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Kannauj City of Perfume: कई वर्षों पुरानी है इत्र से जुड़ी यह प्रथा‚ आज खत्म होने के कगार पर

Kannauj City of Perfume: आज समय के अनुसार इत्रदान की हस्तकला संसाधनों की कमी के कारण खत्म होने की कगार पर है। कारोबारी बताते हैं कि आज वह समस्याओं से जूझ रहे है और उनकी सुनने वाला कोई नही है।

Pankaj Srivastava
Published on: 15 May 2024 4:52 PM IST
Kannauj City of Perfume
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Kannauj City of Perfume (Pic:Newstrack)

City of Perfume: आज के युग में कला और कलाकार दोनों ही समय के अनुसार बदलते जा रहे है। पुरानी कलाकारी आज सिर्फ तस्वीरों में ही देखने को मिलती है और जो कलाकार हैं भी तो वह संसाधनों की कमी के कारण अपनी कला को खत्म करने की कगार पर है। कुछ ऐसे ही कला से जुड़े व्यापार की हम बात कर रहे है। यह व्यापार इत्र नगरी से जुड़ा है‚ जो आज पूरी दुनिया में इत्र के व्यापार से मशहूर है। जी हां हम बात कर हैं कन्नौज इत्र नगरी की। जहाँ इत्र व्यापार से जुड़ा है। लेकिन आज समय के अनुसार इत्रदान की हस्तकला संसाधनों की कमी के कारण खत्म होने की कगार पर है। कारोबारी बताते हैं कि आज वह समस्याओं से जूझ रहे है और उनकी सुनने वाला कोई नही है।

आपको बताते चलें कि इत्र नगरी कन्नौज अपने इत्र के व्यापार के लिए देशभर में मशहूर है। इत्र की खुशबू को चार चांद लगाने के साथ उसके बेहतर रख–रखाव के लिए कन्नौज के कटरा मोहल्ले में करीब एक ही परिवार के 12–15 घरों में इत्रदान बनाने का काम किया जाता है। यह इत्रदान देखने में सुन्दर और लुभावने होते है। इनकी नक्काशी कारीगर अपने हाथों से छेनी और हथौड़े के द्वारा बेहतर डिजाइन बनाते है‚ इसके साथ ही इसमें पीतल के तार से सजावट कर चमकदार और खूबसूरत आकृतियों के साथ इसको तैयार किया जाता है‚ अंदर के हिस्से में मखमल का कपड़ा और सीसा लगाकर इत्र की शीशीयो के रखने का स्थान बनाया जाता हे‚ जिसमें लोग इत्र की शीशियां को रखकर इस खूबसूरत इत्रदान को भेंट यानी की गिफ्ट देने के लिए उपयोग करते है।

यह है हस्तकला की पहचान

बदलते समय के साथ हस्तकला लुप्त होती जा रही है‚ क्योंकि अब हर काम मशीनों से किया जाने लगा है‚ जिससे हस्तकला का कारोबार या तो अपना काम बंद कर रहा है‚ क्योंकि उसके व्यापार में लागत के साथ समय भी अधिक लगता है और मुनाफा कम है‚ जबकि आज का युग आधुनिक युग है‚ यहां कम समय में अधिक काम लिया जाता है। इसी कारण हस्तकला की पहचान धीरे–धीरे ढलती जा रही है और लोग मशीनों से बने इत्रदान इस्तेमाल में ला रहे है। यही कारण है कि आज हस्त कारीगर अपनी कला खोता जा रहा है और उसकी जगह मशीनों से काम लिया जा रहा है।

