसे लोग भ्रष्ट सिस्टम से हारे हुए नजर आते हैं। गोरखपुर के मेडिकल कालेज क्षेत्र के सरैया के जान मोहम्मद बिजली निगम में काम करते हैं। घर में शहनाई बजनी है। बेटी की शादी को लेकर जान मोहम्मद ने जीपीएफ में जिंदगी भर की पूंजी जुटा रखी थी। अब वह अपनी ही जमा पूंजी के लिए अफसरों के चौखट पर सिर पटक रहे हैं।

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सूद पर कर्ज लेने की मजबूरी
गोलघर एसडीओ दफ्तर में बतौर श्रमिक तैनात जान मोहम्मद बताते हैं कि बेटी ताहिरा खातून की शादी 30 नवंबर को है। इसके लिए 30 अक्तूबर को जीपीएफ से दो लाख रुपये लोन लेने के लिए आवेदन किया था। तब लेखाधिकारी ने आवेदन पत्र में कुछ कमियां बताईं थीं। पहली नवम्बर को दुबारा आवेदन जमा कर दिया। अगले दिन ही बिजली निगम में जीपीएफ घोटाले का मामला उजागर हुआ। इसके बाद कार्यबहिष्कार और आन्दोलन शुरू हो गया। 20 नवम्बर को लेखाधिकारी ने यह कहते हुए आवेदन पर आपत्ति लगा दी कि शादी का कार्ड नहीं लगा है। जीपीएफ घोटाले ने बेटी की शादी में अड़ंगा डाल दिया। थक-हारकर जान मोहम्मद को अब बेटी की शादी के लिए सूद पर कर्ज लेना पड़ रहा है। जान मोहम्मद जैसे तमाम लोगों को जीपीएफ घोटाले ने तोड़ दिया है, पर सामाजिक प्रतिष्ठा बचाने को लेकर खुलकर सामने आने को तैयार नहीं है।

2012 के बाद नहीं मिली स्लिप
पावर कारपोरेशन मुख्यालय में पीएफ घोटाला समाने आने के बाद गोरखपुर परिक्षेत्र के बिजली अफसर-कर्मचारी जीपीएफ कटौती की पाई-पाई का हिसाब कर रहे हैं। पुराने दस्तावेज खंगाल कर जीपीएफ स्लिप से अब तक फंड में जमा रकम का अनुमान लगा रहे हैं। जल्द रिटायर होने वाले अभियंता व कर्मचारी इस बात को लेकर सहमे हैं कि घोटाले के बाद रकम वापस मिलेगी या नहीं। दर्जनभर से अधिक अभियंताओं के जीपीएफ के मद में करीब 10 करोड़ से अधिक की रकम जमा है। पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम गोरखपुर जोन के विभिन्न खंडों में तैनात 388 अभियंताओं व कर्मचारियों के हर माह के वेतन से जीपीएफ की कटौती होती है। इस रकम पर ब्याज अधिक मिलने के कारण अधिकतर कर्मचारी अपने वेतन से 20 से 60 हजार रुपये की कटौती कराते हैं। उपमुख्य लेखाधिकारी दफ्तर के मुताबिक इन कार्मिकों के वेतन मद में 25.75 करोड़ रुपये प्रत्येक माह कारपोरेशन से जारी होते हैं। इसी प्रकार 1241 कार्मिकों के वेतन से हर महीने 10 फीसदी रकम सीपीएफ के मद में कटौती होती है। इनका वेतन बजट करीब 49.34 करोड़ रुपये हर महीने कारपोरेशन से आता है। इन कर्मचारियों को साल 2012 के बाद सीपीएफ स्लिप नहीं मिली है।

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रकम डूबने के कगार पर
पावर कारपोरेशन मुख्यालय में पीएफ घोटाला सामने आने के बाद अभियंता व कर्मचारियों को जीपीएफ में जमा रकम डूबने की चिंता सता रही है। जो कर्मचारी आने वाले एक-दो साल में रिटायर होने वाले हैं, वे जीपीएफ में कम रकम जमा कर रहे हैं। गोरखपुर जोन के 125 कार्मिकों ने जीपीएफ कटौती की रकम घटा दी है। जीपीएफ के मद में बड़ी रकम कटवाने वाले कर्मचारी व अभियंताओं का कहना है कि अब जीपीएफ में निवेश सुरक्षित नहीं हैं। अब जो कुछ बच सकता है, उसे बचाने का प्रयास कर रहे हैं। जीपीएफ कटौती कम कराकर बैंक में निवेश करेंगे। जीपीएफ मद के बराबर ब्याज नहीं मिलेगा, लेकिन रकम तो सुरक्षित रहेगी। ब्याज का नुकसान सह लेंगे,लेकिन मूलधन तो बचा रहेगा। अब तक की गाढ़ी कमाई तो अफसरों की लापरवाही से डूबने के कगार पर पहुंच गई।