कभी हस्तकला से मिलता था सम्मान

इत्रदान के कारीगर अमरनाथ शर्मा की मानें तो एक जमाना वह था जब उनके पिता कैलाश नाथ शर्मा को हस्तकला की सुन्दरता के लिए सम्मान मिला था। उन्होंने बताया कि यह इत्रदान का काम उनके यहां कई पीढ़ियों से होता चला आ रहा है। उनके बाबा भी यही काम करते थे और उनके पिता कैलाश नाथ शर्मा को इत्रदान की कला के लिए सन 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इत्रदान की कला की खूबसूरती को देखकर सराहना की और दस हजार का नकद पुरस्कार के साथ सर्टिफिकेट दिया। इतना ही नहीं उन्होंने एक ऑटोमेटिक घड़ी भी भेंट की थी। लेकिन आज इस कारोबार को बदलते हालातों में ग्रहण लगता जा रहा है‚ क्यों कि अब न तो इत्रदान बनाने के लिए इस्तेमाल में लाई जाने वाली लकड़ी ही आसानी से मिलती है और न ही इसकी नक्कासी को खूबसूरत बनाने वाला पीतल का तार ही। महंगाई के दौर में यह चीजें और महंगी होती जा रही है और आसानी से मिलती भी नही है‚ जबकि लागत के अनुसार बिक्री नही हो पाती है। यह परेशानी हर कारीगर की है‚ क्योंकि इत्रदान बनाने में सभी को लकड़ी और पीतल के तार की आवश्यकता पड़ती है। लागत के अनुसार मुनाफा कम मिलता है‚ कारीगरों की मानें तो केवल उनकी मजदूरी ही निकल पाती है‚ जबकि एक इत्रदान को बनाने में कम से कम दो दिन का समय लग जाता है।

लकड़ी के इत्रदान होते हैं महंगे और टिकाऊ

कला और कलाकार आज दोनों ही देखने को कम मिलते है‚ क्यों कि आज के युग में लोग मशीन पर निर्भर होते चले जा रहे है और शायद यही वजह है कि अब जो भी चीज मिलती है वह मशीन से बनी हुई‚ लेकिन कन्नौज इत्र शहर में कुछ लोग आज भी हस्तकला को जिंदा किए हुए है‚ और अपने हाथों से लकड़ी के सुंदर और आकर्षण इत्रदान तैयार कर रहे है। शीशम की लकड़ी से बने होने के कारण यह इत्रदान महंगे और टिकाऊ होते है। ज्यादा समय तक चलने वाले यह इत्रदान भले ही सस्ती कीमत में न मिल पा रहे हों‚ जिसकी बजह से इनकी बिक्री भी कम हो रही है‚ लेकिन हस्त मेड इत्रदान के कारीगर आज भी अपने हाथों से इत्रदान बनाकर गुजर बसर कर रहे है। इनके परिवार की हालत देखकर इससे साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि इनकी मजदूरी ही निकल आती है। यही इनके लिए काफी है‚ मुनाफा ताे दूर की बात रही‚ पुश्तैनी काम को यह बंद नहीं करना चाहते है शायद इसलिए आज भी इस इत्रदान के कारोबार से जुड़कर काम कर रहे है।

क्या कहते हैं इत्र कारोबार से जुड़े अधिकारी

कन्नौज में सरकार द्वारा इत्र को बढ़ावा ने के लिए सरकारी संस्था सुगंध एवं सुरस विकास केंद्र को 1999 से स्थापित किया गया है‚ जिसका कार्य इत्र से जुड़े लोगों को प्रशिक्षण देने के साथ ही इत्र व्यापार को विकसित करना है‚ लेकिन आज इत्र कारोबार से जुड़ा हुआ इत्रदान का व्यापार खत्म होने की कगार पर नजर आ रहा है‚ कारीगर काफी परेशान है सरकार से उसको कोई मदद नहीं मिल रही है। डिप्टी डायरेक्टर नदीम अकबर ने बताया कि देखिए इत्रदान जो हमारे यहां काफी पहले जमाने से लोग यहां बनाते चले आ रहे है। खासतौर से कुछ लकड़ी की चीजों के उद्‍योग हैं हमारे यहां और बहुत अच्छे कारीगर है जो उसको बनाते है। लेकिन चूंकि आज मॉडर्न जमाना आ गया तो अब नई – नई पैकिंग मशीनें आ गयी और उसका जो हैंडमेन से सारा कार्य होता था और आज जो है महंगाई का दौर है और महंगाई के दौर में हम जो यह शीशम की लकड़ी के इत्रदान बनाते है वह काफी महंगे पड़ जाते है और दूसरी एक चीज कि यह हैंडमेड होते है‚ तो हैंडमेड और आज के दौर में अंतर क्या है कि जो पैकिंग के जो इत्रदान बन रहे है कई सारी इंडस्ट्रीयल जो कन्नौज में लगी हुई है।



Durgesh Sharma

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