गाढ़ी कमाई न मिलने की चिंता
साल दो साल में रिटायर होने वाले अभियंताओं व कर्मचारियों ने तीन साल पहले से ही वेतन से जीपीएफ मद में कटौती की रकम बढ़वा दी थी ताकि रिटायरमेंट के समय ठीकठाक रकम मिल सके। बिजली निगम के एक अधिकारी का कहना है कि दो साल बाद रिटायरमेंट है। इस चक्कर में जीपीएफ में वेतन से 55 हजार रुपये हर महीने कटवाने लगा ताकि तीन साल में एक अच्छी-खासी रकम तैयार हो जाए। अब तक जीपीएफ खाते में 90 लाख से अधिक की रकम जमा है। अब घोटाले ने चिंता बढ़ा दी है। पता नहीं रिटायरमेंट के बाद जीवन भर की गाढ़ी कमाई मिल पाएगी या नहीं। बिजली निगम के एक जेई का कहना है कि वे हर माह 30 हजार रुपये वेतन से जीपीएफ के मद में कटौती कराते आ रहे हैं। अब तक जीपीएफ खाते में करीब 70 लाख रुपये जमा हो चुके हैं। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति के क्षेत्रीय सचिव बृजेश त्रिपाठी का कहना है कि ऊर्जा निगम का पीएफ घोटाला बिजली कर्मचारियों के बचत पर डाका है। चेयरमैन व एमडी ढाई साल से हर माह छह से सात दिन मीटिंग व वीडियो कांफ्रेंसिंग कर राजस्व वसूली की समीक्षा करते रहे। इन अफसरों की लापरवाही की सजा अब अभियंता व कर्मचारी भुगत रहे हैं।

कटौती को न्यूनतम करने का आवेदन
ट्रांसमिशन जोन के विभिन्न जनपदों में कार्यरत करीब 80 अभियंताओं व कर्मचारियों ने अपने वेतन से जीपीएफ की कटौती को न्यूनतम करने का आवेदन दिया है। कर्मचारियों का कहना है कि वेतन से जीपीएफ कटौती आवश्यक है। ऐसे में हमने अनुरोध किया है कि जरुरी रकम ही काटी जाए। शेष रकम हमें वेतन के साथ मुहैया कराई जाए। यह कर्मचारी आगामी तीन से चार साल में रिटायर हो जाएंगे। ट्रांसमिशन के अफसरों का कहना है कि जीपीएफ कटौती की रकम बढ़ाने व घटाने का कर्मचारियों को अधिकार है। यह उनका निजी मामला है। ट्रांसमिशन व वितरण के करीब 25 अभियंता व कर्मचारियों ने अपने जीपीएफ व सीपीएफ के मद से नान रिफंडेबल लोन के लिए आवेदन किया है। कर्मचारियों का कहना है कि लोन लेकर उसे बैंक में फिक्स करेंगे। राज्य विद्युत परिषद प्राविधिक कर्मचारी संगठन के प्रदेश उपाध्यक्ष बृजेश त्रिपाठी ने कहा कि अफसरों की लापरवाही से अब तक जोन के 1241 कर्मचारियों को छह साल से सीपीएफ स्लिप नहीं मिल पाई है। अब एक आंदोलन सीपीएफ स्लिप के लिए भी होगा।

200 करोड़ फंसे, अब कम करा रहे कटौती
बिजली निगम में कार्यरत गोरखपुर जोन के कर्मचारियों की पीएफ गड़बड़ी में करीब सवा दो अरब रुपए फंसे हैं। गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर और महराजगंज के 1129 कर्मचारियों की घोटाले के बाद नींद उड़ी हुई है। इनमें तकनीकी कर्मचारी से लेकर बाबू, जेई, एसडीओ, अधिशाषी अभियंता, अधीक्षण अभियंता और मुख्य अभियंता शामिल हैं। इन सभी ने पीएफ की तय रकम दस प्रतिशत (अनिवार्य) बेसिक सैलरी से कटवाया, साथ ही जीपीएफ मद में मूल वेतन से अधिक रकम कटवाई थी।
पूरे प्रदेश में बिजली निगम के कुल 45 हजार कर्मियों की पीएफ जीपीएफ की रकम फंसी हुई है। इसे लेकर कर्मचारी लगातार आंदोलित हैं। अधीक्षण अभियंता शहरी यूसी वर्मा ने बताया कि सभी 1129 कर्मचारियों में प्रति कर्मचारी बेसिक सैलरी से अगर औसत पीएफ (10 प्रतिशत) की रकम 20 लाख रुपये भी मान लें तब भी सवा दो अरब के आसपास की रकम फिलहाल फंसी नजर आ रही है। अधिकारियों-कर्मचारियों के बीच चर्चा है कि सरकार रकम वापसी करती भी है तो बेसिक सैलरी से पीएफ मद में कटी रकम ही लौटाएगी। खुद से जीपीएफ मद में कटवाने वाली रकम डूब जाएगी।

पीएफ अकाउंट तक नहीं खुला
नगर निगम के कर्मचारियों की ईपीएफ कटौती को लेकर पेच फंसा हुआ है। गोरखपुर नगर निगम में 2500 से अधिक आउटसोर्स के सफाई कर्मचारी, पंप ऑपरेटर, चालक, फागिंग करने वाले कार्यरत हैं। पर, किसी के पास ईपीएफ कटौती का डिटेल नहीं है। मुंबई और मुरादाबाद की एजेंसियों सफाई कर्मचारियों का करोड़ों लेकर भाग चुकी हैं। दोनों एजेंसियों ने पीएफ के मद का करीब डेढ़ करोड़ रुपए नगर निगम से ले लिया, लेकिन इसका भुगतान सफाई कर्मचारियों को नहीं किया है। मुंबई और मुरादाबाद की एजेंसियों ने अगस्त 2018 से शहर के सफाई की जिम्मेदारी संभाली थी। शुरुआती दिनों से पीएफ अकाउंट खोलने के दावे के बाद ही अभी भी आधे से अधिक सफाई कर्मचारियों का पीएफ अकाउंट तक नहीं खुल सका है। विशाल प्रोटेक्शन फोर्स के अंतर्गत करीब 900 व हिंदुस्तान सिक्योरिटी कंपनी के तहत 1000 से अधिक सफाई कर्मचारी काम कर रहे थे। निगम ने सख्ती दिखाई तो दोनों कंपनिया फरार हो गईं। पीएफ अकाउंट में कर्मचारी के वेतन का 12 फीसदी व नियोक्ता की ओर से 13 प्रतिशत भुगतान किया जाता है। दोनों एजेंसियों को तत्कालीन प्रभारी नगर आयुक्त व डीएम के. विजयेन्द्र पांडियन ने डाटा उपलब्ध कराने को कहा था, लेकिन एजेंसियों ने कोई रिस्पांस दिया।

ठेकेदारों ने रकम डकार ली
पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम गोरखपुर जोन के विभिन्न वितरण खंडों में बिजली वितरण व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए महानगर की फर्म ग्लोब इंडिया इनफ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से 1000 संविदा कर्मचारियों को तैनात किया गया। ठेकेदार ने इन कर्मचारियों के वेतन से ईपीएफ व ईएसआई के नाम पर 45 लाख रुपए काटे। यह रकम बिजली अभियंताओं की मिलीभगत से ठेकेदार डकार गया। ऊर्जा निगम की गोपनीय जांच में मामला उजागर होने के बाद वितरण खंडों के अभियंताओं ने बचाव में आरोपी फर्म के खिलाफ अलग-अलग 18 थानों में केस दर्ज कराया है। नोटिस मिलने के बाद अब अभियंताओं की सांस फूलने लगी हैं। वे अब भुगतान की फाइल तलाश कर अपने बचाव का तरीका खोज रहे हैं। एक अभियंता का कहना है कि फर्म के भुगतान के लिए न फंड आते और न लेटर, सिर्फ फोन आते थे। इसमें कहा जाता था कि फर्म को तत्काल भुगतान कर यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट भेजे। सभी खंड संविदा कर्मचारियों के ईपीएफ व ईएसआई की कटौती व भुगतान के दस्तावेजों की जांच किए बगैर ही फर्म के नाम चेक काट देते थे।